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Blog posts : "Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa"

Why I did not settle in USA ???

कम्प्यूटर इंजीनियर  अमेरिका प्रयाण कथा को पढ़ने के बाद कुछ मित्रों ने मुझ से पूछा कि आप तो 1992 में ही अमेरिका घूम आए थे फ़िर वहां बसे क्योँ नहीं ? पेश हैं वे कारण जिनकी वज़ह से मैं अमेरिका में नहीं बसा  ..

 

अमेरिका मुझे क्यों पसंद नहीं है ? 

 

एक कारण हो तो बताऊं कि मुझे अमेरिका क्यों पसंद नहीं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि वहां थूकने की स्वाधीनता बिलकुल नहीं है। मुझे आश्चर्य है, वह कैसा प्रजातांत्रिक देश है। हमारे यहां पान-गुटका-तंबाकू खाने वाले तो यत्र तत्र थूकते ही हैं, परस्पर मतभेद रखने वालों के लिए भी थूकना अभिव्यक्ति का कितना शक्तिशाली माध्यम है। थूक लेने के बाद मन को कितनी शांति मिलती है, व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। सभी राजनीतिक दल जानते हैं विरोधी दलों पर थूकना प्रजातांत्रिक अधिकारों के अंतर्गत आता है। अमेरिकी नासमझ इस छोटी-सी बात को क्या जानें? बंकर में छुपे हुए सद्दाम हुसेन को भी जब पहली बार अमेरिकी सैनिकों ने इराक में पकड़ा था तो उसने भी मात्र थूककर गुस्से को अभिव्यक्ति दी थी।

मात्र थूक देना भी अर्थ रखता है। किसी के ऊपर थूकने से पहले देखें, क्या इस पुनीत कार्य के लिए सही व्यक्ति को ही हम चुन रहे हैं? उस पर थूकना है, उसे दिखाकर थूकना है या मात्र थू कहना है। देखते ही थूकें, फिर उसे देखें। नजारा मनोहारी हो सकता है। थूक देना भी एक प्रभावी शस्त्र है जिसका उपयोग बहुत सावधानी से करने की आवश्यकता है। गलत स्थान पर थूक देने से व्यक्ति पिट सकता है। इसीलिए जहां थूकें सोच-समझकर थूकें। गंभीरतापूर्वक विचार करें क्या वहीं थूकना जरूरी है? या इस युद्धोन्मुखी प्रक्रिया को टाला जा सकता है? मंत्रियों के आसपास अंगरक्षकों से अधिक थूकरक्षक होने चाहिए। प्रतिपक्ष का जो नेता सत्ता पक्ष पर, या सत्ता पक्ष का जो नेता प्रतिपक्ष पर अधिक से अधिक थूक सकता है, टिकट पाने का वह उतना ही मजबूत दावेदार बन जाता है।

यदि अमेरिका में सड़क पर कोई थूक दे तो उसे भी टिकट की सुविधा मिल जाती है। बस यहां के टिकट और वहां के टिकट में थोड़ा अंतर है। यहां टिकट मिलता है तो व्यक्ति की चुनाव यात्रा, विमान यात्रा,बस या रेल यात्रा हो जाती है किन्तु वहां टिकट मिलता है तो व्यक्ति की अदालत यात्रा या जेल यात्रा हो जाती है। यहां का टिकट सुविधायुक्त जबकि वहां का टिकट अभियुक्त बनाता है। यहां का टिकट घमंड जबकि वहां का टिकट दंड देता है। कई परंपराएं वहां ऐसी हैं जिन पर थूकने की भी इच्छा नहीं होती, किन्तु गलती से भी कहीं थूक दिया कि कॉप याने पुलिस के घेरे में आ गए। पर जहां किसी प्रकार की थू थू ही न हो वह भी कोई रहने योग्य स्थान है? मेरी हो या तेरी हो, थू थू तो होनी चाहिए, उसके बिना जीवन नीरस नहीं हो जाएगा? मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए। दुष्यंत कुमार ने भले ही न सोचा होगा किन्तु इन पंक्तियों के पीछे थू थू करने कराने का ही आशय रहा होगा। बात का सार संक्षेप यह कि जिस देश में हम थूक नहीं सकते, थू थू नहीं कर सकते वहां रहने में क्या आनंद? राजा-महाराजाओं के जमाने में पीकदान हुआ करते थे, इन दिनों समूचा हिन्दुस्तान ही यहां के सुयोग्य नागरिकों के सहयोग से पीकदान बन चुका है।

थूकने के मामले में अपना देश सचमुच स्वर्ग है, कहीं भी दिल खोलकर थूको । चाहे जिस पर थूको, जितना मर्जी में आए उतना थूको। बस उसके बाद वाली स्थिति से निपटने के लिए आर्थिक एवं राजनीतिक मजबूती हो। अमेरिका में कहीं भी थूकेंगे तो पुलिस हाथ दिखाएगी, हिन्दुस्तान में किसी पर थूकोगे तो ही सामने वाला हाथापायी करेगा।

अमेरिका के अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवार नाव रखते हैं, शनिवार, रविवार आदि छुट्टी के दिनों में ट्राली पर रखकर सुबह से ही पास की नदी या झील में डाल देते हैं, फिर दिन भर पानी के बीच सैर या मस्ती का आनंद लेते रहते हैं। पानी से खेलना वहां के लोगों का शौक है। वे क्या जानें आग से खेलना। यहां के लोगों की तो मजबूरी थी, अब भले ही शौक बन गया है। यहां के लोग यदि पानी से खेलने लगें तो उनका पानी मर जाए, वे स्वयं भूखे मर जाएं। यहां तो मात्र सत्ताधीश ही पानीदार रह सकते हैं। कर्णधारों ने तो समाज पर पानी फेर दिया और नागरिकों को लहरें गिनने के काम में लगा दिया। भारतीय मतदाता इसीलिए तो पानी पी-पीकर कभी इन्हें, कभी उन्हें कोसता रहता है। इसके अलावा वह और क्या कर सकता है? वैसे पानी से खेलना भी कोई काम है? भारतीय बच्चे ही बरसात के दिनों में पानी में खेलते रहते हैं। जो काम यहां के बच्चे कर लेते हैं, वह काम वहां के बड़े-बूढ़े लोग करते हैं। यह पक्का है वे आग से नहीं खेल सकते। इस तरह बच्चों जैसे काम करते हैं, इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां बच्चों के स्कूल के पास वाली सड़क से पंद्रह मील प्रति घंटे से अधिक की गति से किसी वाहन के निकलते ही वाहनचालक को टिकट थमा दिया जाता है। सड़क पर किसी का पांव भी आ जाए तो कार वाला पचास फुट दूर कार खड़ी कर देता है। यहां तो कोई बच्चा या बूढ़ा बीच में गलती से आ जाए तो सत्तर-अस्सी मील प्रति घंटे की गति से कुचलते हुए भाग जाने की स्वाधीनता है। बच्चे या बूढ़े ने सड़क का नियम क्यों तोड़ा? भारतीय प्रजातंत्र पद्धति में मटरगश्ती या अपराध करने की जो स्वतंत्रता है वैसी अमेरिका में कहां? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं।

वहां हॉर्न बजाना ही गाली देना माना जाता है। व्यस्त सड़कों पर घंटों यात्रा कर लीजिए, हॉर्न की एक भी आवाज सुनने को नहीं मिलेगी। यदि दो कारें समानान्तर दौड़ रही हैं और किसी एक ने दूसरे को ओवरटेक करने यानी आगे जाने के लिए रास्ता दे दिया है, तो दूसरा व्यक्ति पहले को थैंक्स कहता ही है। यहां पर ओवरटेक कर आगे जाने वाले को गाली देने की स्वतंत्रता है : स्साले कब से हॉर्न बजा रहा हूं, गाड़ी एक तरफ नहीं करता? गाली देने या सुनने का जो सुख जो हिन्दुस्तान में है, वह अमेरिका में कहां ? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

प्रातः भ्रमण पर वहां निकल जाएं, परिचित हो या अपरिचित, पुरुष हो या महिला, हेलो, हाय करते हुए हाथ हिलाकर अभिवादन अवश्य करते हैं। हिन्दुस्तान के अभिजात वर्ग के दबदबे का वहां अभाव है। यहां छोटा आदमी ही बड़े को नमस्कार करता है और सभी स्वयं को बड़ा ही मानते हैं। अतः कोई किसी को क्यों नमस्कार करे? हेलो, हाय करने के आदी इन छोटे लोगों की बात क्या करना? इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां लेखक द्वारा पुस्तक भेंट करने की प्रथा नहीं है, लोग किताबें खरीदकर पढ़ते हैं। हिन्दुस्तान में लेखक से आशा की जाती है कि वह पुस्तक भेंट में देगा, बाद में पुस्तक भी अनपढ़ी रह जाएगी। कई पाठकों को पढ़ने का तो बहुत शौक होता है बशर्ते कोई किताब भेंट कर दे। वहां की राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में कहीं जाइए, वे लोग पुस्तक पढ़ते हुए या लैपटॉप पर काम करते हुए ही देखे जाते हैं। अपने में मगन रहते हैं। असल में निंदा-स्तुति करने की न उनकी आदत है, न अनुभव है, अतः क्या समझें उसका मज़ा? वे हमारी तरह काम कम और बातें ज्यादा क्यों नहीं करते? छटांक भर की जीभ चलाने में भी कंजूसी बरतते हैं? कंजूस कहीं के। इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

वहां के उच्च पदासीन नागरिक भी स्वाधीन देश में रहते हैं, फिर भी समय के इतने पाबंद क्यों हैं? भारतीयों की तरह मन के राजा क्यों नहीं हैं? हमारे लोग प्रतिनिधि बनते ही, फिर वह चाहे जनता के हों या कर्मचारियों के, हर कार्य विलंब से करना शुरू कर देते हैं। देरी से आने से उनकी धाक जम जाती है कि अब वह वहुत व्यस्त हो गए हैं। काम पर कभी भी आने, कभी भी चले जाने की स्वाधीनता वहां नहीं है। इसीलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

अमेरिका में बस में बैठने के लिए, सामान खरीदने के लिए हर जगह लाइन में लगना पड़ता है, धक्कामुक्की करने की न कोई मानसिकता न ही आवश्यकता, किन्तु जो मजा सामनेवाले को पटककर, उसे धूल चटाकर, बिना लाइन में लगे या सबसे बाद में लगकर सबसे पहले सामान लेने में है, वैसा मजा अमेरिका में कहां? परिवार कल्याण कार्यक्रमों के लिए सरकार कितना भी जोर लगा ले, किन्तु कई बहादुर अभी भी लाइन लगाने में पीछे नहीं हैं। ऐसी शौर्यपूर्ण मानसिकता, और तत्परता क्योंकि वहां नहीं है, अमेरिका मुझे पसंद नहीं।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए थियेटर में फिल्म देखने, कटिंग कराने में या अन्य कई स्थानों पर तीस प्रतिशत की रियायत दी जाती है। वहां सीनियर सिटिजन की हजामत दस डॉलर में बन जाती है जबकि अन्य लोगों की पन्द्रह डॉलर में। स्पष्ट है, उन लोगों को सही तरीके से हजामत करने का तरीका भारतीयों से सीखना चाहिए। यहां तो चारों ओर हजामत करने का लक्ष्य लिए विशेषज्ञ खड़े ही रहते हैं। यहां सिर्फ बाल कटवाने में हीं नहीं, प्रत्येक उपकरण या सामान खरीदने में दुकानदारों द्वारा हजामत कर दी जाती है। क्योंकि उन लोगों ने भारतीयों से सही तरीकों से हजामत करने के गुर नहीं सीखे, इसलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

अमेरिका में अपंगों, अस्वस्थ जनों, बुजुर्गों के लिए विशेष सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार देखा जाता है। बसों में चढ़ने, बैठने, उतरने के लिए उनके लिए विशेष व्यवस्था रहती है। वहां फ्रिज, सोफा, वाशिंग मशीन बार-बार रिपेयर नहीं कराए जाकर कचरे के स्थान पर फेंक दिए जाते हैं, जो चाहे मुफ्त में ले जाए। वहां मनुष्यों के ही नहीं, कुत्ते-बिल्लियों के भी अस्पताल और डॉक्टर होते हैं, जहां अच्छा इलाज किया जाता है। वहां आदमी की जि़न्दगी सबसे मूल्यवान मानी जाती है जिसे बचाया जाता है। भारतवर्ष में फ्रिज, सोफा, वाशिंग मशीन बार-बार रिपेयर कराए जाते हैं। ये वस्तुएं कीमती मानी जाती हैं, किन्तु मनुष्य को प्रायः कुत्ते-बिल्ली की मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। मां-बाप और अपंगों को जो चाहे मुफ्त में ले जाए। देख-रेख करे। बच्चे प्रगति कर रहे हैं। वहां रोगियों का इलाज पहले किया जाता है फीस बाद में ली जाती है। यहां रोगियों की थोड़ी-सी शल्य चिकित्सा करके उनके घरवालों को मनमानी फीस बताई जाती है, फिर कहा जाता है, पहले फीस जमा कर दें ताकि आगे बढ़ा जाए। अन्यथा रोगी को अन्यत्र ले जाएं। अमेरिका ने ऐसी प्रगति नहीं की, इसलिए अमेरिका मुझे पसंद नहीं ।

( Courtesy : Sh. Hari Joshi , Hindisamay ) 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 17

अमेरिका प्रयाण कथा अंतिम अध्याय ( 17 ) 

स सीरिअल से नौ दो ग्यारह होने का वक्त आ गया है पर उस से पहले अमेरिका में  नौ सौ ग्यारह की महिमा जानना अनिवार्य है। 

 नौ सौ ग्यारह की महिमा अमेरिका मे अनंत है। बड़े काम का नंबर है। दमकल, ऐंबुलेंस या फिर पुलिस को बुलाने के लिए नौ सौ ग्यारह नंबर घुमाया नहीं कि मिनट भर में पुलिस की गाड़ी दरवाज़े पर होती है। एक बार तो किसी नये रंगरूट को कंपनी से मिली निर्देशपुस्तिका में लिख दिया गया था कि आपातकाल में यह नंबर मिलाओ। भाई ने हवाईअड्डे पर कंपनी की भेजी टैक्सी न पाकर हड़बड़ाहट में नौ सौ ग्यारह घुमा दिया। फिर तो लालनीली बत्ती वाली टैक्सी के ड्राइवर यानि कि पुलिसवाले ने जो लेक्चर पिलाया कि पूछिए मत।

बड़े तो बड़े अक्सर बच्चे भी यह हरकत करते हैं। पहली ही कक्षा में इस नंबर का महत्व सिखा दिया जाता है। हमारे मित्र अहलूवालिया जी पर बड़ी बुरी मार पड़ी इस नंबर की। उनके दोनों नटखट पुत्र स्कूल से घर आकर कुरूक्षेत्र का मैदान बना डालते हैं।

 

पिछली गर्मियों में उन्होंने बड़े चाव से माता–पिता को भारत से बुलाया। लंबी हवाई–यात्रा से थके वरिष्ठ अहलूवालिया जी फिलाडेल्फिया की गुनगुनी धूप में सुस्ता रहे थे कि स्कूल से शैतानों की टोली आ धमकी। इन शैतानों के माता–पिता दोनों काम करते थे और बच्चों को स्कूल के बाद डेकेयर जिसे भारत मे क्रेच कहते हैं में रहना होता था। पर अब तो देखभाल के लिए दादी–बाबा थे। दोनों शरारतियों को दादी ने बड़े प्यार से खाना खिलाया। पर खाना खिलाने में दादी को दोनों ने बहुत हैरान किया। खाने के बाद दोनों की धमाचौकड़ी शुरू हो गई। ज़ोर से टी .वी .चलाना, उछलकूद, गुलगपाड़ा।


बेचारे थके हारे दादाजी हैरान होकर पहले तो समझाते रहे फिर डांटने लगे। पर इन अमेरिकन लंगूरों को सब बेअसर। बेचारे दादाजी ने आज़िज़ आकर समस्या का हिंदुस्तानी इलाज करने की ठानी और बच्चों के बाप को बचपन में पढ़ाया पाठ अपने पोतों पर आज़मा डाला। दादाजी ने दो तमाचे रसीद करके उनके कान उमेठ दिए। छुटका पोता तो बुक्का फाड़के रोने लगा और बड़े वाले ने आव देखा न ताव नौ सौ ग्यारह घुमा दिया। दो मिनट में पुलिस देख कर दादाजी हैरान। पुलिस ने घर में मकान मालिक को गैरहाज़िर देख और बच्चो का क्रंदन देख कर दादा–दादी को थाने उठा ले गई और बच्चों को पड़ोसी के हवाले कर दिया।

शाम को अहलूवालिया जी आफ़िस से घर पहुंचे तो पड़ोसी ने रामकथा सुनाई, सुनकर अहलूवालिया जी के हाथ के तोते उड़ गए। बेचारे उल्टे पांव थाने भागे। बहुत मुश्किल से पुलिस वालों को अपने पिताश्री के स्थानीय कायदे–कानूनों से नावाकिफ़ होने और वृद्ध होने का वास्ता देकर छु.ड़वाया। पर उनके पिताजी का पारा तो सांतवे आसमान पर था। सारे रास्ते पिताश्री लेक्चर देते रहे कि 'ऐसी जगह रहने के क्या फ़ायदा जहां आप बच्चो को काबू में नहीं रख सकते, पुलिस भी बेअक्ल है चोरों और शरीफ़ों में फ़र्क की तमीज़ तक नहीं वगैरह–वगैरह।' अगली ही फ्लाइट से दोनों प्राणी अपने उस वतन वापस चले गए जहां उनका कानून चलता है।


