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Lessons from Natural Disasters

September 12, 2014

 

कुदरती क़हर  से जूझने के फायदे 

पिछले साल उत्तरखंड और इस साल कश्मीर की बाढ़ में अपार जन धन की हानि हुई है .कुदरती हादसों से नुक्सान होता है लेकिन उनसे कुछ फायदे भी होते है . मैं इस बारे में अपना अनुभव बांटना चाहूंगा . प्राकृतिक आपदाएं बता कर नहीं आतीं हैं . लेकिन इनसे जूझ कर निकलने वाले लोगों के व्यक्तित्व में एक सकारात्मक बदलाव थोड़े ही समय में आ जाता है जो कि किसी भी और ट्रेनिंग से और पैसे खर्च कर भी नहीं आ सकते . इन बदलावों में ईश्वर में आस्था सर्वोपरि है . इसके अलावा धैर्य , अभावों में रहने और जूझने की क्षमता , समय की उलटफेर करने की सामर्थ्य पर विश्वास आदि अनेक बदलाव मनुष्य के  व्यक्तित्व में धनात्मक परिवर्तन लाते हैं .

जनवरी 2004 में मेरी दरभंगा सबस्टेशन बनाने के लिए पोस्टिंग हुई थी . पावरग्रिड की परम्परा के तहत किसी भी तरह से मई , जून तक मिट्टी भर कर सिविल वर्क कराने का दबाव था , पर साइट पर परिस्थितियां उचित न होने की वजह से मैंने काम आरम्भ नहीं होने दिया . इसका एक कारण यह भी था कि मुझे कुछ स्थानीय लोगों से पता चला था कि लोकल ठेकेदार मई , जून में अधूरा काम करते हैं और बाढ़ में सब कुछ बहा हुआ दिखाकर पूरे बिल का दावा करते हैं . इससे फायदा यह हुआ कि जुलाई की अभूतपूर्व बाढ़ की वजह से सबस्टेशन का ग्राउंड लेवल 2 गुना बढ़ा कर और ऊंचा किया गया जिससे भविष्य में बाढ़ से बिजलीघर बंद न हो .

10 जुलाई 2004 को मैं दरभंगा से अपने बॉस से मिलने मुजफ्फरपुर गया . बॉस को बाढ़ की  भनक कुछ पहले ही मिल गयी थी सो वे पहले ही ट्रैन से कलकत्ता निकल गए थे . वहां से लौटते हुए शाम को मैंने देखा कि बाढ़ का पानी हाईवे के ऊपर से बह रहा था . मैंने ड्राइवर से पूछा तो उसने कहा कि इतना तो अक्सर यहां होता रहता है .

फिर भी मैंने घर  आने पर रात में दूकान पर जा कर कुछ आवश्यक खरीदारी की और सो गया . सुबह 5 बजे शोरगुल से नींद खुली तो पहली मंजिल पर अपने घर से मैंने नीचे देखा कि मकान मालिक के घर , भूतल पर 3 फ़ीट पानी भर चुका था . शाम होते होते शहर में 6 से 8 फ़ीट पानी भर गया था . दरभंगा शहर को बाहर से जोड़ने वाली 4 मुख्य सड़कों की एप्रोच रोड बह चुकी थीं और कई पुलों के दोनों ओर नदी बह रही थी . रेल लाइन  के ऊपर से पानी बहने के कारण सभी ट्रेन बंद की जा चुकी थीं . बिजली सुबह से ही हमेशा के लिए बंद हो गयी थी . होटल, दुकाने भी बंद हो चुके थे और बाहर से आये लोगों को होटल वालों ने जाने को कह दिया था . बैंक , एटी एम , सरकारी ऑफिस , अस्पताल आदि सभी बंद थे .

ऑफिस की जीप ऊँचे स्थान पर खड़ी करके , ड्राइवर जो सीतामढी का रहने वाला था , वह मेरे घर पर रुक गया . उसके बाद तो अगले 7-8 दिन पूरी प्राकृतिक दिनचर्या थी . मकानमालिक के पास एक जनरेटर था जो पानी की मोटर चलाने के काम आता था . कहीं आने जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी . घर में खाने के लिए दाल, चावल,आटा आदि था , एक गैस सिलिंडर भी था ,इसलिए सुबह शाम दोनों लोग मिलकर खाना बना खा लेते थे . एक ट्रांजिस्टर से पटना आकाशवाणी से बाढ़ की खबर सुन लेते थे , बाद में नाव से अखबार आना भी शुरू हो गया .

मेरा ड्राइवर ज्यादा पढ़ा न होने से दिनभर बोर हो कर मोहल्ले की ख़बरें इकठ्ठा करने चल देता था . पर मेरे पास अपनी ढेर सारी किताबों को पढ़ने के लिए काफी वक्त था . ज्योतिष की कुछ मौलिक खोजें मैंने उसी दौरान कीं और उन्हें लिख के भी रख लिया जो अब भी काम आतीं हैं .

सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि ,जो ऑफिस वाले पटना से रोज  कार्य प्रगति जानने के लिए   5-10  बार फोन करते थे, उन्होंने अगले दस दिन में एक बार भी फोन नहीं किया जबकि सबको पता था कि उस इलाके में 8-10 कर्मचारी सपरिवार फंसे हुए थे . पटना से दिन में एक दो बार एयरफोर्स के हेलीकाप्टर ऊपर चक्कर लगा के चले जाते थे . हमारे एक डीजीएम बाढ़ से पहले पटना ऑफिस के काम से गए हुए थे , वो दरभंगा में अपने परिवार के पास आना चाहते थे . लेकिन पावरग्रिड के सर्वोच्च स्तर के अधिकारियों ने भी अपने तरफ से कुछ नहीं किया ,जो बिहार के मंत्रियों के साथ सबस्टेशनों के शिलान्यास के चक्कर में दिन रात उठते बैठते थे. थक हार कर वे स्वयं पटना एयरफोर्स स्टेशन  पहुंचे और अपनी व्यथा कथा वायु सेना अधिकारियों को बताकर  हेलीकाप्टर से दरभंगा पहुंचे .

करीब 10 दिन बाद मैं भी मुज़फ्फरपुर से ट्रेन पकड़ने के लिए घर से ड्राइवर के साथ निकला . करीब 10 किमी तक सड़क सिर्फ पैदल या मोटर साइकिल से चलने लायक थी .और उस पूरी सड़क पर हज़ारों विस्थापित लोग परिवार सहित रह रहे थे . बीच में डेढ़ दो किमी की दो बार ओवरलोडेड नाव की यात्रा के बाद बाढ़ वाले क्षेत्र से छुटकारा मिला .

मुजफ्फरपुर ऑफिस पहुंचने पर लोकल सहकर्मियों की प्रतिक्रिया थी कि आप तो बड़ी जल्दी छूट गए और आप को तो इतने दिन ऑफिस नहीं जाना पड़ा आदि . बाद में भी किसी मीटिंग में किसी बड़े अधिकारी ने मुझसे इस बारे में कभी कोई जिक्र तक नहीं किया . लेकिन इसका फायदा मुझे अगले 8 साल तक बिहार में रहने के दौरान मिलता रहा . जब भी किसी मीटिंग में बड़े अधिकारी , काम जल्दी करने और कर्मठता के उपदेश देना शुरू करते तो मैं भी उन्हें उनकी और सरकार की उदासीनता का उदाहरण तुरंत याद दिला देता था और वे निरुत्तर हो जाते थे . 

प्राकृतिक आपदाओं से मिलने वाली सीख

1. अगर आप किसी आपदा के लिए प्लान करके रहते हैं , तो या तो आप के साथ वह घटित नहीं होगी या घटित होने पर उसका आपके ऊपर ज्यादा दुष्प्रभाव नहीं पडेगा .

2. बुरे वक्त में आप कितने ही रसूख वाले लोगों या संघठन से जुड़े हों , वे आपके किसी काम नहीं आएँगे , सिर्फ आपकी अपनी बुद्धि , धैर्य ,स्वास्थ्य , आत्मविश्वास , आस्था और साहस ही आपके काम आएगा . इसलिए अच्छे समय पर इन्हें बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए और अपने घर परिवार के सदस्यों को भी इसके लिए तैयार करना चाहिए न कि उन्हें सुविधाओं का गुलाम बनने देना चाहिए. जिस दिन हेलीकॉप्टर आपको रस्से से लटका कर निकालेगा या 10 किमी पैदल चलने की नौबत आएगी , उस दिन आपका स्वास्थ्य ही काम आएगा , होंडा सिटी नहीं.  

3. ज्योतिष के अनुसार ,भयंकर आपदाएं शनि की स्वीकृति के बिना घटित हो नहीं सकती हैं और इस तरह की आपदा आने पर आपको शनि के शत्रु सूर्य और मंगल से मदद नहीं मिल सकती है . इसका अर्थ यह है कि अगर आप जल्दबाजी , चालाकी , अनैतिक उपायों से आपदा से छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे तो आप और ज्यादा मुसीबत में फंस सकते हैं . सूर्य सरकारी तंत्र को नियंत्रित करता है इसलिए उससे भी आपको तुरंत मदद मिलना संभव नहीं है . शनै: शनै : आने वाला शनि जाता भी धीरे धीरे ही है , इसलिए कम से कम अगले 3-4 दिन तक यह मान कर चलना चाहिए कि हालात में सुधार संभव नहीं होगा और वर्तमान स्थिति को जितने धैर्य से काट सकें उतना ही ठीक होगा .

4. सबसे बड़ी सीख इन आपदाओं से यह मिलती है कि व्यक्ति चाहे जितने संसाधन इकठ्ठे कर ले , उसके अस्तित्व को मिटाने में समय को पल भर भी नहीं लगता . इसलिए अनैतिक तरीकों से माया इकठ्ठी करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है .

उस समय का ज्यादा मीडिया कवरेज मुझे नहीं मिला पर  The Hindu की रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं : http://www.thehindu.com/2004/07/14/stories/2004071405431200.htm

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