दिल्ली स्टेशन पर चांटो की बौछार


अहलूवालिया जी मन मसोस कर रह गए। लड़का उजड्ड होता जा रहा था। दादाजी को थाने पहुंचा कर शेर हो गया था। अहलूवालिया जी पिताजी के गुस्सा होकर चले जाने से बड़े दुखी थे, पर कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि नौ सौ ग्यारह नंबर का जिन्न उन्हें समस्या का हिंदुस्तानी तरीके से इलाज करने से रोक देता था। खैर अगली छुट्टियों मे अहलूवालिया जी सपरिवार भारत यात्रा पर गए। हवाई अड्डे पर रात के वक्त विमान पहुंचा। बच्चों ने लिम्का फैंटा जो मांगा अहलूवालिया जी ने सब दिलाया। हवाई अड्डे से दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाने वाली बस में सब बैठे। अचानक अहलूवालिया जी ने अपने लिम्का पीते बड़े लड़के के तड़ातड़ तीन तमाचे रसीद कर दिए। लड़का बुक्का फाड़ के रोने लगा। यह देख कर कंडक्टर बोला 'अरे भाईसाहब, लड़का तो चुपचाप बैठा है, क्यों उसे आप खालीपीली पीट रहे हैं?' अहलूवालिया जी दहाड़े 'तू चुप बैठ। यह मेरे घर का निजी मामला है।' कंडक्टर सहम गया। अब अहलूवालिया जी अपनी विलापरत संतान से मुख़ातिब हुए, 'ओये खोते दे पुत्तर ! अब मिला नौ सौ ग्यारह। साले यहां तो पुलिस भी तुझे ही कूटेगी मुझे नहीं।'


चटोरा कुत्ता


हमारे एक मित्र हैं विजय श्रीवास्तव। बड़े रोचक स्वभाव के जीव हैं। भारत मां के सच्चे पुत्र। अमेरिका में रहकर भी भारतीयता का झंडा पूरी शान से बुलंद किए हुए हैं। उनको फ़ोन करिए तो हैलो कि जगह 'जय माता दी' का उदघोष सुनने को मिलता है। भारतीय परंपरा के साथ भारतीय भोजन के भी शौकीन है। एक बार बड़ी मज़ेदार समस्या से दो–चार हुए हमारे विजय भाई। उनके पड़ोसी के प्यारे कुत्ते ने खाना पीना छोड़ दिया। चिंताग्रस्त पड़ोसी अपने कुत्ते को पशुचिकित्सक के पास ले गया। पशुचिकित्सक ने जांच–पड़ताल के बाद फ़रमाया कि कुत्ता तो एकदम भला चंगा है। अब पड़ोसी सिर खुजाने लगा कि आख़िर कुत्ते का पेट भरता कैसे है। उसने घर के आसपास वीडियो कैमरे फिट कर दिए, कुत्ते पर निगरानी रखने के लिए। कुछ दिन की जासूसी के बाद उसे पता चल गया कि क्यों उसके पड़ोसी श्रीवास्तव साहब रोज़ अपने कू.ड़ेदान के गिरने और कूड़ा फैलने पर हैरान होते हैं? यह उसका प्यारा कुत्ता ही था जिसे कुत्तों के लिए बना पौष्टिक पर बेस्वाद खाना पसंद नहीं आता था। किसी दिन इस कुत्ते ने श्रीवास्तव साहब के कूड़ेदान से बचीखुची पूड़ी–कचौड़ी और मसालेदार सब्ज़ी क्या खा ली, उस श्वान का शाश्वत सच से साक्षात्कार हो गया।


बेचारे कुकुर को पता चल गया कि वह और उसका मालिक दोनों पौष्टिक खाने के नाम पर ताउम्र बकवास खाते रहे और कितने स्वादिष्ट खाने से महरूम रहे। अब वह बेचारा बेजुबान अपने मालिक को तो समझा नही सकता था, इसलिए अपनी पेटपूजा श्रीवास्तव साहब के कू.ड़ेदान में कर लेता था और अपने मालिक को बेस्वाद पास्ता सलाद वगैरह लीलते देख उनकी किस्मत पर तरस खाता था। कुत्ते के मालिक को उसकी यह हरकत नागवार गुज़री और उसने श्रीवास्तव जी को घु.ड़का कि अगर उन्होंनें कु.ड़ेदान को ठीक से बंद नही रखा और उनका कू.ड़ा खाने से कुत्ता बीमार पड़ा तो वह मुकदमा ठोंक देगा। श्रीवास्तव जी डर गए और बेचारे कू.ड़ा घर के अंदर ही रखने लगे। इधर कुत्ते ने भूखहड़ताल कर दी। बेचारा पड़ोसी फिर दौड़ा पशुचिकित्सक के पास। उसने पूरी रामकहानी सुनकर कहा, 'कुत्ते को वही दो जो वह खाना चाहता है वरना वह भूखे ही दम तोड़ देगा।' सुना है आजकल श्रीवास्तव जी का पड़ोसी उनसे छोले भटूरे और कचौड़ियां बनाना सीख रहा है।


अनोखेलाल जी खो गये?


यह संवेदनशील घटना हमारे मित्र अनोखेलाल आहूजा जी के साथ घटी। अनोखेलाल जी हमारी फिलाडेल्फिया की मित्र–मंडली के अभिन्न सदस्य हैं। हर समोसा पार्टी उनके बिना अधूरी मानी जाती है। आहूजा जी आजकल घर ख़रीद रहे हैं। अपने निर्माणाधीन घर में कभी भूमि पूजन तो कभी कुदाली पूजन के नाम पर उन्होनें अमेरिकन कारीगरों को भारतीय संस्कृति और वास्तुशास्त्र से भली–भांति परिचित करा दिया है। आहूजा जी अक्सर वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर की डील वगैरह ढूंढ़ते पाए जाते हैं। हमारी समोसा पार्टियां अक्सर उनके बिना वीरान रहती हैं। अगर कभी भूले भटके आ भी गए तो नाना प्रकार की जानकारी के सागर में हम सबको डुबो देते हैं। अब हमें पता हो चला है कि घर कि घास कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है। उसे कितनी बार काटना चाहिए, कब छोड़ना चाहिए वगैरह–वगैरह।


एक बार किसी मित्र की पैंतीस वर्षीया बीबी के अठ्ठाईसवें जन्मदिवस की पार्टी में आहूजा जी कि बीबी तो पहुंच गई पर आहूजा जी नदारद। सेलफ़ोन भी नहीं उठा रहे थे। हमने अंदाज़ लगाया कि शायद आफ़िस में कोई मीटिंग लंबी खींच गई थी। पार्टी ख़त्म होने के बाद सब घर चले गए। रात दस बजे श्रीमती आहूजा का फ़ोन आया। आहूजा जी घर नहीं पहुंचे थे। आफ़िस का फ़ोन कोई उठा नहीं रहा था। उनका सेलफ़ोन भी आफ़ लग रहा था। हम सपत्नीक आहूजा जी के घर पहुंचे तो श्रीमती आहूजा रूंआसी हो गईं। बात वाकई चिंताजनक थी, मैं सोच रहा था कि कभी–कभी विदेश में व्यक्ति कितना असहाय हो जाता है तकलीफ़ आते ही। रिश्तेदार तो होते नहीं, मित्र भी न हों तो कितना मुश्किल हो जाए विपत्ति का सामना करना। मैंने एक मित्र को फ़ोन लगाया, वह चौंका 'अरे अभी दस बजे तक तो हम सब साथ थे, क्या याद आ गया?' मैंने कहा, 'अनोखेलाल जी खो गए।' मित्र चौंका, 'अरे यार क्या मज़ाक कर रहे हो?' मैंने सारी रामकहानी बताई। हमने यह फ़ैसला किया कि मित्र उनके निर्माणाधीन घर की तरफ़ जाकर देखें कि कहीं वे घर में कोई नापजोख़ करने गए हों और कार वगैरह ख़राब हो गई हो।


मेरी पत्नी उनके बच्चों को संभलाने लगीं और मैं श्रीमती आहूजा जी के साथ आहूजा जी के आफ़िस चल दिया। रास्ते में पत्नी का फ़ोन आया कि आहूजा जी मिल गए हैं और आप दोनों के पास आफ़िस आ रहे हैं। उनके आफ़िस के पार्किंग लाट में आहूजा जी के दर्शन हुए। आहूजा जी हैरान थे कि उनके देर से आने पर इतनी त्राहि–त्राहि क्यों मची है? श्रीमती आहूजा जी की हालत बांध टूटने से पहले क्षणभर ठहरी नदी की थी। इससे पहले यह नदी बहे, मैंने पूछा, 'महाराज आप कहां थे?' पता चला आहूजा जी को शाम को आफ़िस में किसी हाट डील का पता चल गया। जनाब सीधे दौड़ लिए स्टोर। सेलफ़ोन की बैटरी दिन में ही चुक गई थी। दुकान के सेल्समैन भी उस दिन शायद खाली बैठे थे। आहूजा जी पहले विस्तार से वाशिंग मशीन के विविध फीचर समझते रहे, फिर सौदेबाज़ी करते रहे और तकरीबन तीन घंटे झेलने के बाद सेल्समैन ने अपने मैनेजर को बुला लिया। मैनेजर ने कुछ ऐसे प्रस्ताव फेंके कि आहूजा जी ने उस दिन वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर, सोफा और न जाने क्या–क्या ख़रीद डाला। इस सबमें दस बजने का पता ही नहीं चला। अब पार्किंग लाट में आहूजा दंपत्ति के मध्य तानों और शिकवों के बादल गरज रहे थे। इतने गर्जन–तर्जन के बाद बरसात होनी अवश्यंभावी थी अतः मैंने फूट लेने में भलाई समझी।

 

समाप्त 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 16

भयो प्रगट कृपाला 

 

 

अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाएं लगती हैं, शिशुपालन की भी और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आना है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहां प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी।

मेरा विचार यह बना कि यह नियम भारत में बजाए विकल्प के आवश्यक कर देना चाहिए, किसी धर्म के कठमुल्ले विचारों की परवाह किए बगैर। मुझे लगता है कि संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रसवगृह में जूझते छोड़ अस्पताल के बाहर चाय आमलेट उड़ाते हिंदुस्तानी पतियों को जब तक सृजन में होने वाली वेदना का साक्षात दर्शन नही होगा, उन्हें सृजन की पीड़ा का पता नहीं चलेगा। अगर एक बार यह हो जाए तो अंधाधुंध बढ़ती आबादी पर रोक लगाने की अक्ल भी आ जाएगी और दुर्गा, सीता का नाम ले लेकर कन्या भ्रूण के खून से हाथ रंगने से पहले हाथ भी कांपेंगे।

ख़ैर निश्चित दिन पर हम अस्पताल पहुंचे और कमरा देख कर दंग रह गए। अच्छा ख़ासा होटल का कमरा दिख रहा था। आक्सीजन सिलेंडर, ग्लूकोज़ चढ़ाने की नली और बाकी संयत्र वस्तुतः कमरे की दीवारों में लकड़ी की दीवारों के पीछे छिपे थे, ताकि किसी को उन्हें देख कर अनावश्यक मानसिक तनाव न हो। श्रीमती जी के लिए टीवी सेट भी लगा था और उसपर प्रेटीवीमेन चल रही थी। कुछ देर में डाक्टर आए तो श्रीमती जी ने निर्देश थमा दिया कि उन्हें पुत्र या पुत्री का क्या नाम रखना है। श्रीमती जी को दो–दो शंकाएं थी, पहली कि शायद हमने उन्हें पुत्र वाली सूचना मन बहलाने के लिए बता रखी है और दूसरी कि प्रसव के बाद उनकी बेहोशी का फ़ायदा उठाकर कहीं हम बर्थ सर्टिफ़िकेट पर बांकेबिहारी नाम न चढ़वा दें। डाक्टर उन्हें आश्वस्त करके शल्यकक्ष ले गए मुझे बाहर खिड़की के पास इंतज़ार करने की सलाह देकर।


करीब पंद्रह मिनट बाद ही एक नर्स हाथ में गुलाबी सा खिलौना लिए आ रही थी हमारी ओर। श्री–श्री एक हज़ार आठ बांके बिहारी जी महाराज का पदार्पण हो चुका था हमारे परिवार में। माननीय बांके जी की भरपूर फ़ोटो खींची गईं। श्रीमती जी को बहुत कोफ़्त हो रही थी अस्पताल में। शाकाहारी भोजन के नाम पर उबली गोभी, गाजर खानी पड़ रही थी और बाहर से खाना लाने पर पाबंदी थी। एक नरमदिल नर्स उन्हें जूस और फल वगैरह देकर दिलासा दे जाती थी। तीन दिन बाद हमें छुट्टी मिल जानी थी। छुट्टी वाले दिन दो अनुभव हुए। यह बताया गया कि बच्चे की कार सीट लाए बिना आपको बच्चा घर नहीं ले जाने दिया जाएगा। मेरे पास कारसीट थी पर नवजात शिशु के लिए 'हेडरेस्ट' एक विशेष किस्म का तकिया लाना रह गया था। 'टवायस आर अस' गया तो एक सेल्सगर्ल ने पूछा कि बेटे के लिए लेना है या बेटी के लिए। जवाब सुनने पर वह कुछ परेशान होकर बोली अभी मेरे पास कोई नीला 'हेडरेस्ट' नही है सिर्फ़ गुलाबी है। उसने गुलाबी 'हेडरेस्ट' देते हुए कहा कि दो दिन बाद आकर नीले रंग वाले से बदल लेना। मैं सोच रहा था कि माना गुलाबी रंग लड़कियों पर फबता है पर 'चलता है' वाली प्रवृति के चलते उसकी सलाह नज़रअंदाज़ कर दी।

गुलाबी या नीला                                   

 

अस्पताल में डाक्टरों ने भली–भांति कारसीट की जांच की, गुलाबी हेडरेस्ट देखकर नाक सिकोड़ी और पूरे दो घंटे तक निर्देश दिए कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। कुछ बातें जहां काम की थी वहीं कुछ सलाह अजीबोग़रीब लग रहीं थी। जैसे कि बच्चा अगर रात में रोए तो या तो भूखा होगा या उसका बिस्तर गीला होगा। कुछ ऐसा लग रहा था कि हम नए माडल कि कार घर ले जा रहे हो और सेल्समैन उसके फीचर्स के बारे में विस्तार से बता रहा हो। बांके बिहारी हमें टुकुर–टुकुर देख रहे थे, मानो कह रहो हों 'पिताश्री, ठीक से निर्देश समझ लो। बाद में न कहना कि हमने रात में गदर क्यों काटी है या आप सबको हर दो–दो घंटे में क्यों उठा रहा हूं। यह सब तो पैकेज्ड़ डील है।' अस्पताल से घर आने के पंद्रह दिन में ही पिंक या ब्लू का अमेरिकी कांसेप्ट अच्छी तरह से दिमाग़ में घुस गया। हर मिलने वाला छूटते ही कहता था कि बड़ी सुंदर बेटी है हमारी। हम हैरान कि अच्छा ख़ासा लड़का सबको लड़की क्यों दिख रहा है। किसी अनुभवी दोस्त ने बताया कि यह समस्या लेबलिंग की है। अगर आटे की बोरी पर चावल का भी लेबल लगा दो तो एक औसत अमेरिकी उसे आटे के दाम पर ख़रीद लेगा। यहां मैंने बांके की कारसीट में गुलाबी 'हेडरेस्ट' लगाकर लड़की होने का लेबल लगा दिया था।

 

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 15

 अमेरिका वापसी और हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण  

 

 भारत से  वापसी हुई तो डलास से भी रुख़सत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फ़िलाडेल्फ़िया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका के दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ़ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था। वैसे यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। सत्यनारायण अपने बर्फ़ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फ़ीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। इस बार लेकिन कोई विकल्प नहीं था। दिसंबर का मौसम था और डलास से फ़िलाडेल्फ़िया, सौलह सौ मील लंबा ड्राइव करना संभव नहीं था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फ़िलाडेल्फ़िया का रुख़ किया। फ़िलाडेल्फ़िया में एक छोटे से उपशहर, जिसे हम यहां सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा 'किंग आफ प्रशिया'। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा पर सभी निरुत्तर थे। इतिहास खंगालने पर भी यही पता चला कि 1851 में किसी सर्वेक्षणकर्ता ने किसी होटल पर किंग आफ प्रशिया लिखा देख कर पूरे कस्बे का नाम यही समझ लिया, अब वह होटल वाला खुद किंग था या प्रशिया से आया था, खुदा जाने।


बांके बिहारी


किंग आफ प्रशिया में आने पर पता चला कि हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण होने जा रहा है। इसमें एक अमेरिकी शामिल हो जाएगा। इस नए मेहमान के आने की तैयारियां शुरू हो गई। एक ऐसे ही शनिवार को नए अमेरिकी के संभावित नाम पर विचार विमर्श चल रहा था। आजकल बच्चों के इतने क्लिष्ट नाम रखे जा रहे हैं जिनको अंग्रेज़ी में 'टांग ट्विस्टर्स' की संज्ञा दी जा सकती है। उस पर तुर्रा यह कि कभी–कभी खुद मां बाप को पता नही होता कि नाम का मतलब क्या है। फिर कई बार एक देश में रखा नाम दूसरे देश में मुसीबत बन जाता है। कुछ अक्षरों का तो अमेरिकन अंग्रेज़ी में वजूद ही नहीं। खुद मेरे नाम में आने वाला 'त' कभी ड कभी ट बना डालते हैं यहां लोग।

हालांकि मेरे एक मित्र वाजिद की तो शामत ही आ गई थी। बेचारे ने बड़े अरमान से अपने जिगर के टुकड़े का नाम फख्र रख दिया। पर हर मेहमान, हर रिश्तेदार उनकी बुद्धि पर तरस खाते हुए उन्हें बच्चे का नाम बदलने की सलाह देने लगा। वाजिद भाई भी अपनी पसंद पर अड़े रहे। पर बच्चे ने स्कूल जाना शुरू करने और समझदार हो जाने पर गदर काट दी कि या तो हमारा नाम बदलो या हमारा स्कूल। देर से ही सही वाजिद भाई को बात समझ में आ गई और तमाम अदालती सरकारी खर्चों के बाद फख्र मियां सलीम बन गए। कुछ ऐसे ही संस्कृति के कीडे. ने हमें काटा और हमें सूझा कि अगर हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो हम उसका नाम बांके बिहारी रखेंगे। न जाने क्यों श्रीमती जी को यह नागवार गुज़रा। उनको केशव–ए–माधव वगैरह नाम पुरातन पंथी लग रहे थे जबकि बांके नाम से गुंडेपन का अहसास हो रहा था। इस मुद्दे पर गंभीर मतभेद हो गए।


बच्चों की बरसात


नए मेहमान के लिए हम सपरिवार 'टवायस आर अस' गए। यहां नवजात शिशुओं के लिए एक सेक्शन ही अलग बना होता है। वहां हमारे सरीखे. कई परिवार ख़रीदारी में लगे थे। ऐसी–ऐसी चीज़ें जो कभी न देखी न सुनी। हमें किंकर्तव्यविमूढ़ देख एक सहायिका ने पूछा कि क्या हम बेबीशावर की योजना बना रहे हैं। इस सवाल पर हम से ज़्यादा हमारी बेटी चकित थी कि भला बच्चों की बरसात कैसे हो सकती है और अगर बच्चे बरसने लगे तो कैसा नज़ारा होगा। इस नए शब्द का मतलब भी जल्द समझ में आ गया, 'बेबी शावर' बहुत कुछ उत्तर भारत में होने वाली गोद भराई की रस्म जैसा उत्सव होता है।

पर यहां आपके घर अनचाहे या एक सरीखे दो तीन उपहार न आ जाए इसके लिए आप अपनी पसंद के किसी स्टोर में अपनी मरज़ी की उपहार सूची चुन कर उसे अपने मित्रों या रिश्तेदारों में ईमेल से वितरित कर देते हैं। लोग उसमें से अपनी पसंद या सामथ्र्य के हिसाब से चुनाव करके भुगतान कर देते हैं और उत्सव वाले दिन सारे सामान आपके घर एकसाथ पहुंच जाते हैं। कुछ ऐसा ही शादी विवाह में भी होता है। अगर ऐसा भारत में भी होता तो हर नवविवाहित को छः घड़ियां, तीन आइसक्रीम सेट, बारह लंचबाक्स और बत्तीस थर्मसों का संग्रहालय न बनाना पड़े।

बताओ डाक्टर ने क्या बताया?


कुछ सप्ताह बाद श्रीमती जी का स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान अल्ट्रासाउंड हो रहा था। अमेरिका में बेटे या बेटियों को लेकर मुझे कोई पूर्वाग्रह नही दिखा। हालांकि अल्ट्रासाउंड में नर्स होने वाले बच्चे का लिंग बता सकती है पर बहुत से दंपत्ति इसे अंत तक नहीं जानना चाहते। बच्चे के मामले में कई विशेषाधिकार मां को प्रदत्त हैं। यही अल्ट्रासाउंड में हुआ, नर्स ने श्रीमती जी से पूछा कि क्या वे जानना चाहेंगी कि होने वाले बच्चे का लिंग क्या है। मारे रोमांच के श्रीमती जी ने नहीं में गर्दन हिला दी। नर्स ने यह जानना चाहा कि क्या वे इस सूचना के अधिकार से मुझे भी वंचित रखना चाहेंगीं। पता नहीं क्यों उन्होने नहीं कर दी। फिर क्या था, नर्स ने श्रीमती जी की आंखे ढंक कर मुझे इशारे से बता दिया कि अस्पताल से बाहर आते ही श्रीमती जी का प्रश्न था, "बताओ डाक्टर ने क्या बताया?" मंैने चहुलबाजी में बहाना टिका दिया कि आप तो रोमांच को रोमांच ही रखना चाहती है अतः इसे रहस्य ही रहने दें। पर उनके पास ब्रह्मास्त्र मौजूद था। उन्होंने दांव फेंका कि चूंकि अमेरिका में हमारे रिश्तेदार वगैरह न होने कि वजह से सारी ख़रीदारी हमें ही करनी होगी और वह भी शिशुआगमन से पहले इसलिए मुझे या तो उन्हें सच बता देना चाहिए या फिर दोहरी ख़रीदारी के लिए तैयार रहना चाहिए।

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 14

पागल कौन?


एक रात में मेरे चाचाश्री का फ़ोन आया। वे मिर्ज़ापुर के पास किसी फैक्ट्री में सहायक जनरल मैनेजर हैं। चाचाश्री कानपुर न आ पाने का कारण बता रहे थे। कारण सुन कर सब हंस–हंस कर दोहरे हो गए।

चाचाश्री की फैक्ट्री में कोई गार्ड था संतराम। किसी मानसिक परेशानी के चलते उसका दिमाग़ फिर गया और वह फैक्ट्री में तोड़फोड़ करने लगा। चाचाश्री ने संतराम को दो चौकीदारों के साथ फैक्ट्री के डाक्टर का सिफ़ारशी पत्र देकर रांची मानसिक चिकित्सालय ले जाकर भर्ती कराने का आदेश दिया। चाचाश्री ने दोनों को निर्देश दिया था कि रांची पहुंच कर वहां के डाक्टर से बात करवा दें।

अगले रविवार को चाचाश्री को कानपुर आना था। पर न जाने क्यों दोनों चौकीदारों का रांची पहुंच कर कोई फ़ोन नहीं आया। चाचाश्री दोनों चौकीदारों की गै.रज़िम्मेदारी को लानतें भेजते हुऐ शनिवार को सो गए। रात में बंगले के दरवाज़े की घंटी बजी। चाचाश्री ने लाईट खोल कर देखा तो संतराम खड़ा था। चाची की चीख निकलते–निकलते बची। चाचाश्री ने चाची को संयत रहने का इशारा किया। चाचाश्री ने देखा संतराम फिलहाल तो सामान्य लग रहा था। उसने चाचाश्री को हाथ जोड़कर नमस्कार भी किया। चाचाश्री ने उसे वहीं बैठने को कहा और खुद यथासंभव दिखने की कोशिश करते हुए उससे दस फुट दूर सोफे पर बैठ गए। अब पागल का क्या भरोसा, कहीं हमला ही कर दे। चाचाश्री सोच रहे थे कि शायद यह उन दोनों चौकीदारों से निगाह बचाकर भाग आया है और वे दोनों चौकीदार या तो इसे ढू.ंढ़ रहे होंगे या फिर मारे डर के वापस ही नही आए। उसी उधेड़बुन में चाचाश्री ने संतराम से पूछा,


चाचाश्री : कहो संतराम कैसे हो?
संतराम : जी साहब, दया है आपकी।
चाचाश्री : अकेले आए हो?
संतराम : जी साहब।
चाचाश्री : वह दोनों कहां हैं?
संतराम : कौन साहब?
चाचाश्री : अरे दोनों चौकीदार, जो तुम्हारे साथ रांची गए थे?
संतराम : साहब, उन दोनों को मैं भर्ती करा आया।
चाचाश्री कुर्सी से उछलते हुए : क्या!
संतराम : जी साहब, कल भर्ती कराया था, अगली ट्रेन पकड़ कर मैं डयूटी पर टैम से वापस आ गया।


चाचाश्री ने संतराम को चाय पिलाने के लिए इंतज़ार करने को कहकर दूसरे कमरे में फ़ोन करने आ गए। चाची संतराम पर निगाह रखे थीं। संतराम बिल्कुल सामान्य दिख रहा था। चाचाश्री ने रांची मानसिक चिकित्सालय फ़ोन मिलाया तो सुपरवाईज़र ने बताया कि उनकी फैक्ट्री से एक चौकीदार दो पागलों को भर्ती करा गया है। भर्ती के दिन से दोनों ने बवाल मचा रखा है और रह रह कर दोनों आसमान सर पर उठा लेते हैं। चाचाश्री ने सुपरवाईज़र को बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाया कि उसने पागल को छोड़कर दो भलेमानुषों को भर्ती कर लिया है। चाचाश्री ने अबकी बार छः चौकीदारों को संतराम के साथ रांची भेजा। इस बार संतराम को भर्ती कराने में कोई बखेड़ा नहीं हुआ। पिछली बार गए दोनों चौकीदार वापस आते ही चाचाश्री के पैरों में लौटकर रोने लगे और दुहाई मांगने लगे कि आगे से उन्हें किसी पागल के साथ न भेजें। दोनों ने रांची की कहानी सुनाई।


दोनों चौकीदारों के साथ संतराम बिल्कुल मोम के पुतले की तरह शांत बैठे बैठै रांची तक गया। दोनों ने उसे रिक्शे के बीच बैठाल कर स्टेशन से मानसिक चिकित्सालय ले जाने लगे। मानसिक चिकित्सालय का गेट पास आते ही संतराम रिक्शे से कूदकर भागा और चिकित्सालय के अंदर घुस गया। उसे जो भी पहला डाक्टर दिखा उसके पैर पकड़ कर वह ज़ोर–ज़ोर से रोने लगा। उसने चिल्ला चिल्ला कर कर कहा कि उसे दो पागलों ने घेर लिया है और उसे बाहर बहुत मार रहे हैं।

यह सुनकर डाक्टर ने चार वार्ड ब्वाय बाहर भेजे जहां वाकई दोनों चौकीदार चिकित्सालय की ओर बदहवास से भागे आ रहे थे। वार्ड ब्वायज़ यहीं समझे कि दोनों वाकई पागल हैं और संतराम को ढूंढ़ रहे हैं। दोनों चौकीदारों को जबरदस्ती हवा में टांग के डाक्टर के सामने लाया गया। दोनों खुद को छु.ड़ाने के लिए गुल गपाड़ा मचाए थे और संतराम को पागल बता रहे थे। डाक्टर ने उन्हें डपट कर कहा कि हर पागल खुद को समझदार और दूसरों को पागल कहता है। यह सुनकर चौकीदार वार्डब्वायज़ को पागल बताने लगे। दोनों को बांधने के लिए वार्ड ब्वायज को उन्हें थोड़ा बहुत पीटना भी पड़ा। ज़्यादा हंगामा करने पर उन्हें बेहोशी के इंजेक्शन ठोंक दिए गए। संतराम जी तो उन्हें शान से भर्ती कराकर मिर्ज़ापुर चल दिए, पर वार्डब्वायज़ की पिटाई से उन बेचारे चौकीदारों के शरीर के सारे जोड़ खुल गए।

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 13

 

  

अरोड़ा जी अपने इन्जीनियरिंग कालेज़ ( HBTI ,Kanpur ) में

 

एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिए जाएं। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा .वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा . जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला 'डायरेक्टर साहब अभी ज़रूरी मीटिंग कर रहे हैं, दो घंटे के बाद आइए।' पता नही इन क्लर्कों की आदत होती है या इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डंडा इस्तेमाल किया जाए। सचिव ने पूछ लिया 'कहां से आए हैं, मैंने जब डलास कहा तो उसने मुझे अंदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएंट्री का बोर्ड सिर्फ़ स्वदेशियों के लिए ही होता है।

डा .जैन अंदर किसी से बात ही कर रहे थे। देखते ही पहचान गए। हज़ारों विद्यार्थियों के नाम और शक्ल याद रख सकने की उनकी क्षमता विलक्षण है। कुछ देर तक वे बड़ी आत्मीयता से हालचाल लेते रहे। तभी कुछ सचिव और एक दो प्रोफ़ेसर जिन्हे मैं नहीं जानता था फाइलें लिए अंदर आए। मैंने चलने की अनुमति चाही तो डा .जैन ने मुझसे बैठे रहने को कहा। बाकी सबको बैठने को कहकर उन्होंने मेरा परिचय सबको यह कहकर दिया कि ये डलास से आए हैं, वहीं काम करते हैं। मैं अभी यही सोच रहा था कि डा .जैन ने मेरा परिचय एचबीटीआई के पूर्व छात्र के रूप में क्यों नही दिया।


तभी डा .जैन मुझसे मुख़ातिब हुए और एक सवाल दाग दिया 'अतुल, यह बताओ कि अगर मेरे पास दस लाख रुपये हो और मुझे एचबीटीआई के कंप्यूटर सेक्शन के लिए कंप्यूटर ख़रीदने हो तो मुझे दो विकल्पों में क्या चुनना चाहिए, पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर या फिर पांच–पांच लाख के दो एडवांस वर्कस्टेशन। 'मैनें सीधे बेलौस राय जाहिर कर दी 'पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर लेने चाहिए।' डा .जैन के सामने बैठी मंडली में से कुछ लोग कसमसाए और उनमें कोई कुछ बोलने को हुआ कि तभी डा .जैन ने अगला सवाल दागा 'क्यों?' मैं सोच रहा था कि डा .जैन की आख़िर मंशा क्या है और यह समिति किस बात की मीटिंग कर रही है। पर चूंकि मैं डा .जैन के भूतपूर्व छात्र की हैसियत से वहां गया था इसलिए मैंने समग्र जवाब देना उचित समझा। मैंने कहा, 'सर, अगर कोई मशीन या पुल डिजाईन का कोर्स नही चलाना है इनपर तो डेस्कटाप ही ठीक रहेंगे, जिन एप्लीकेशन पर हम काम करते हैं वही यहां सिखाई जानी चाहिए। जो अभी भी यहां नहीं हैं और उन एप्लीकेशन के लिए डेस्कटाप की क्षमता काफ़ी है। उससे कम से कम एकबार में चालीस छात्रों का भला होगा। अगर आप दो कंप्यूटर ले लेंगे तो एकबार में ज़्यादा से ज़्यादा चार लोग ही उसे उपयोग कर सकेंगे। यह वर्कस्टेशन की क्षमता के साथ नाइंसाफ़ी और पैसे की बर्बादी होगी।'

डा .जैन ने मुड़कर बाकी लोगों पर कटाक्ष रूपी प्रश्न किया, 'सुना आपने, यह राय एक अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियर की है, यही राय मैं दे रहा था तो आप सब मुझे बेवकूफ़ समझ रहे थे और कह रहे थे कि मैं बाबा आदम के ज़माने की तकनीकी पर भरोसा कर रहा हूं।' मैंने वहां वाकयुद्ध छिड़ने से पहले फूटने में भलाई समझी। बाद मे पता चला कि अंदर बैठे लोग कंप्यूटर ख़रीद समिति के सदस्य थे और उन लोगो में ख़रीदे जाने वाले कंप्यूटरों की क्षमता को लेकर मतभेद थे। डा .जैन जानते थे कि उनकी व्यवहारिक सलाह को लोग दकियानूसी समझ रहे थे पर जब उसी सलाह पर अमेरिकी स्वीकृती का मुलम्मा चढ़ गया तो वह काम की बात हो गई।

आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है


अमेरिका में ट्रैफ़िक सिग्नल स्वचालित हैं। इसलिए यहां भारत की तरह चौराहे के बीच न तो मुच्छाड़ियल ट्रैफ़िक पुलिसवाला दिखता है न उसके के खड़े होने के लिए बनी छतरी। कभी कभी किसी समारोह वगैरह में या फिर सड़क निर्माण की दशा में ट्रैफ़िक नियंत्रित करने के लिए आम पुलिसवाले या पुलिसवालियां ही ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। पुलिसवालियां तो खै.र पुलिसवालियों जैसी ही दिखती हैं, पुलिसवाले भी कम स्मार्ट नहीं दिखते। केडीगुरू का मानना है कि इन पुलिसवालों की भर्ती के पहले ब्यूटी कांटेस्ट ज़रूर होता होगा। मैंने भी आजतक एक भी तोंदियल पुलिसवाला नहीं देखा अमेरिका में। खै.र फोटोग्राफ़ी का नया शौक चर्राया था, जेब में कैमरा था और हैलट हास्पिटल के चौराहे पर सफ़ेद वर्दी में एक ट्रैफ़िक हवलदार को देखकर उसकी फ़ोटो लेने की सूझी।

पर यह उतना आसान नही निकला जितना सोचा था। ट्रैफ़िक हवलदार बड़ा नखरीला निकला। पहले पंद्रह मिनट तक उसे यही शक बना रहा कि मैं शायद किसी मैगज़ीन या अख़बार से हूं और किसी लेख वगैरह में पुलिस की बुराई करने वाला हूं और उस हवलदार की फ़ोटो अपने लेख के लिए उपयोग कर लूंगा। वैसे पुलिसवालों की छवि कैसी है यह बताने की ज़रूरत नहीं पर उस वक्त वह दरोगा वाकई काम ही कर रहा था, वसूली नहीं। पर उसे यह कतई हजम नहीं हो रहा था कि कोई भलामानुष अपने व्यक्तिगत एलबम के लिए किसी मुच्छाड़ियल पुलिसवाले की फ़ोटो भला क्यों लेना चाहेगा। फिर से अमेरिका का तमगा चमकाना पड़ा। पर जो सवाल उस दरोगा ने किया उसकी उम्मीद बिल्कुल नही थी। उसने पूछा 'आप कह रहे हैं कि आप अमेरिका में रहते हैं पर आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है।' मैं सोच रहा था कि पुलिसवालों की भर्ती के पहले जनरल नालेज का टेस्ट नही होता क्या।

 

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 12

कनपुरियोँ से अरोड़ा जी की भिड़न्त 

 

दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाडू लग रही थी, सारे कर्मचारी नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आइए। यहां सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बंद किवाड़ खुलने लगे थे और जेटलैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यावहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घंटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया।

थोड़ी देर में बैंक का चपरासी पहचान गया। दरअसल इसी शाखा में मेरे एक चाचाश्री मैनेजर रह चुके थे, अब उनका ट्रांसफर हो गया था। पर उनकी तैनाती के दिनों में यही चपरासी घर पर बैंक की चाभी लेने आता था। चपरासी का नाम भी याद आ गया शंभू। शंभू ज़ोर से चिल्लाया "अरे भईया आप यहां? कहां थे इतने दिन?" शंभू पंडित को यह तो पता था कि मैं कानपुर से बाहर काम करता हूं पर उसके "बाहर" की परिधि शायद हद से हद दिल्ली तक थी। मैंने भी अनावश्यक अमेरिका प्रवास का बखान उचित नहीं समझा और उसे टालने के लिए कह दिया कि बाहर काम कर रहा था, इसलिए अब कानपुर कम आता हूं। पर शंभू पंडित हत्थे से उखड़ गए। लगे नसीहत देने, "अरे भईया, कोई इतनी दूर भी नहीं गए हो कि दोस्तों के जनेऊ शादी में न आ सको। अरे, दिल्ली बंबई का किराया भी ज़्यादा नहीं है।" अब शंभू पंडित खांमखां फटे में टांग अड़ा रहे थे। उनको रंज था कि मैं अपने कुछ दोस्तों की शादी वगैरह में कानपुर नहीं पहुंचा था। शंभू पंडित के इस तरह से उलाहना से बड़ी विकट स्थिति हो रही थी।


भांडाफोड़ करना ही पड़ा, शंभू पंडित को जवाब उछाला, "अबे, अमेरिका में था, अब यहां हर महीने थोड़े ही आ सकता हूं?" इतना बोलना था कि आस–पास खड़े लोग मुड़कर देखने लगे और पहचानने की कोशिश करने लगे। यहां तक की बैंक मैनेजर के केबिन से आवाज़ आई, "अबे शंभू, कौन है? किससे बात कर रहे हो?" शंभू पंडित को यह ज़ोर का झटका धीरे से लगा था, सकपका कर बोले, "साहेब, अरोरा साहब के भतीजे हैं, अमेरिका में रहते हैं।" केबिन से फिर आवाज़ आई, "अबे तो उन्हें बाहर क्यों खड़ा कर रखा है।" एक मिनट के अंदर ही मैं मैनेजर साहब से मुखातिब था। मैनेजर साहब ने क्लर्क को केबिन में बुलाकर मेरे काम करवा दिया और अमेरिका के बारे में अपनी कुछ भांतियों का निराकरण करवाया। मेरा काम तो हो गया था पर मैं सोच रहा था वह अस्सी लोग जो लाइन में खड़े थे उन्हें क्या मैनेजर साहब बेवकूफ़ समझते थे जिनके ऊपर किसी भी नेता, अभिनेता, वीआईपी या एनआरआई को तवज्जो दी जा सकती है और वे उफ्फ तक नहीं करते।

एनआरआई तमगा

 

बार फिर फ़जीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यों कि लखनऊ फ़ोन करना था। वर्ष 2000 में मोबाईल डब्ल्यूएलएल, आरआईएल, और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुंचा और लखनऊ का नंबर मिलाने लगा। दो–तीन बार प्रयास के बाद भी नंबर नहीं लग रहा था। संचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद संचालक कहीं तशरीफ़ ले गए थे और अपनी बहन को बैठाल गए थे। ख़ैर उस कन्या ने पूछा कि आपका नंबर तो सही है। मेरे हिसाब से तो सही होना चाहिए था, अभी पिछले ही महीने तो अमेरिका से मिलाया था। जब एक बार फिर मिलाने लगा तो कन्या ने टोका,
कन्या : 'आप क्या कर रहे हैं?'
मैं : लखनऊ का नंबर मिला रहा हूं।
कन्या : वह तो ठिक है पर एसटीडी कोड क्या मिला रहे हैं?
मैं :522, क्यों यह नही है क्या?
कन्या : 522 तो ठीक है पर ज़ीरो क्यों नहीं लगा रहे?
मैं : ज़ीरो दरअसल अमेरिका में आदत पड़ गई थी 011 91 522 नंबर मिलाने की, अब यहां 011 91 टपका कर शेष नंबर मिला रहा था।
कन्या : ज़ीरो मतलब शून्य!
 :मैं   अरे मुझे पता है ज़ीरो मतलब शून्य।
कन्या : लेकिन आप 522 के पहले शून्य क्यो नही लगा रहें? क्या पहली बार एसटीडी डायल किया है?


कन्या को अब कुछ शक हो चला था कि मैं शायद घाटमपुर सरीखे किसी देहात से उठकर सीधे शहर पहुंच गया हूं और शायद ज़िंदगी में पहली बार एसटीडी मिला रहा हूं। अब तक बाकी ग्राहकों की दिलचस्पी भी मुझमें बढ़ चली थी। सबकी तिर्यक दृष्टि से स्पष्ट था कि मैं वहां एक नमूना बनने जा रहा था, जो शक्लोसूरत और हावभाव से तो पढ़ा लिखा दिखता था पर उस नमूने को एसटीडी करने जैसे सामान्य काम की भी तमीज़ नही थी। मुझे याद आ गया कि करीब डेढ़ साल पहले एसटीडी मिलाने से पहले जीरो लगाने की आदत अमेरिका में आईएसडी मिलाते मिलाते छूट गई थी और यहां मैंने सिर्फ़ आईएसडी कोड हटाकर ज़ीरो न लगाने की नादानी कर डाली थी। खांमख़ा बताना पड़ा कि मैं ज़ीरो मतलब शून्य लगाना क्यों भूल रहा था।

अब उस षोडशी की दिलचस्पी यह जानने में पैदा हो गई थी कि मैनें कित्ते पैसे देकर अमेरिका में नौकरी हासिल की थी। निम्न मध्यवर्ग जिसे अमेरिका में स्किल्ड लेबर्स कहते हैं, अपने खेत खलिहान बेचकर भी खाड़ी या लंदन में काम पाने की फिराक में रहता है। यह चलन वैसे पंजाब में कुछ ज़्यादा है। डाटकाम के बुलबुले अभी दिल्ली, बंबई से कानपुर सरीखे शहरो तक नही पहुंचे थे इसलिए किसी भी कनपुरिए को किसी ऐसे एनआरआई कनपुरिया जो अभी भी कानपुर में एलएमएल वेस्पा पर घूम रहा हो देख कर ताज्जुब करना स्वाभाविक ही है।

Contd..

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 11

अरोड़ा जी  NRI बनकर कानपुर छुट्टी पर लौटे..

 

 


 

डेढ़ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गईं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुंचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सवेरे के समय पहुंचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते–आते रात हो गई थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आंखों में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूंढ़ते–ढूंढ़ते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की ज़मीन छुई तो प्लेन के अंदर सारे बच्चों ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखकर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत मां की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षों बाद लौटे थे, हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गए।


हम नहीं सुधरेंगे


हालांकि थोड़ी ही देर में सारा हर्ष गर्म मक्खन की तरह पिघल कर उड़ गया जब कन्वेयर बेल्ट पर अपना सामान नदारद मिला। पता चला कि ब्रसेल्स और ज्युरिख के बीच एअरलाईन वाले सामान जल्दी में नहीं चढ़ा पाए अतः अगली उड़ान में भेजेंगे। उन लोगों ने मेरा सामान निकटतम एअरपोर्ट यानि कि लखनऊ भेजने का वायदा किया। अब मैं हाथ में इकलौता केबिन बैग लेकर ग्रीन चैनल की ओर बढ़ा जहां कस्टम आफ़िसर्स से पाला पड़ा। मेरे बैग में एक अदद सस्ता सा कॉर्डलेस और मेरे कपड़े थे। कस्टम आफ़िसर को वह दस डालर वाला फ़ोन कम से कम सौ डालर का मालूम हो रहा था। मुफ़्त में उसे 900 और 2•9 के फ़ोन का अंतर समझाना पड़ा। हालांकि आजकल कस्टम वाले ज़्यादा तंग नहीं करते, शायद उपर से सख्ती है या फिर अब विदेशी सामान का ज़्यादा क्रेज़ नहीं रहा। पर वर्ष 2000 में स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।

मेरे एक मित्र श्रीमान वेदमूर्ति जिन्हें अक्सर काम के सिलसिले में भारत जाना पड़ता था, इन कस्टम वालों की चेकिंग से अज़िज़ आकर किसी खडूस कस्टम क्लर्क को अच्छा सबक सिखा आए थे। जनाब ने किसी चाईनाटाउन से ऐसा सरदर्द वाले बाम की डिब्बियां ख़रीदी थी जिनपर अंग्रेज़ी में कुछ न लिखा था, इन डिब्बियों को जनाब वेदमूर्ती ने वियाग्रा जेली बताकर इंदिरा गांधी हवाईअड्डे पर कस्टम क्लर्क को टिका दिया था। अब आगे क्या हुआ, यह जानने से बचने के लिए जनाब वेदमूर्ति यथासंभव इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर जाने से कतराते हैं।


इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?


दिल्ली से कानपुर का सफ़र शताब्दी पर कट गया। सुना है कि दूसरे की दाल में घी हमेशा ज़्यादा दिखता है। यही कहावत आज खुद पर चरितार्थ हो रही थी। पहले रास्ते में पड़े गांव कस्बे जिनको महज़ डेढ़ साल पहले ट्रेन से देखने लायक नहीं समझता था और सिर्फ़ सफ़र का अनचाहा हिस्सा लगते थे, आज बेहतरीन लैंडस्केप का नमूना लग रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली रेल क्रासिंग पर ट्रैक्टर, मोटरसाईकिल और साईकिल पर सवार लोग, लगता था कि बिल्कुल बेतक़ल्लुफ़ और हमारी तेज़रफ़्ता ज़िंदगी के मुकाबले कितने बेफिक्र हैं। मेरी इस राय से मेरे साथ चल रहे मेरे साले साहब यानि कि राजू भाई भी इत्तफ़ाक़ रखते हैं। मज़े की बात है कि राजू भाई को कानपुर की ज़िंदगी तेज़रफ़्ता लग रही है। अपने–अपने पैमाने हैं, पर साफ़ दिख रहा है कि सारे भौतिक सुख बटोर लेने की चाहत ने हमारे कानपुर, लखनऊ सरीखे शहरों में भी अदृश्य एचओवीलेन पैदा कर दी हैं। शेरो–शायरी का कोई ख़ास शौक तो नहीं मुझे पर एक ग़ज़ल का टुकड़ा याद आता है, "इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों है?"


ओमनी वैन


कानपुर सेंट्रल पर पूरा परिवार अगवानी करने आ गया था। हमारे चाचाश्री किसी मित्र की मारूति ओमनी वैन मय ड्राइवर के ले आए थे। आख़िर भतीजा अमेरिका से आ रहा है, मजाल है कि आटो या रिक्शे पर चला जाए। पिछली दो सीटों पर जहां अमेरिका में महज़ पांच लोग बैठते हैं, यहां आठ दस लोग बैठ गए थे। मैं ड्राइवर के बगल में बैठा तो बगल के दरवाज़े से चाचाश्री प्रविष्ट हुए यह कहते हुए कि 'ज़रा खिसको गुरु।' खिसकने के लिए गियर के दोनों तरफ़ पैर डालने पड़े। अब दायीं तरफ़ से ड्राइवर साहब गुज़ारिश कर रहे थे कि भाईजान ज़रा गियर लगाना है, पैर खिसका लीजिए। उधर सामने सड़क पर गाय, भैंसे और साइकिलें, मालुम पड़ रहा था कि विंडस्क्रीन से चिपके हुए चल रहे हैं और कहीं गाड़ी से लड़ न जाए। ऐसा नहीं था कि मैं इन चीज़ों का आदी नहीं हूं, अरे भाई पूरे दस साल मैंने भी साइकिल, टीवीएस चैंप और एलएमएल वेस्पा इन्हीं सड़कों पर चलाई है और ऐसी चलाई है कि जान अब्राहम भी नहीं चला सकता। पर महज़ एक साल के अमेरिका प्रवास ने आदत बिगाड़ दी है। अपनी ही सड़क पर हल्की सी दहशत मालूम हो रही है। सिर्फ़ एक समझदारी की मैंने, कि वैन में यातायात पर कुछ नहीं बोला, नहीं तो पिछली सीट पर बैठे भाई–बहनों की टीकाटिप्पणियों की बौछार कुछ यों आती।


'एक ही साल में रंग बदल गया।'
'रंगबाजी न झाड़ो।'
'जनाब एनआरआई हो गए हैं।'
'यह अटलांटा नहीं कानपुर है प्यारे।'
कनपुरिये तो अटलांटा में कार दौड़ा सकते हैं लेकिन किसी अमेरिकी की हिम्मत है जो कनपुरिया ट्रैफिक के आगे टिक सके?
सुना है तेरी महफ़िल में
एक पुराना गाना याद आता है जो कुछ यों है–
साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी
सुना है तेरी महफ़िल में रतजगा है।


पूरे 36 घंटों का सफ़र कट गया पर रात में जेटलैग शुरू हो गया। इस बला से लंबी हवाई यात्रा कर चुके लोग वाकिफ़ हैं। दरअसल अमेरिका से भारत आते हुए आप समय की कई स्थानीय सीमाएं लांघ कर आते हैं। अमूमन अगर आप अमेरिका से शाम को चलते हैं जब भारत में स्थानीय समय के हिसाब से सुबह होती है। भारत का समय आम तौर पर अमेरिका से 11 घंटे आगे चलता है। इसीलिए शुरू में कई रिश्तेदार जो इस अलबेले समय के झमेले से नावाकिफ़ थे, फ़ोन करने पर हैरान होते थे कि उनके सोने जाने के समय मैं सवेरे की चाय कैसे पी रहा हूं? जब आप दिल्ली पहुंचते हैं तो आपका शरीर उस 11 घंटे की समय सीमा को तुरंत नहीं लांघ पाता। उसे भारत के दिन में रात महसूस होती है। इसीलिए रात के दो तीन बजे नींद खुल जाती है और दोपहर में आदमी सुस्ती महसूस करता है। हालांकि कुछ लोग इसे एनआरआई लटके झटके समझ लेते हैं।

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 10

 अमेरिकन स्वतंत्रता दिवस की मस्ती

 

 

अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस 4 जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती हैं 'सारे जहां से अच्छा' की स्वर लहरियां, रंग बिरंगी झंडियां, स्कूल में बंटने वाले बूंदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गांधी ने कितनी बार 'हम देख रहे हैं' या 'हम देखेंगे' कहा। यहां माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह–जगह स्टार और स्ट्राइप्स यानि अमेरिकी झंडा तो दिखता है, पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिख सकता है। पूरी आज़ादी है आपको अमेरिकी झंडा लगाने की और तो और लोग स्टार और स्ट्राइप्स वाली टी शर्ट और बनियान तक पहन डालते हैं। चारों ओर सेल के नज़ारे। हां, शाम को तकरीबन हर शहर में संगीत समारोह, खाना–पीना और धुआंधार आतिशबाज़ी ज़रूर होती है।


इस अवसर पर होने वाली तीन दिन की छुट्टी का देशी बिरादरी जम कर सदुपयोग करती है। यह निर्भर करता है आपके प्रवास के अनुभव पर। हमारे सरीखे नए नवेले अप्रवासी पूरे दिन पर्यटन पर खर्च कर डालते हैं। अक्सर मित्रों के साथ भ्रमण रोमांच को दुगना कर देता है। डलास में चार जुलाई को रूबी फॉल यानि जलप्रपात देखने का कार्यक्रम निर्धारित हुआ। केडीगुरू साथ चल रहे थे। केडीगुरू हमारे कालेज के ज़माने के कनपुरिया मित्र हैं। ख़ासे ज़िन्दादिल और शौकीन तबियत के इंसान। हांलांकि स्वभाव के मामले में थोड़े प्रेशर कुकर हैं यानि कि संयम बहुत जल्दी खो देते हैं पर जल्द ठंडे हो जाते हैं।

तो जनाब डलास से हम और केडीगुरू एक साथ चले टेनेसी चैटेनोगा की ओर। रास्ते में मैने ध्यान दिया कि केडीगुरू ड्राइव करते हुए कुछ–कुछ कनपुरिया टेंपो वाले की भांति खुली हथेली स्टेयरिंग पर चिपका कर गाड़ी मोड़ रहे थे और लेन चेंज करते समय कंधे को मिथुन चक्रवर्ती की तरह झटका देते थे। यह प्रक्रिया अनवरत चलने पर मैने अपने कौतूहल को रोकना उचित नहीं समझा। पता चला कि केडीगुरू ने भारत में अपने ड्राइवर से कार चलाना सीखा था और यह दो गुर बोनस में सीख लिए थे। मुझे मक्षिका स्थाने मक्षिका वाल किस्सा याद आ रहा था जिसमें एक नकलची अपने से आगे वाले परीक्षार्थी की कॉपी लाइन दर लाइन टीपते समय एक जगह आगे वाले की कॉपी में मरी मक्खी चिपकी देखने पर एक मक्खी मार कर ठीक उसी जगह चिपका देता है।


पढ़े लिखे भी झाड़ू लगाते हैं


केडीगुरू ने मज़ेदार आपबीती सुनाई। वे ऑफिस से घर का रास्ता लोकल टे्रन से तय करते हैं। एक दिन स्टेशन जाते समय वे फुटपाथ पर चल रहे थे। कुछ सोचते–सोचते केडीगुरू का सूक्ष्म शरीर चांदनी चौक पहुंच गया और स्थूल शरीर टेनिसी के फुटपाथ पर चलता रहा। रास्ते में एक भीमकाय अश्वेत झाड़ू लगा रहा था। और अमेरिकन सभ्यतानुसार केडी गुुरू से, "हाई मैन, हाउ यू डूइंग" बोला। केडीगुरू बेखुदी में सोचने लगे कि क्या ज़माना आगया है जो पढ़े लिखे अंग्रेज़ीदां लोगों को भी झाड़ू लगानी पड़ रही है। केडीगुरू उसकी हालत पर अफसोस प्रकट कर सरकार को कोसने जा ही रहे थे कि उन्हें ख्याल आया कि वे चांदनी चौक में नहीं अमेरिका में हैं जहां अनपढ़ भी अंग्रेजी ही बोलते हैं।


रूबी फ़ॉल


एक प्रकृतिक करिश्मा है यह मनोरम स्थल। पहले आपको एक पाहाड़ी पर स्थित लिफ्ट से 260 फुट नीचे गुफ़ा में जाना होता है फिर करीब एक मील इस गुफ़ा में चलना होता है। हज़ारों सालों में पानी के कटाव ने चूने के पत्थरों में कटाव से नयनाभिराम आकृतियां उकेर दी हैं। केडीगुरू और मेरा मानना था कि अगर यह स्थल भारत में होता तो शर्तिया हर कदम पर एक चट्टान के पास एक पंडा दक्षिणा वसूल रहा होता उनको शिवलिंग या संतोषी माता का स्वरूप बताते हुए। गुफ़ा के अंत में घुप अंधेरा था। नेपथ्य में मधुर संगीत के साथ पानी की आवाज़ विस्मय पैदा कर रही थी। गाइड ने जब बत्तियां जलाईं तो सामने से 145 फुट की ऊंचाई से गिरता रूबी जलप्रपात दिखाई दिया।

 

भइये एंकर तो पानी में फेंक दो


चैटनोगा में एक झील में हम लोगों को चप्पू वाली नौका चलाने की सूझी। अमेरिकियों ने व्यवसायिकता की हद कर रखी है। टिकट के साथ इंश्योरेंस भी बेच रहे थे। खै.र एक नौका पर केडीगुरू सपत्नीक लपक लिए। मैं किनारे पर दूसरी नाव की बाट जोह रहा था कि देखा केडीगुरू की नाव चकरघिन्नी की तरह सिर्फ गोल ही घूम रही है और केडीगुरू नाव की इस बेजा हरकत पर लाल पीले हो रहे हैं। उनकी पत्नी उन्हें समझाने का प्रयत्न कर रहीं थीं कि शायद नाव चलाने में कोई बेसिक गलती हो रही है पर केडीगुरू को नाव में कोई निर्माणगत ख़ामी नज़र आ रही थी। पंद्रह मिनट बीत जाने पर केडीगुरू ने झल्लाकर अपने हाथ वाला चप्पू ही पानी में फेंक दिया। यह देख कर उनकी पत्नी सन्न रह गयीं। तभी मेरे बगल में खड़े एक भारतीय सज्जन ने कहा, "अपने दोस्त को बोलो, वह नाव का एंकर पानी में क्यों नहीं फेंकता?" इसके बाद केडीगुरू की खिसियानी हंसी, उनकी पत्नी के सैंडिल का चप्पू के स्थान पर प्रयोग कर के नाव को किनारे लाना, दूसरा चप्पू लेना और फिर रास्ते भर उनकी प्रताड़ना — यह सब अब इतिहास बन चुका है।

कैपेचिनो या एस्प्रेसो


वापस आते वक्त चाय की तलब लगी थी पर यहां अगर हर एक्ज़िट रैंप पर चाय का ढाबा और पान की दूकान होती तो क्या बात होती। कुछ ऐसा नज़ारा होता कि एक्ज़िट रैंप पर कारों की कतारें होतीं और पप्पू गप्पू कुल्हड़ में चाय परोस कर कारवालों की खिड़कियों तक पहुंचा रहे होते। लगता है यह सब होते होते पचास एक साल लग जाएंगे। खैर स्टारबक्स से काम चलाने की मजबूरी थी। यह शायद हमारा पहला तजुर्बा था। स्टारबक्स में कॉफी पीने के लिए कम से कम पचास तरह की कॉफी के प्रकार उपलब्ध थे। कैपेचीनो, एक्सप्रेसो, मोचा, लैटे आदि आदि की भूल भुलैया में हमें झाग वाली दूधिया कॉफी याद आ रही थी। केडीगुरू ने कुछ नया ट्राइ करने के चक्कर में कैपेचीनो आर्डर कर दी। काउंटर से सवाल दागा गया— वन शॉट या टूशॉट अब यह जुमला तो मयखाने में ज्यादा चलता है। केडीगुरू गच्चा खा गए और बोले— टूशॉट। हाथ में लगा एक बित्ते भर का गिलास जिसमें दो छंटाक कॉफी सरीखा काढ़ा परोसा गया था। बहुत देर मगजमारी के बाद समझ आया कि उसमें दूध इत्यादि खुद ही दूसरे काउंटर पर मिलाना था। बहरहाल काफी का आनंद लेने के बाद हम वापस घर को चल दिये। हांलांकि केडीगुरू के टू शॉट ने दो घंटे बाद असर दिखाया और उन्हें पेचिश लग गई।

अति व्यवस्था के झटके


रात में हम होटल आकर रूके और दो कमरों में ठहर गए। खाने के लिए मैं और केडीगुरू सामने के पीज़ा रेस्टोरेंट पर आर्डर करने गए। रेस्टोरेंट का दरवाज़ा बंद था और बाहर खड़े दो कर्मचारी धूम्रपान में मशगूल थे। उन्होंने पीज़ा का आर्डर लेने से इनकार कर दिया। उनका दिया तर्क अतिव्यवस्था के दुष्परिणाम दिखा रहा था। रेस्टोरेंट की व्यवस्था के अनुसार एक बार काउंटर बंद हो जाने के बाद वो सिर्फ फोन पर ही आर्डर ले सकते थे। यानि कोई जुगाड़ वाली व्यवस्था नहीं। केडीगुरू दांत पीसते हुए वापस आए और अपने कमरे से दो पीज़ा का आर्डर देकर पेचिश निवारण हेतु बाथरूम में घुस गए। उनकी पत्नी हमारे कमरे में आकर मेरी पत्नी से बात करने लगी। दो मिनट बाद देखा कि एक पीज़ा डिलवरी वाल केडीगुरू के कमरे का दरवाज़ा पीट रहा है। बाहर आकर उससे पीज़ा मांगा तो अगला शगूफा हाज़िर था। पीज़ा हमारे पैसे देने पर और केडीगुरू की पत्नी के यह दिलासा देने पर भी कि आर्डर देने वाला उनका पति है, उन्हें पीज़ा देने को तैयार नहीं था। उनकी पॉलिसी थी कि आर्डर उसी कमरे में सप्लाई होगा जहां के कमरे से आर्डर बुक किया गया था। हमारे सामने पीज़ा वाले को दरवाज़ा पीटते हुए टापते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। दो मिनट बाद केडीगुरू तौलिया लपेटे आग्नेय नेत्रों से हमें घूरते प्रकट हुए। पीज़ा वाले की व्यवसायिक मजबूरी जानने के बाद उनके पास मस्तक ठोंकने के सिवा कोई चारा नहीं था।

वह खिड़की बंद रहती है


नैशविले से वापस आते हुए बड़ा संगीन कांड हो गया। अंधेरा छा गया था और डलास आने में करीब दो घंटे बाकी थे। रास्ते में हमने रात्रिभोज करने के लिए एक कस्बे में कर रोकी। एक चाइनीज़ रेस्टोरेंट में खाने का आर्डर दिया कि तभी मेरी चारुचंद्र को फ्रेंच फ्राई खाने की हठ सवार हो गई। केडीगुरू स्नेहवश खुद ही सड़क के दूसरी तरफ बने मैक्डॉनल्ड में पैदल ही फ्रेंच फ्राई लेने चल दिए। करीब 15 मिनट बाद केडीगुरू एक पुलिस आफिसर के साथ नमूदार हुए जो यह तसल्ली करना चाहता था कि उनके साथ और कौन है। हमें देखने के बाद पुलिस वाला खिसियानी हंसी हंसने लगा और केडीगुरू भुनभुनाने लगे। दर असल बदकिस्मती से मैक्डानल्ड का रेस्टोरेंट बंद हो गया था। सिर्फ ड्राइवइन खुला था। ड्राइव इन वह खिड़की है जो रेस्टोरेंट के अंदर जाए बिना आप कार में बैठे बैठे खाने के सामान का आर्डर दे सकते हैं और भुगतान कर के अपना सामान ले सकते हैं। केडीगुरू उस खिड़की पर पैदल पहुंच गए और उनकी खिड़की के कांच पर उंगली से ठक ठक कर के खिड़की खुलवाने का आग्रह करने लगे। कमअक्ल रेस्टोरेंट वालों ने शायद पहली बार ड्राइव इन खिड़की पर वॉक इन ग्राहक देख कर उन्हें कोई चोर उचक्का समझ लिया और पुलिस बुला ली थी।

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 9

पापड़ और जलेबी 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

होटल में तीन दिन रुकने के बाद हम नए अपार्टमेंट में गए।। सामान पहुंचाते–पहुंचाते रात के एक बज गए। अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी। मेरे पार्किंग लॉट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी। मैने कुछ देर के लिए एक आरक्षित किंतु खाली पार्किंग लॉट हथिया लिया। अपार्टमेंट में समान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए। सीधे सवाल दागा कि क्या यह करोला तुम्हारी है। मैने बड़ी जल्दबाज़ी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लॉट में किसी ने हथिया रखा है अतः मैने दूसरे पार्किंग लॉट का प्रयोग कर लिया। वृद्ध सज्जन का अगला बाउंसर था, आपका पार्किंग लॉट हथिया लिया गया हो तो इसका यह मतलब नहीं कि आप भी किसी का पार्किंग लॉट हथिया लें। आप गेस्ट लॉट का प्रयोग कर सकते थे। जवाब बिलकुल वाजिब था। चांदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था। मैने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लॉट प्रयोग किया था, मैं अभी ख़ाली करता हूं। लेकिन वे भद्र पुरुष 'कल से ध्यान रखना' की हिदायत देते हुए ओझल हो गए। बात आई गई हो गई।


डलास की धूप देखकर मेरी मेमसाहब की बांछें खिल गयीं। पूरे दो साल बाद पापड़ बनाने का स्वर्णिम अवसर जो उनके हाथ लगा था। शाम को आफिस से वापस आया तो डलास की धूप में सूखे पापड़ चाय के साथ हाज़िर थे। एक मज़ेदार प्रहसन हो गया उसके बाद। मेमसाहब ने बताया पापड़ बनाते समय नीचे की मंज़िल पर रहने वाला कोई अमरीकी उनका दोस्त बन गया है। अधेड़ उम्र का व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है और भारतीय भोजन का शौकीन है। उसने मेमसाहब को पापड़ बनाते देखकर पूछा होगा कि तुम क्या कर रही हो। मेमसाहब ने उसे पापड़ पुराण सुना दिया। बंदा पापड़ प्रेमी निकला। उसने मेमसाहब को आसपास के सारे भारतीय रेस्टोरेन्ट के नाम गिना डाले। साथ ही उन्हें यह भी सलाह दे डाली कि चूंकि तुम लोग नए हो अतः मैं तुम्हारे शौहर को आसपास की सभी ज़रूरी चीज़े पते ठिकाने बता दूंगा। हांलांकि उसने यह भी स्वीकार किया कि भारतीयों को यहां अपने सामाजिक कौशल के चलते स्थापित होने में ज्यादा कष्ट नहीं उठाना पड़ता। मेमसाहब ने घोषणा की कि छोले भटूरे बने हैं और मैं उनके नए दोस्त को भी कुछ छोले भटूरे दे आऊं। इसी बहाने किसी काम के आदमी से जान पहचान हो जाएगी। मेरे यह कहने पर कि यहां के लोग ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं करते मेमसाहब ने उनके मिलनसार एकाकी और अधेड़ होने की दुहाई दे डाली।


मैं तब भी अड़ा था कि यहां के लोग शायद ही हमारी तरह ताउम्र विवाहित रहते हैं। असुविधा की वजह से बच्चे न पाल कर कुत्ते बिल्ली पालते हैं और परिवार की जगह कार और मकान जैसी बेजान चीजा पर ज्यादा समय व ध्यान देते हैं। इसी वजह से अकेले रहते–रहते खड़ूस हो जाते हैं, पर मेरी संवेदनशील पत्नी अगर किसी का भला करने पर अड़ जाए तो सारे तर्क कुतर्क व्यर्थ हैं। वह सामाजिकता, संवेदनशीलता और धार्मिक परमार्थ आदि के इतने तर्क प्रस्तुत करेंगी कि उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। झख मार कर मैं छोले भटूरे की प्लेट लेकर नीचे वाले अपार्टमेंट में गया और घंटी बजाई। अपने इस नए पड़ोसी से मैने बताया कि मैं उनकी नयी पड़ोसन का पति हूं और उनके लिए मेरी पत्नी ने छोले भटूरे भेजे हैं। पड़ोसी ने मुझे अंदर आमंत्रित किया रोशनी में मेरे दीदार होते ही वे बोले, "मैं तुम्हें पहचानता हूं। हमारा पार्किंग लॉट में विवाद हो गया था पर अब उसे भूल जाओ।" जनाब का नाम बॉब था और वे फोर्ड कार की डीलरशिप में कार्यरत थे।


बॉब को भारतीय भोजन चटपटा होने की वजह से बहुत पसंद था। मुझे उसने एक पेंटिंग दिखाई जिसमें विश्व की सभी प्रकार की मिर्चों के चित्र थे। कुल छप्पन प्रकार की मिर्चों में वह बीस तरह की मिर्चें चख चुका था। बॉब पार्किंग लॉट वाला मामला जल्द ही भूल गया। उसने मुझे एक और तस्वीर दिखा कर उसमें से एक महिला को पहचानने को कहा। यह महिला और कोई नहीं बीस तीस महिलाओं के शिष्ट मंडल से घिरी स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी थीं। उस शिष्ट मंडल में बॉब की दादी भी शामिल थीं। बॉब ने बताया कि वह भारत घूमने जाना चाहता है। उसके पहले वह तैयारी कर रहा है और भारत के बारे में जो कुछ उसे मिला सब पढ़ चुका है।


एक दिन रविवार की सुबह बॉब आवाज़ लगा कर बुलाने लगा। पता चला जनाब अपने पिछवाड़े बार्बेक्यू स्टेक यानि कि भैंसे का मांस पका रहे थे। बोले कि तुम अक्सर भारतीय खाना खिलाते हो आज तुम्हें टेक्सास स्पेशल खिलाता हूं। यह पता चलने पर कि हम शाकाहारी हैं बेचारा बहुत निराश हुआ पर थोड़ी ही देर में कहीं से मैक्सिकन डिश लेकर हाज़िर हो गया। कभी कभी यह देख कर ताज्जुब होता है टेक्सास की बगल में बसे देश मैक्सिको निवासियों की शक्ल सूरत भारतीयों से इस कदर मिलती है कि धोखा हो जाता है।


जलेबी का जलवा


एक दिन शाम को आफिस से घर पहुंचा तो श्रीमती जी हांथ पर पड़ोसन से बरनॉल लगवा रही थीं। पता चला महिला मंडल में पकवान चर्चा के बीच जलेबी का ज़िक्र आगया। सबको एक ही कोफ्त थी कि डलास में सब मिलता है पर किसी को जलेबी नहीं दिखी। एक दक्षिण भारतीय पड़ोसन तो कभी जलेबी नाम की चीज़ से रूबरू ही नहीं हुई थी। मेरी पाक कला सिद्धस्त श्रीमती जी मोर्चे पर कूद पड़ीं। आखिर कानपुर और जलेबी की प्रतिष्ठा का प्रश्न था पर आपाधापी में गर्म तेल मैडम के हाथ पर छलक गया। उनकी प्राथमिक चिकित्सा के बीच मेरा पदार्पण हुआ। फौरन एक 'वॉकइन क्लीनिक' ले गया। डाक्टर ने मरहम पट्टी तो कर दी पर उसे यह चोट कुकिंग में लगी है यह हजम नहीं हो रहा था। वह शंकित था कि कहीं चोट की वजह मियां बीवी में हाथापाई तो नहीं। अब शक की दवा तो हकी लुक्मान के पास भी नहीं थी। पर बुढऊ डाक्टर कुछ देर में समझ गया कि इस दुर्घटना के पहले हम दोनों में सिर फुटव्वल जैसा कुछ नहीं हुआ।

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 8

 

तबादला डलास के लिए  

 

एक दिन सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी। सीधी साधी भाषा में मतलब यह था कि उन्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं थी। और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया। जैसा कि पहले भी बता चुका हूं कि तेज़ी से बदलती तकनीक वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दो चार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है। इन सबके साथ जुड़ी है स्थानांतर की चिर समस्या। यानि कि नए प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान और कार का स्थानांतरण फिर घर का पता, टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नए स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद। ख़ैर बेंच पर आने का पहला सोमवार था। मार्च की गुनगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं नया कुछ तकनीकी मसला पढ़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी। यह मामू का फोन था। मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगरामों ने बिचौलियों के लिए ईजाद कर रखा है। पता चला कि दो घंटे में कोई जनाब इंटरव्यू के लिए फोन करेंगे। फोन आया और सिर्फ यह पूछने के बाद कि मैने कौन–कौन सी विधाओं में काम कर रखा है डलास निवासी साक्षात्कार कर्ता ने निमंत्रण भेज दिया कि भाई आ जाओ डलास में बसने।

 

 

 

दीवानी दुनिया डलास की 

 

अटलांटा से डलास कार यात्रा की ठानी थी। 800 मील यानि लगभग 1300 किलोमीटर का यह रास्ता एकदम सीधा एक हाइवे अटलांटा से शुरू होकर डलास पहुंचता है। हिन्दुस्तान में मात्र दो दिन में 105–130 किलो मीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से 1300 किलोमीटर सफर तय करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचा था। थोड़ी थोड़ी दूर पर रेस्टोरेन्ट, विश्रामगृह, पेट्रोल पंप वगैरह होने और उत्तम कोटि की सड़क ने सफ़र को कष्ट रहित बना दिया। जार्जिया से एलाबामा, मिसौरी एवं लुसियाना होते हुए टेक्सास में दाखिल हुए। पूरा रास्ता दो गलियों का था। सफर मस्ती से कटता रहा। टेक्सास में दाख़िल होते ही प्रांत के स्वागत– पट ने टेक्सास के अक्खड़पन से रूबरू कराया। जहां सारे प्रांत के स्वागत 'वेलकम टु स्टेट' से शुरू होते हैं वहीं टक्सास की बानगी देखिए— 'डू नॉट मेस विद टेक्सास'। जहां तक नज़र जा सकती थी, खेत दिखते थे। कहीं कहीं काउबॉय चरवाहे बाल गोपाल घोड़े पर सवार गाय भैंसों को इकठ्ठा कर रहे थे।


अमरीका के सर्वाधिक क्षेत्र में बसा टेक्सास प्रांत में जहां तक नज़र जा सकती है सपाट ज़मीन दिखती है। मैं हाईवे पर बने स्वागत कक्ष में रुका। सड़क मार्ग के आगंतुकों के लिए सभी प्रांतों में स्वागत केंद्र बने हैं— मुफ्त नक्शे, होटल व रेस्टोरेंट की तालिका, पर्यटन स्थलों की सचित्र जानकारी और सहायता के लिए कुछ कर्मचारी। स्वागत केंद्र के कर्मचारियों ने मुझे डलास तक का रास्ता समझा दिया। कुछ ही घंटों के बाद अपनी मंज़िल डलास डाउन टाउन की खूबसूरत 'स्काईलाइन' दूर से दिखने लगा। अमरीका में गगन चुंबी इमारतों का झुंड 'स्काईलाइन' के नाम से जाना जाता है। और इस शहर की समृद्धि का परिचायक है। हांलांकि हम इसे कंकरीट के जंगल नाम से भी जानते हैं। फिर छे लेन वाले हाई वे से सामना हुआ और कुछ ही देर में मैं अपने होटल में था। स्वागत कर्मचारी ने बताया कोई रवि आपके बगल वाले कमरे में इंतज़ार कर रहे हैं। मैं सोच रहा था, डलास में मैं भला किस रवि को जानता हूं। कमरा खुलवाने पर दार जी रविंदर भाई निकले। दार जी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली से आकाशवाणी को तलाक देकर आए थे।

पंजाब दा पुत्तर


होटल में एकाध घंटे बाद याद आया कि पीजी भाई ने किसी बृज का फोन नंबर दिया था। फोन पर बात करने के आधा घंटे बाद बृजमोहन जी रात्रिभोज के निमंत्रण के साथ हाज़िर थे। ऐसी ज़िंदादिली कम ही भारतीयों में देखने को मिलती है। बृजभाई के साथ डलास में रंग जम गया या फिर उन्हीं की भाषा में नज़ारा आ गया। बृज और दार जी दोनों तंदूरी चिकन के शौकीन थे और होटल में गुलाबी चिकन के साथ दोनों की मीठी पंजाबी बातें, जो ईमानदारी से मेरे 50 प्रतिशत ही पल्ले पड़ती थीं, कानों को बड़ी भाती थीं।


बृज के पास माजदा कार थी दमदार इंजन वाली। माजदा के डैशबोर्ड पर उसने शंकर जी की मूर्ति स्थापित कर रखी थी। बृज भाई ड्राइवर तो उम्दा किस्म के थे पर जब कभी तरन्नुम में गाड़ी चलाते तो ख़ता कर बैठते। अमेरिकी सड़कों पर गल्ती अक्सर महंगी ही पड़ती है। बृज भाई जब भी किसी ऐसी स्थिति से दोचार होने से बचते तो तुरंत शंकर जी के चरण स्पर्श कर के कहते आज तो परम पिता परमात्मा ने बचा लिया। शंकर जी भी सोचते होंगे कि भक्त ने एक तो गाड़ी में उल्टा मुंह कर के बैठाला है, अक्सर तेज़ कार चलाता है और हर ऊलजलूल गल्ती से बचाने का ठेका भी मुझे ही दे रखा है।


एक बार तो शंकर जी ने बहुत बचाया वर्ना हम दोनों को बड़े बेभाव की पड़ती। मैं और बृज एक साथ उसकी कार में जा रहे थे। बृज भाई मस्त मूड में थे बोले कि महाराज मुझे यहां रहते तीन साल हो गए अब तो रास्ते इतने याद हो गए हैं कि आंख मूंद कर भी मंजिल तक पहुंच सकता हूं। यह कहते हुए बृज भाई एक लेन में मुड़े। हम दोनो यह देख कर भौचक्के रह गए कि एक कार तेज़ी से हमारी ही लेन में आ रही है। बृजभाई ने हार्न मारा तो वह चालक उल्टे चोर की तरह हम कोतवालों को डांटते यानि कि हार्न मारते हुए चला गया। पर यह क्या अब तो दोनों लेन में कारें अपनी ही दिशा में आरहीं थीं।

बृज भाई बोले महाराज आज क्या पूरे शहर ने पी रखी है? अब तक मुझे माजरा समझ में आ गया था। ग़फ़लत में हम एक एग्ज़िट रैप में उल्टी दिशा से जा घुसे थे। अब हम दोनों को काटो तो खून नहीं कि गाड़ी को यू टर्न कैसे लगाएं। जब दोनों ही लेन में गाड़िया अपनी तरफ़ मरखने बैल के मानिंद दौड़ती हुई आ रही हैं। मेने बृजभाई से हार्न बजाते रहने को कहा, ताकि दूसरी दिशा वाले सावधान रहें कि हम ग़लत दिशा में हैं। तभी एक पुलिस कार हमारी लेन में आई। हमारी कुछ जान में जान आई। पुलिस वाले ने आकर पहला सवाल् किया हम ग़लत दिशा में कैसे आ गए। बृजभाई ने मासूमियत से जवाब दिया कि हम इस इलाके में नए हैं। रास्ता भूलकर ग़लत लेन में आ गए। अब यू टर्न लगाना मुश्किल लग रहा है। पुलिस वाले ने लाइसेंस वगैरह की जांच पड़ताल के बाद एक और पुलिस वाले की मदद से दोनों लेन बंद कर हमारी कार को यू टर्न में मदद दी। और साथ ही भविष्य में सजग रहने की ताकीद भी की। पुलिस वाले ने हमारी और दूसरी कारों के हार्न की जवाबी कव्वाली सुनकर और हमारी कार दूर से ग़लत दिशा में खड़ी देख कर समझा कि कोई शराबी ग़लत लेन में जा घुसा है। इसलिए वह मसला हल करने आ गया था। पर यहां मामला अपने ही शहर में नए होने का था।

 Contd..

 

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 7

अर्थ -  अनर्थ 

 

"सोती किधर हैं ?

 

यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है। घटना की संवेदनशीलता को मद्देनज़र रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों (तीसरी पात्रा से अब संपर्क नहीं है) से इसे  संस्मरण  में  शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है। बात मेरे पहली कार ख़रीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका ज़िक्र इस अध्याय में ही उचित होगा। मेरे इंजिनीयरिंग कॉलेज में साथ पढ़े पांच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल पर हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आए। कंपनी के गेस्ट हाउस का फ़ोन नंबर, इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़े अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था। प्रायः सभी मित्र नए आने वाले दोस्तों को फ़ोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और ज़रूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे। मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था। एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती जी गेस्ट हाऊस में पधारे। सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं। उस सप्ताहांत पर मैं गेस्ट हाऊस गया और उन्हें लेकर अपनी कार से अटलांटा भ्रमण पर निकल गया। उसी सप्ताह गेस्ट हाउस में दो और नए प्राणी आए थे, एक बंदा जिसका मुझे नाम याद नहीं और एक बंदी मोनिका। उन दोनों से हम लोगों ने जाते हुए पूछ लिया था कि उन्हें इंडियन ग्रोसरी से कुछ मंगाना तो नहीं। शाम को मैंने सोती जी को गेस्ट हाउस वापस छोड़ा और अपने अपार्टमेंट को चल दिया। मेरे रूम पार्टनर सत्यनारायण स्वामी ने बताया कि मेरे लिए किन्हीं गोस्वामी का फ़ोन था। गोस्वामी जी भी मेरे वरिष्ठ सहपाठी है और श्रीमान सोती के बैचमेट हैं। गोस्वामी जी बहुत ही मिलनसार एवं विनोदी स्वभाव के हैं। गोस्वामी जी से हुआ वार्तालाप प्रस्तुत है–


मैं : गुरूजी, नमस्कार।
गोस्वामी जी : नमस्कार प्रभू, क्या गुरू खुद भी घूमते रहते हो और हमारे सोती जी को भी आवारागर्दी की आदत डलवा रहे हो।
मैं : अरे गोस्वामी जी सरकार, अब अपने मित्र भारत से नए नए आते हैं, पास में कार तो होती नहीं, तो थोड़ी सेवा ही सही। सोती जी को शापिंग कराने ले गया था।
गोस्वामी जी : अच्छा अच्छा। यार पर एक बात बता, गेस्ट हाउस में भाभीजी भी साथ आई है क्या? और क्या भाभी बहुत तेजतर्राट है या आज उनका सोती से सवेरे सवेरे झगड़ा हुआ था?
मैं : भाभीजी? तेजतर्राट? अरे गुरूदेव, सोती साहब तो अकेले आए हैं, भाभी बाद में आएंगी। आपको किसने कह दिया कि उनका कोई झगड़ा हुआ है?
गोस्वामी जी : यार लगता है कुछ लोचा हो गया है। कुछ समझ नहीं आ रहा। मैंने सवेरे गेस्ट हाउस सोती को फोन लगाया था। सोती तो मिला नहीं, फ़ोन पर किसी महिला की आवाज़ आई। मैं समझा कि शायद सोती भारत से भाभीजी को साथ लाया है। मैंने नमस्ते की और बताया कि गेस्ट हाउस का नंबर मैंने तुझसे लिया है।
मैं : फिर?
गोस्वामी जी : मैंने उन मोहतरमा से पूछा कि "सोती किधर हैं ?" पर इतना पूछते ही वह भड़क गई, कहने लगी कि आपको तमीज़ नहीं है। आप महिलाओं से उलजलूल सवाल पूछते हैं, आपको शर्म आनी चाहिए। यह कहकर उन मोहतरमा ने फ़ोन ही पटक दिया। अब यार तू ही बता, मैंनें कौन सा ऊलजलूल सवाल पूछा?


मैं भी पशोपेश में पड़ गया कि गोस्वामी जी से ऐसी कौन सी खता हो गई जो मोनिका जी क्रुद्ध हो गईं। चूंकि मोेनिका जी अगले ही दिन किसी दूसरे प्रांत चली गई, अतः उनसे संपर्क नहीं हो सका। हालांकि बाद में जब यह वृतांत अन्य मित्रों को बताया गया तो वह सब के सब हंस–हंस के दोहरे हो गए। उनके जवाब "जाकी रही भावना जैसी, प्रश्न का अर्थ समझे तिन तैसी" ने गुत्थी सुलझा दी। अफ़सोस कि मोनिका जी को हम यह स्पष्टीकरण नहीं दे सके। यदि आपको मोनिका जी कहीं मिले तो आप उन्हें बता दीजिएगा कि गोस्वामी जी ने तो उनसे सिर्फ़ अपने मित्र सोती जी का ठिकाना पूछा था।

 

गोस्वामी जी की आंसरिंग मशीन


 10 -12 साल पहले आंसरिंग मशीन का चलन दिल्ली , मुम्बई में  आम बात थी   पर छोटे शहरोँ के लिए  नयी चीज़ थी। प्रहसन तब होता है जब यह अजूबा किसी छोटे शहर में पहुंच जाए। हमारे गोस्वामी जी भारत यात्रा से लौटकर आए तो सुनाने के लिए उनके पास यही प्रहसन था। बेचारे एक अदद आंसरिंग मशीन ले गए अपने मथुरा वाले घर में। उन्होंने आंसरिंग मशीन को फ़ोन कनेक्ट करके रख दिया और बाकी परिवार के साथ छत पर जाकर चाय पीने लगे। तभी नीचे से नौकर चिल्लाया कि "भइया जिज्जाजी ईं भोंपू से कईस चिलाय रहे हैं?" सबने नीचे झांका तो विकट दृश्य था। गोस्वामी जी के पड़ोस के मुहल्ले में रहने वाले जीजाजी ने फ़ोन किया था। फ़ोन चार घंटी बजते ही आंसरिंग मशीन पर ट्रांसफर हो गया। आगे का नज़ारा खुद गोस्वामी जी के शब्दों में–


आंसरिंग मशीन : श्री कुंदन गोस्वामी जी गोस्वामी जी के पिताश्री इस समय . . .
जीजाजी : हल्लो, हल्लो
आंसरिंग मशीन : . . .या तो व्यस्त है या . . .
जीजाजी : अरे कौन बोल रहा है बिरजू गोस्वामी जी का घरेलू नाम ?
आंसरिंग मशीन : . . .या घर में नहीं है . . .
जीजाजी : अरे बिरजू ई हम है मुरली खुद जीजाश्री पहिचाने नहीं का?
आंसरिंग मशीन : . . .आप कृपया बीप बजने के . . .
जीजाजी : अरे तुम कहीं संतू गोस्वामी जी का नटखट भतीजा तो नहीं हो, ई का शैतानी कर रहे हो छोरा लोग? चाचा की आवाज़ बना के बोलत हौ?
आंसरिंग मशीन : . . .बाद अपना संदेश रिकार्ड करें, . . .
जीजाजी : अरे का रिकार्ड करें, हम कोई गवैया है का? हे संतू, तनिक चाचा गोस्वामी जी को बुलाओ।
आंसरिंग मशीन : . . .बीप . . .
जीजाजी : ए संतू तुम लोग बहुत शरारती हो गए हो, चाचा की आवाज़ बना के बोलते हो, अरे काम की बात करनी है, बुलाओ जल्दी चाचा को, नहीं तो हम आ रहे हैं।
आंसरिंग मशीन : . . .सन्नाटा . . .
जीजाजी : अच्छा नाही मनिहौ, अभी हम आवत है तुम्हारी कुटम्मस करै की ख़ातिर। धड़ाक से फ़ोन पटकने की आवाज़।


इधर संतू मियां जो पास ही खेल रहे थे, जीजाश्री की आवाज़ सुनकर सिहर गए। जीजाजी के खांमखा में संभावित आक्रमण  की धमकी से उनकी पैंट भी गीली हो गई थी। गोस्वामी जी के पिताजी अलग चिल्ला रहे थे कि यह क्या तमाशा है, यहां किसी को इन सब झमेलों का शऊर नहीं है। तभी गोस्वामी जी की मुश्किलों में इज़ाफा करते गुस्से में लाल पीले जीजाश्री का अवतरण हुआ। आते ही भाषण चालू कि तुम लोगों ने लड़कों को बिगाड़ रखा है, फ़ोन तक पर मज़ाक करते हैं, बड़ों की आवाज़ की नकल करके बेवकूफ़ बनाते हैं वगैरह–वगैरह। जीजाश्री को लस्सी पिला कर ठंडा किया गया और फिर उन्हीं की आवाज़ आंसरिंग मशीन पर सुनाई गई। आशा के विपरीत जीजाश्री का कथन था "लाला ई भोंपू हमरे लिए काहे नहीं लाए। बहुत काम की चीज़ लगत है।" और आशानुसार गोस्वामी जी के पिताजी ने तुरंत बवालेजान यानि की आंसरिंग मशीन को जीजाश्री के सुपुर्द कर दिया।

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 6

अथ धर्म - कर्म कथा ...

 

 

 

      मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राइविंग के द्रोणाचार्य बन गए। एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ। अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। मंदिर में गणेश, शिव, हनुमान, मुरुगन, भूदेवी, तिरूपति बालाजी, सब की प्रतिमा एक साथ एक हॉल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ।


मैंने अनुपम जी से, जो हिंदू स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे, से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद–क्षेत्रवाद की समस्या यहां नहीं आई। क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता एक साथ सुशोभित हैं। अनुपम भाई ने एक ही क्षण में मुझे यथार्थ के धरातल पर ला पटका। वे बोले मान्यवर ये विशुद्ध अर्थशास्त्र है राष्ट्रप्रेम जैसा कुछ नहीं है। भाई जब मंदिर बना तो हैदराबादी बिना बालाजी की मूर्ती लगे चंदा नहीं दे रहे थे, वहीं तामिलनाडु और कर्नाटक वालों को लगता है कि उन्हें सिर्फ़ मुरुगन, भूदेवी या लक्ष्मी का आशीर्वाद ही फलीभूत होगा और बचे उत्तर भारतीय तो वे अपनी टेंट तभी ढीली करेंगे जब यहां हिंदी में की गई प्रार्थना स्वीकारने वाले हनुमान जी विराजें। वह तो अटलांटा में काफ़ी देशी भारतीय हैं वरना चंदा पूरा करने के लिए गुरू ग्रंथ साहिब और भगवान बुद्ध को भी मंदिर का हॉल शेयर करना पड़ता।


बाद में पता चला कि अटलांटा में जिमखाना क्रिकेट क्लब, तमिल समाज, पंजाबी बिरादरी, जैन सम्मेलन, बंगाली असोसिएशन, सिंधी सभा आदि–आदि सारे मंच अपने–अपने एजेंडे के साथ विद्यमान है। मैं सोच रहा था कि हम भारत से अपनी संस्कृति ही साथ नहीं लाते, अपना भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद वगैरह की दीवारें भी साथ ले आते हैं। यह सब हमारी मानसिक बेड़ियां हैं जिनसे हमें छुटकारा मिल ही नहीं सकता। वैसे जहां एक ओर भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की बेड़ियां दिखीं, वहीं एक सुखद अहसास भी हुआ। अमेरिका में भगवान भी एनआरआई नफ़ासत के साथ रहते हैं। एयरकंडीशंड मंदिर, स्वच्छ वातावरण, अनुशासित भक्त। ताज्जुब है कि दीवार पर दिशा निर्देशों का पूरी सजगता से पालन होता है। न कोई फोटोग्राफ़ी कर रहा है, न कोई शिवलिंग पर मत्था रगड़ कर उसे चमका रहा है न ही प्रसाद के लिए मारामारी। सिर्फ़ एक कमी खलती है, नये मंदिरों की बात छोड़ दें तो ज़्यादातर पुराने मंदिर डाऊनटाउन में बने हैं, अति सीमित पार्किंग के साथ। मंदिर व्यवस्थापक शुरू में जहां आकर बसे वहीं मंदिर ठोंक दिया। भविष्य में भक्त संख्यावृद्धि का ख्याल उनके जहन में कभी नहीं आया। अब चाहें शहर कितना बढ़ जाए पर कई मंदिर व्यवस्थापक सुविधाविस्तार के मामले में भारतीय रेल मंत्रालय की तरह सोचते हैं। जहां जी चाहे स्टेशन बना दो, पब्लिक को सत्तर बार गरज है तो आएगी ही।

पीजी भाई


जिं.दगी में कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो बिन मांगे हमेशा सबकी मदद को तत्पर रहते हैं। हमारे पीजी भाई ऐसे ही जिं.दादिल शख्स हैं। मैं पहली मुलाकात में उनका कायल हो गया था। न जाने कैसे उन्होंने मेरे मुंह से सिर्फ़ एक वाक्य सुन कर ताड़ लिया कि मैं कानपुर से हूं। अमेरिका में रहने लायक जुझारुपन पीजी भाई की शागिर्दी में सीखा है। 15 अगस्त को मजेदार वाक्या हुआ। सिविक सेंटर पर 15 अगस्त का मेला लगा था। खाने पीने से लेकर हर तरह की धार्मिक–सामाजिक धंधेबाजी के स्टाल लगे थे। कुछ देशप्रेमी कारगिल में पाकिस्तानी ज़्यादतियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए थे। मैं और पीजी भाई कुछ अतिउत्साहियों की ज़बानी पतंगबाजी का मज़ा ले रहे थे। पाकिस्तानी पर ज़बानी गोलीबारी में कोई सूरमाभोपाली पीछे नहीं रहना चाह रहा था। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में पीजी भाई को मसखरी सूझी। वे बोले यदि आप सब साथ दें तो हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। सभी को लगा कि पीजी के दिमाग़ में कोफी अन्नान या बिल क्लिंटन को चिठ्ठी लिख मारने सरीखा कोई धांसू आइडिया खदबदा रहा होगा। सारे भारत मां के सपूत समवेत स्वर में बोले, पीजी भाई आप बस हुक्म करो हम सबका तो खून खौल रहा है। पीजी भाई बोले तो निकालो सब दस–बीस डालर। इस अप्रत्याशित पहल पर सबका 'क्यों' कहना प्रत्याशित था। पीजी भाई ने प्रस्ताव रखा कि जब पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित कर सकता है तो हम क्यों नहीं। रकम खर्च कर के क्या हम भी किसी बंबई दुबई के पप्पू पेजर, मुन्ना भाई या मदन ढोलकिया को कराची या लाहौर में एकाध बम फोड़ने की सुपारी नहीं दे सकते। अगर आप हज़ार डालर भी इकठ्ठा कर लो तो मैं सुपारी का इंतज़ाम करता हूं। मैंने देखा कि भारत मां के सारे सपूत जिनका कुछ देर पहले खून खौल रहा था अपने–अपने दस डालर लेकर छोले भटूरे का स्टॉल तलाशने में लग गए। पीजी भाई का फ़लसफ़ा कुछ अलग ही है। उन्होंने न्यूयार्क के भिख़ारियों की बदहाली की वीडियो फ़िल्म बना रखी है, जिसे वह हिंदुस्तान में अमेरिका–पूजकों को ख़ासकर दिखाते हैं।

 

हिंदू स्वयंसेवक संघ


यह भारत वाले आरएसएस का अंतर्राष्ट्रीय संस्करण है। शुरू के महीनों में सप्ताहांत पर करने को कुछ विशेष न होने के कारण शाखा में भी भाग लिया। इसकी गतिविधियों में भाग लेकर पता चला कि हिंदू स्वयंसेवक संघ की उपयोगिता कितनी है और साथ ही लोगों, खासकर बुद्धिजीवियों के इससे बिदकने के कारण है। स्वयंसेवक संघ का अमेरिकी संस्करण एचएसएस क्रीमी लेयर समाज से आने वाले लोगों की वजह से कुछ 'हटके' है। इसके पुराने सदस्य पहली बार अमेरिका आने वालों की यथासंभव मदद करते हैं, किसी भी सामाजिक कर्तव्य को निबाहने में, चाहे गुजरात का भूकंप राहत कोष एकत्र करना हो या कारगिल युद्ध में पाकिस्तान विरोध मार्च, आगे रहते हैं। सबसे अच्छा प्रयास तो बालगोकुलम का है। छोटे बच्चों के लिए भारतीय संस्कृति एवं महाकाव्यों पर आधारित लघुकथा, नाटक, मातृभाषा सिखाने हेतु सप्ताहांत पर कक्षाओं का आयोजन होता है। अभिभावक ही सामूहिक रूप से कक्षा संचालन की ज़िम्मेदारी लेते हैं। संघ की भूमिका पाठ्य सामग्री एवं आवश्यक प्रशिक्षण तक सीमित रहती है। भारत के बाकी हिस्सों का तो पता नहीं पर अपने उत्तर प्रदेश में लफंगातत्व धर्म का तथाकथित ठेकेदार बनकर ऐसे संघटन में स्वार्थवश घुस जाता है और बुद्धिजीवी ऐसे तत्वों की वजह से बिदकते हैं।

 

दिव्यराज जी और उनका गृह प्रवेश समारोह


दिव्यराज सिंह जी अटलांटा में संघ के सक्रिय कार्यकर्ता है। एक दिन मणिका जी दिव्यराज सिंह की धर्मपत्नी ने सकुचाते हुए अनुरोध किया कि मैं उनके पुराने घर से नये घर में सामान पहुंचाने में सहयोग कर दूं। दिव्यराज जी कुछ संकोची स्वभाव के हैं। उनके संकोच का एक अन्य कारण भी था। एक अति उत्साही स्वयंसेवक एक दिन पहले उनके घर से पुराना सामान फिंकवाते समय उनके खालिस नये महंगे जूते का डिब्बा कचरा समझ कर फेंकने की नादानी कर चुका था। दिव्यराज सिंह जी अब किसी नौसीखिए स्वयंसेवक से सेवा लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मैंने उनका संकोच मैं कुली नं .वन हूं कह कर दूर कर दिया।


अगले दिन पूरे विधि विधान से एक पंडित जी ने नये घर में हवन संस्कार कराया। बाद में पीजी भाई आदतन पंडित जी से शास्त्रार्थ में उलझ गए। यह संवेदनशील मुद्दा था मदिरापान के तथाकथित रूप से धर्मविरूद्ध होने का। पीजी भाई का तर्क जायज़ था, आख़िर जब देवताओं द्वारा खुद सुरापान कर सकते हैं तो भक्तों के शौक पर शास्त्रों के बहाने क्यों अड़ंगा लगा रखा है। पीजी भाई पूरी तरह से हावी थे जबकि पंडित जी पतली गली से भागने का मार्ग तलाश रहे थे ताकि अगले यजमान के यहां विलंब न हो।


पंडित जी सवेरे–सवेरे एक और हादसे से दो चार हो चुके थे। दिव्यराज जी के घर का पता था 7125 ब्रुकवुड रिवर। बुकप्लेस कम्युनिटी, ब्रुकवुड रिवर नाम की कम्युनिटी से कुछ ही पहले था। पंडित जी सवेरे पांच बजे गफ़लत में 7125 ब्रुकप्लेस में जा धमके और चार पांच बार दरवाज़े की घंटी दे मारी। मकान मालिक कोई गोरा अमेरिकन था। बेचारे ने उनींदी आंखों से दरवाज़ा खोला। पंडित जी दरवाज़ा खुलते ही बोले "व्हेअर इज़ देवराज"।

गोरे अमेरिकन जिसकी अभी ठीक से नींद भी नहीं खुली थी उसके लिए गेरुआ वस्त्रधारी एवं पूर्ण मस्तक चंदन तिलकधारी, अजीब सा नाम पूछते पंडित जी किसी मंगल ग्रह के निवासी से कम साबित नहीं हुए। गोरा अमेरिकन पंडित जी को हेलोवीन कास्टयूमधारी समझ रहा था। हेलोवीन नवंबर के महीने में मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें बच्चे भूत प्रेत या अन्य विचित्र किस्म के कपड़े पहनकर टोली बनाकर घर–घर टाफियां मांगने निकलते हैं। वह गोरा पलटा और कुड़कुड़ाते हुए पंडित जी को एक मुठ्ठी टॉफी टिकाने लगा। जबकि पंडित जी जो यह समझ रहे थे कि दिव्यराज जी ने शायद यह घर जिस किसी से ख़रीदा है वह पुराना मकान मालिक अभी भी वहां डंटा है। पांच मिनट बाद पंडित जी को पता चला कि वे ग़लत घर में आ गए हैं और 7125 ब्रुकवुड रिवर में उनका इंतज़ार करते हुए देशी जनता सूख कर कांटा हो रही है।

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 5

 कार लाइसेंस कथा 

 

दो हफ़्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गए। नवीन भाई ने सप्ताहांत पर ड्राइविंग पर हाथ साफ़ करने के लिए रेंटल कार ले ली। हांलांकि नवीन भाई को ड्राइविंग लाइसेंस हममें से सबसे पहले मिला पर धीरे से लगने वाले ज़ोर के एक झटके के बाद। हम सब ड्राइविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गए। यहां आपके साथ एक पुलिस अफ़सर कार में बैठ कर कुछ मानकों के आधार पर ड्राइविंग टेस्ट लेता है। इसमें दो करतब ख़ासतौर से उल्लेखनीय हैं। रोमांचक पैरेलेल पार्किंग और वीविंग यानि की आठ दस प्लास्टिक के खंभों के बीच से शाहरुख़ ख़ान की तरह कार निकालना।


नवीन भाई को अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर न्यू जर्सी जाना था। अतः उनके ख़यालों में न्यू जर्सी छाया हुआ था। नवीन भैया ने देसी बुद्धि दौड़ाई और बाकी लोगों को एक कोने में खड़े होकर, टेस्ट देते देखकर टेस्ट के सारे हिस्से कंठस्थ कर डाले। उनकी बारी आने पर पुलिस अफ़सर कार में नवीन भाई के साथ बैठा और उनका टेस्ट लेने लगा। सबकुछ ठीक चल रहा था। नवीन भाई के हिसाब से अगला स्टेप तेज़ चला कर ब्रेक लगाने का प्रदर्शन था, पर पुलिस अफ़सर ने खालिस अमेरिकी आवाज़ में कार को पहले वीविंग कराने के लिए कह दिया। नवीन भाई अपनी धुन में सीधे जाने लगे तो पुलिस अफ़सर ने टोंक कर पूछा, "सर वेहर आर यू गोइंग?" नवीन भाई इस अप्रत्याशित प्रश्न से मानो चिरनिद्रा से जागे पर वे अभी पूर्ण सुप्तावस्था से अर्धचेतना में ही आ पाए थे। उन्हें यह कौतूहल था कि इस पुलिस अफ़सर को मेरे अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर जाने के बारे में कैसे पता चल गया। कहीं यह प्रिमस सॉफ्टवेअर वालों को तो नहीं जानता, जहां वह काम करते हैं। एक बारग़ी उन्हें लगा कि प्रिमस सॉफ्टवेअर वालों ने इस पुलिस वाले को सेट तो नहीं कर रखा, हांलांकि ऐसा होता तो नहीं अमरीका में। वह बोल पड़े, "आइ एम गोइंग टु न्यू जर्सी।" पुलिस अफ़सर जो उन्हें चेताने की कोशिश कर रहा था उसे ऐसे बेहूदा जवाब की उम्मीद नहीं थी। उसने उन्हें टेस्ट स्थल से बाहर जाने का आदेश थमा दिया और नवीन भाई मानो आसमान से गिरे।

बाहर निकलते ही पहले तो आधे घंटे तक रेंटल कार पर मुक्के ठोंकते रहे फिर बोले, "गुरू क्या ये लोग सौ पचास की पत्ती मेज़ के नीचे से लेकर लाइसेंस नहीं दे सकते।" हांलांकि एक ही सप्ताह में वे दुबारा ड्राइविंग टेस्ट देकर लाइसेंस झटक लाए। उस सप्ताहांत पर वे हम सबको एक रेंटलकार से सैर पर भी ले गए। सैर के दौरान एक सीधी–सादी दिखती सड़क ने नवीन भाई को धोखे से फ्री वे में पहुंचा दिया। अगर सोलंकी जी न संभालते तो नौसिखिया नवीन भाई फ्री वे देख कर इतना आतंकित हो गए थे कि कार में हम सबको छोड़ कर पैदल भागने वाले थे। फ्री वे वह बला है जिससे हर नया ड्राइवर घबराता है। दो से छे लेन का हाइवे जिसमें हर कोई साठ से अस्सी मील प्रतिघंटा की स्पीड से कार भगाता है। फ्री वे के उस्ताद को प्रवेश, हाईस्पीड मर्ज, लेन चेंज करना, एग्ज़िट लेना आदि सभी कलाओं में पारंगत होना आवश्यक है। एक भी कला में कम निपुणता आपकी कार की बलि ले सकती है। अब इन कलाओं में निपुणता के लिए हर नया अर्जुन, एक अदद द्रोणाचार्य की तलाश करता है। मैं अर्जुन भी बना और समय के साथ द्रोणाचार्य भी।

 

मेरी पहली टोयटा करोला


प्रोजेक्ट मिलने के बाद ड्राइविंग लाइसेंस झटकना एक सूत्रीय कार्यक्रम बन गया था। पहले लिखित परीक्षा देकर लर्नर परमिट मिला कुछ ड्राइविंग लेसंस भी लिए। सत्यनारायण जी के दर्दनाक अनुभवों से विश्वास हो चुका था कि ड्राइविंग लाइसेंस पाना टेढ़ी खीर है। बेचारे चार बार बैरंग वापस लौट चुके थे। हर बार कुछ न कुछ ग़लती कर बैठते थे। मेरा और उनका ड्राइविंग गुरू एक ही गोरा था। पांचवीं बार हद हो गई सत्यनारायण जी ड्राइविंग टेस्ट के सारे स्टेप ठीक कर चुके थे पैरेलल पार्क करते हुए ब्रेक की जगह हड़बड़ी में एक्सेलेटर दबा दिया और सेंटर में लगा एक खंभा ही ज़मींदोज़ कर डाला। मुझे अगले दिन मेरी ड्राइव्ािंंग प्रैक्टिस के दौरान उस गोरे ने बताया कि सत्यनारायण जी हताशा में अपना माथा ठोंक रहे थे। उन्हें फेल करने वाला महाखड़ूस ड्राइविंग परीक्षक भी उनपर तरस खाकर दिलासा दे रहा था। फिर भी जब सत्य नारायण जी का मस्तक ठोकना बंद नहीं हुआ तो उस गोरे ने झल्लाकर अपनी कार के ट्रंक के टूलबॉक्स से एक हथौड़ा निकालकर थमा दिया सर को ठोकने को। सत्यनारायण जी भारत वापस जाने को आमादा हो गए। रात भर उनका प्रलाप चलता रहा कि वहां कभी लाइसेंस नहीं मिलने वाला। हिंदुस्तान होता तो अबतक ट्रैफ़िक एग्ज़ामिनर की हज़ार पांच सौ से हथेली गरम कर के मिल गया होता। अब कब तक पैदल चलूं कहीं किसी दिन किसी कार या ट्रक के नीचे आ जाऊंगा। उन्होंने हिंदुस्तान पलायन की ठान ली थी। मैंने अगले दिन अपने कंपनी डायरेक्टरों को उनके घायल जज़्बातों के बारे में बताया। वे बिचारे दोनों अपने सारे काम छोड़कर भागे। सत्यनारायण जी की दोनो ने करीब–करीब सायकोलाजिकल काउंसलिंग कर डाली।


अगले दिन मेरा ड्राइविंग टेस्ट था। टेस्ट एक गोरी एग्ज़ामिनर ले रही थी जब उसने मुझसे वीविंग करने के लिए बोला तो मैंने उससे पूछा, "विच स्टाइल, लेफ्ट बिफोर, सेंटर लेफ्ट, सेंटर राइट और राइट आफ्टर?" वीविंग के इतने सारे प्रकार सुनकर एग्ज़ामिनर समझ गई कि पाला गोरे ट्रेनर के चालू शागिर्द से पड़ा है। मैं ड्राइविंग लाइसेंस पाने में कामयाब हो गया। इतना सुखद अहसास कि मानो लंका जीत ली। एक महीने बाद ऑफ़िस में एक सहकर्मी से एक अदद पुरानी टोयोटा करोला आननफ़ानन में ख़रीद डाली। मैं शाम को सोच रहा था अगर यह कार कानपुर में ख़रीदी होती तो पहले जानकारी के लिए न जाने किस–किस की चिरौरी की जाती। कार सपरिवार मंदिर को जाती। मिष्ठान्न वितरण होता। यहां तो बस पैसे दिए और कार दरवाज़े पर। कोई बधाई देने वाला नहीं।

 

कोरोला की शहादत


करीब छः सात महीने बाद जब कार, अपार्टमेंट इत्यादि का इंतज़ाम हो गया तो अपने परिवार दादा, प्रीति व चारु को कानपुर से बुला लिया। चार महीने रहने के बाद दादा वापस कानपुर चले गए। उनको अटलांटा एअरपोर्ट से विदा कर वापस आ रहा था। प्रीती मेरी धर्मपत्नी व चारु कार की पिछली सीट पर बैठे थे। पेरीमीटर फ्रीवे की सबसे दाईं लेन से चार लेन बाईं तरफ़ चेंज की। तभी देखा कुछ दूर एक कार मेरी लेन में खड़ी है। सारी लेन का ट्रैफिक भाग रहा है और यह कार बीचोबीच खड़ी थी। पूरी ताकत से ब्रेक लगाए। मेरी कार रुकते–रुकते आगे वाली कार से हौले से जा लड़ी। तभी दो ज़बरदस्त झटके लगे। पीछे की खिड़की का कांच टूटकर हम सब पर आ गिरा। परमात्मा की कृपा से किसी को चोट नहीं लगी। बाहर निकल कर देखा, मेरी कार के आगे व पीछे दो–दो कार और दुर्घटना में शामिल थीं।


तेज़ रफ़्तार टै्रफिक के साथ यही मुश्किल है। अगर एक कार किसी वजह से रुक गई तो पीछे की कईं कारें मरखनी भेड़ों की तरह बिना आगा पीछा सोचे एक दूसरे के पीछे पिल पड़ेंगी। कार का ट्रंक पिचक गया था। पुलिस व एंबुलेंस वाले दो मिनट में आ गए। कोई घायल नहीं था इसलिए सारी कार्यवाही आधे घंटे में निपट गई। यह विदेश में दुर्घटना का पहला अनुभव था। इंश्योरंस कंपनी ने कार को शहीद अमेरिकी भाषा में टोटल घोषित करार देकर कार की पूरी कीमत के बराबर क्षतिपूर्ति कर दी। यहां कल्लू मिस्त्री छाप मरम्मत बहुत महंगी पड़ती है। शायद इसीलिए यूस एंड थ्रो का चलन है। शुरू में भारत में किसी को दुर्घटना के बारे में नहीं बताया, सब नाहक परेशान होते। पर एक दिन चारू पटाखा अपने दादा जी से फ़ोन पर बोल पड़ी कि दादा मैं बच गई। अब यह रहस्योद्घाटन ज़रूरी था कि चारू किस चीज़ से बची।


दो दिन बाद नयी कोरोला ली। इस बार मोलभाव के लिए पीजी भाई साथ थे। ठोंकबजा कर कार दिला दी। ज्ञानी मित्रों ने कदम–कदम पर मार्गदर्शन किया वर्ना वही होता जो अब छः साल बाद मेरे मित्र के साथ हुआ। हम दोनों साथ कही जा रहे थे, ड्राइविंग सीट पर बैठे मेरे मित्र बता रहे थे कि उन्होंने इंश्योरंस से कोलीजन डेमेज वेव कर दिया किसी की ग़लत सलाह के चलते। तभी उनका ज़बरदस्त कोलीजन दूसरी कार से हुआ और हमारी कार के सेफ्टी बैग तक बाहर आ गए। हम दोनों तो बच गए पर कार शहीद हो गई। आज जब यह कहानी लिखने बैठा तो छः साल पहले के सत्यनारायणस्वामी याद आते हैं। सुरक्षा से कभी समझौता न करने के उनके दृष्टिकोण के चलते उन्होंने न सिर्फ़ खुद, बल्कि मुझे भी महंगा इंश्योरंस दिला दिया था। हालांकि बहुत से लोग पैसे को दांतों से पकड़ कर चलने की आदत के चलते इंश्योरंस में कटौती कर देते हैं और बाद में खामियाज़ा भुगतते हैं।

To be Contd...

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 4

अथ भोजन व्यथा कथा  

 

अगर हमने महेश भाई को झेला तो मेरे मित्र नवीन, नीरज जी व सोलंकी सुरेश भाई से त्रस्त रहे। सप्ताहांत पर नवीन भाई मुझे गेस्ट हाउस बुला लाए। भोजन के दौरान सोलंकी जी ने 'अथ श्री सुरेशानंद व्यथा कथा' छेड़ दी। पता नहीं क्यों कंपनी वालों ने मेरे मित्र के साथ एक मियां बीवी को भी गेस्ट हाउस में टिका दिया था। वैसे सुरेश की बीबी मेरे मित्रों का भी भोजन सस्नेह बना देती थी। वह जितनी भली स्त्री थी सुरेश भइया उतने ही अझेल प्राणी थे। पहले तीन दिन तक तो सारे मित्र उनके श्रीमुख से सिंगापुर एअरपोर्ट के मुकाबले अटलांटा एअरपोर्ट के घटिया होने का प्रलाप सुन–सुन कर त्रस्त हुए। वजह सिर्फ़ एक थी कि माननीय सुरेश जी को अटलांटा एअरपोर्ट में सामान रखने की ट्राली का एक डालर किराया देना खल रहा था जो सिंगापुर एअरपोर्ट में नहीं देना पड़ताा था। उसके बाद सुरेश भाई का सिंगापुर स्तुतिगान, जहां से सुरेश भाई अवतरित हुए थे और अमेरिका का नित्य निंदापुराण मेरे तीनों मित्रों की नियति बन गया। सुरेश भाई द्वारा कंपनी आफ़िस में इकलौते इंटरनेट टर्मिनल पर सारे दिन का कब्ज़ा जमाए रखना एवं गेस्ट हाउस में नाहक धौंसबाजी मेरे मित्रों के सब्र के पैमाने से परे जा चुकी थी।


तीनों मित्र गेस्ट हाउस में ऑमलेट नहीं खा सकते थे क्यों कि सुरेश भाई को अंडे की बदबू नहीं पसंद थी। रात में आठ के बाद टीवी चलाने से सुरेश भाई की नींद में खलल पड़ता था। बेचारे मित्र प्रतिदिन डिब्बाबंद खाने की जगह मिलने वाले ताज़े खाने की वजह से सुरेश भाई को "पैकेज डील" की तरह बर्दाश्त कर रहे थे। बातचीत में पता चला कि वस्तुतः यह सुरेश, महेश के सगे भाई भी थे, जिन्हें मैंने झेला था। जब मैंने उनको बर्तन रखने की अलमारी का किस्सा सुनाया तब सबको दोनों भाइयों के व्यवहारिक धरातल का सहज अनुमान हो गया उस समय दोनों भाई कहीं गए हुए थे। महेश सवेरे नीरज जी को जाने क्या अनुचित बोल गया कि अगर सुरेश की बीवी का लिहाज़ न होता तो नीरज जी व सोलंकी महेश भाई की धुलाई कर डालते।


मुझे शाम को आमलेट बनाने की सूझी। सोलंकी जी ने टोका भी कि सुरेश सपरिवार आ रहा होगा। मैंने कहा,
"ठीक, मैं भी महात्मा के दर्शन कर लूंगा। पर आमलेट ज़रूर बनाऊंगा।"


मित्रगण मेरे स्वभाव से कालेज के ज़माने से परिचित थे अतः थोड़ी देर में होने वाले प्रहसन के इंतज़ार में टीवी लगाकर बैठ गए। आमलेट बनने के धुएं के बीच सुरेश जी अवतरित हुए व सीधे सपत्नीक कमरे में चले गए। कुछ ही देर में बाहर आकर कुकुरनासिका का प्रदर्शन करते हुए जिज्ञासा प्रकट की कि किसी ने आमलेट बनाया था क्या। मैं बोला,
"हां मैं बना रहा हूं।"


सुरेश जी कुछ भृकुटी तान कर बोले पर इस बर्तन में तो शाकाहारी खाना बनता है। मैंने पूरी कानपुरिया दबंगता से जवाब दिया, "अरे आपको महेश ने नहीं बताया कि चीनी डांग तो इसी बर्तन में बीफ गाय का मांस बनाता था, जिसे महेश बाद में धोकर टमाटर चावल की लुगदी पकाने के लिए प्रयोग करता था . . .सुरेश जी इससे पहले कुछ और सोचें मैं चालू रहा, "और अभी आप सब रेस्टोरेन्ट में खाकर आ रहे हैं वहां कौन सा शाकाहारी भोजन बनाने से पहले बर्तनों का धार्मिक शुद्धीकरण होता है।" सुरेश जी अवाक रह गए।


महेश उन्हें और ज़लील होने से बचाने के लिए कमरे में खींच कर ले गया। मित्र मंडली की हंसी बमुश्किल ही रुक पाई। दोनों भाइयों में शायद पहले डांग को लेकर जमकर नोक झोंक हुई कि न जाने फिर क्या सूझी कि दोनो भाई सुरेश की पत्नी को उसके सामान सहित कहीं छोड़ने चले गए। नवीन भाई इस प्रकरण में सुरेश की पत्नी के जाने से कुछ दुखी थे। उनको फिर से डिब्बा बंद खाने पर जीना अप्रिय लग रहा था। पर बाकी सब इसलिए प्रसन्न थे कि अब सुरेश तो निहत्था गेस्ट हाउस लौटने वाला था। अब तो हमाम में सभी नंगे हैं जो जिस पर जैसे चाहे रौब जमाए।


हुआ भी वही। एक सप्ताह में सुरेश भाई मेरे मित्रों के बदले हुए वाचाल वानरी रूप के आगे नतमस्तक हो गए। उन्हें अहसास हो गया कि गेस्ट हाउस में जब तक उनकी पत्नी थी वहां शराफ़त थी। उसकी बीवी के लिहाज़ से सब उन्हें चाहे अनचाहे सम्मान देने को और उनके नाज़ सहने को विवश थे, पर बेचारा अपनी पत्नी को गेस्टहाउस से भेजकर वानर सेना के हत्थे चढ़ गया और वह भी बिना ढाल के। सबने उसे बेतरह परेशान किया। रात–रात भर टीवी चला कर, जम कर निरामिष भोजन बना कर। यहां तक कि जब सबका एक साथ प्रोजेक्ट लगा तो सबने सुरेश को एक हफ्ते पुराने हिसाब के 15 डॉलर जानबूझ कर एक एक सेंट के सिक्कों की शक्ल में थमा दिए। लेकिन कृपणचंद तीन किलो भारी चिल्लर का थैला लादे लादे एअरपोर्ट चला गया।

 

मोनिका को गुस्सा क्यों आया?

 

यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है। घटना की संवेदनशीलता को मद्देनज़र रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों तीसरी पात्रा से अब संपर्क नहीं है से इसे अपनी किताब में शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है। बात मेरे पहली कार ख़रीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका ज़िक्र इस अध्याय में ही उचित होगा। मेरे इंजिनीयरिंग कॉलेज में साथ पढ़े पांच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल पर हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आए। कंपनी के गेस्ट हाउस का फ़ोन नंबर, इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़े अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था। प्रायः सभी मित्र नए आने वाले दोस्तों को फ़ोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और ज़रूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे। मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था।

एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती जी गेस्ट हाऊस में पधारे। सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं। उस सप्ताहांत पर मैं गेस्ट हाऊस गया और उन्हें लेकर अपनी कार से अटलांटा भ्रमण पर निकल गया। उसी सप्ताह गेस्ट हाउस में दो और नए प्राणी आए थे, एक बंदा जिसका मुझे नाम याद नहीं और एक बंदी मोनिका। उन दोनों से हम लोगों ने जाते हुए पूछ लिया था कि उन्हें इंडियन ग्रोसरी से कुछ मंगाना तो नहीं। शाम को मैंने सोती जी को गेस्ट हाउस वापस छोड़ा और अपने अपार्टमेंट को चल दिया। मेरे रूम पार्टनर सत्यनारायण स्वामी ने बताया कि मेरे लिए किन्हीं गोस्वामी का फ़ोन था। गोस्वामी जी भी मेरे वरिष्ठ सहपाठी है और श्रीमान सोती के बैचमेट हैं। गोस्वामी जी बहुत ही मिलनसार एवं विनोदी स्वभाव के हैं। गोस्वामी जी से हुआ वार्तालाप प्रस्तुत है–
मैं : गुरूजी, नमस्कार।
गोस्वामी जी : नमस्कार प्रभू, क्या गुरू खुद भी घूमते रहते हो और हमारे सोती जी को भी आवारागर्दी की आदत डलवा रहे हो।
मैं : अरे गोस्वामी जी सरकार, अब अपने मित्र भारत से नए नए आते हैं, पास में कार तो होती नहीं, तो थोड़ी सेवा ही सही। सोती जी को शापिंग कराने ले गया था।
गोस्वामी जी : अच्छा अच्छा। यार पर एक बात बता, गेस्ट हाउस में भाभीजी भी साथ आई है क्या? और क्या भाभी बहुत तेजतर्राट है या आज उनका सोती से सवेरे सवेरे झगड़ा हुआ था?
मैं : भाभीजी? तेजतर्राट? अरे गुरूदेव, सोती साहब तो अकेले आए हैं, भाभी बाद में आएंगी। आपको किसने कह दिया कि उनका कोई झगड़ा हुआ है?
गोस्वामी जी : यार लगता है कुछ लोचा हो गया है। कुछ समझ नहीं आ रहा। मैंने सवेरे गेस्ट हाउस सोती को फोन लगाया था। सोती तो मिला नहीं, फ़ोन पर किसी महिला की आवाज़ आई। मैं समझा कि शायद सोती भारत से भाभीजी को साथ लाया है। मैंने नमस्ते की और बताया कि गेस्ट हाउस का नंबर मैंने तुझसे लिया है।
मैं : फिर?
गोस्वामी जी : मैंने उन मोहतरमा से पूछा कि "सोती किधर है?" पर इतना पूछते ही वह भड़क गई, कहने लगी कि आपको तमीज़ नहीं है। आप महिलाओं से उलजलूल सवाल पूछते हैं, आपको शर्म आनी चाहिए। यह कहकर उन मोहतरमा ने फ़ोन ही पटक दिया। अब यार तू ही बता, मैंनें कौन सा ऊलजलूल सवाल पूछा?
मैं भी पशोपेश में पड़ गया कि गोस्वामी जी से ऐसी कौन सी खता हो गई जो मोनिका जी क्रुद्ध हो गईं। चूंकि मोेनिका जी अगले ही दिन किसी दूसरे प्रांत चली गई, अतः उनसे संपर्क नहीं हो सका। हालांकि बाद में जब यह वृतांत अन्य मित्रों को बताया गया तो वह सब के सब हंस–हंस के दोहरे हो गए। उनके जवाब "जाकी रही भावना जैसी, प्रश्न का अर्थ समझे तिन तैसी" ने गुत्थी सुलझा दी। अफ़सोस कि मोनिका जी को हम यह स्पष्टीकरण नहीं दे सके। यदि आपको मोनिका जी कहीं मिले तो आप उन्हें बता दीजिएगा कि गोस्वामी जी ने तो उनसे सिर्फ़ अपने मित्र सोती जी का ठिकाना पूछा था।

 

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 3

 प्रथम अमेरिका आगमन  

 

अटलांटा एअरपोर्ट पर इमिग्रेशन से निपटने के बाद बाहर आकर देखा कि लोगों की निगाहें अपने–अपने आगंतुकों को तलाश रही है। कुछ टैक्सी वाले आने वाले लोगों के नाम की तख्ती लिए खड़े थे। तभी मुझे अपने नए कंपनी डायरेक्टर की एक हफ्ते पहले ई–मेल पर दी गई सलाह याद आई कि अपने कैब ड्राइवर से मिलने के बाद ही बैगेज क्लेम से अपना सामान उठाना। दो दिन लग गए थे यह पता करने में कि टैक्सी को कैब भी कहते हैं। पर यहां तो अपना नाम किसी की तख्ती पर नहीं है। अब? आज तो रविवार है। आफ़िस भी बंद होगा। किसी को फ़ोन करूं या खुद टैक्सी करूं। उधेड़बुन में सोचा चलो पहले बैगेज क्लेम से अपना सामान ही उठाया जाय। वापस आकर फिर देखा तो एक नए नज़ारे के दर्शन हुए। वेटिंग लाऊंज तकरीबन खाली हो चुका था। आगंतुकों को लेने आए मुलाकाती उनकी झप्पियां ले रहे थे। एकाध देशी लोग जो महीनों से अपनी बीबियों से दूर थे, उनके आने पर झप्पियों के साथ पप्पी लेने से नहीं चूके। मैं सोच रहा था कि अगर प्लेन में अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया आए होते तो अमेरिका में हिंदुस्तानियों के इस तरह सार्वनजिक प्रेम प्रदर्शन पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

 

मेरी नज़र एक दुबले पतले मोना सरदार जी पर पड़ी जो एक फटीचर सा कागज़ का पोस्टर जैसा कुछ लिए अपना शिकार तलाश कर रहे थे। नज़दीक जाकर देखा तो उनके पोस्टर पर मुझ नाचीज़ का ही नाम चस्पां था। उनसे दुआ सलाम हुई तो जान में जान आई। सरदार जी मुझे लेकर टैक्सी की ओर चल दिए। बीच में किसी दक्षिण भारतीय युवक को उन्होंने एक अदद "हाई" उछाल दी। रास्ते में सरदार जी ने एअरपोर्ट पर अपने देर से प्रकट होने का राज़ खोला। वे समय से पहले पहुंचे थे, पर मेरा और मेरी कंपनी का नाम लिखी तख्ती घर में भूल गए। कार से वेटिंग लाऊंज आते–आते मेरी कंपनी के नाम "प्रिमस सॉफ्टवेअर" में से प्रिमस उनकी याददाश्त से कहीं टपक गया और वे सिर्फ़ सॉफ्टवेअर को अपने साथ वेटिंग लाऊंज लेते आए। दक्षिण भारतीय युवक इमिग्रेशन से निकलने वाला पहला हिंदुस्तानी था। सरदार जी ने उससे सवाल दागा, "आर यू फ्रॉम सॉफ्टवेअर?" अब भला वह युवक क्यों मना करता आख़िर वह भी यहां कंप्यूटरों से कुश्ती लड़ने ही तो आया था। सरदार जी उस भाई को अतुल अरोरा समझ, अपने साथ ले गए और लगे रस्ते में पंजाबी झाड़ने। सरदार जी का माथा ठनका जब वह बंदा अंग्रेजी से नीचे उतरने को राज़ी नहीं हुआ। सरदार जी को दाल में काला नज़र आया कि अगर कोई बंदा न हिंदी समझता है न पंजाबी तो वह अरोरा तो हो ही नहीं सकता। सरदार जी ने जब उसका नाम पूछने की ज़हमत उठाई तो उन्हें इल्म हो गया कि वह ग़लत आदमी को पकड़ लाए हैं और असली अरोरा उन्हें एअरपोर्ट के वेटिंग लाऊंज पर लानतें भेज रहा होगा। बेचारे तुरंत यू टर्न लगा कर एअरपोर्ट वापस आए जहां उस दक्षिण भारतीय युवक को लेने आया ड्राइवर हैरान हो रहा था कि उसका मुसाफ़िर कहां तिड़ी हो गया। सरदार जी ने, इससे पहले कि असली अरोरा कहीं गुम न हो जाए, कहीं से एक कागज़ का जुगाड़ कर मेरा नाम उस पर लिखा और मेरा इंतज़ार करने लगे।


यह बर्तन रखने की अलमारी है


कंपनी के गेस्ट हाउस में दो जंतु मिले, एक हिंदी भाई महेश एक चीनी भाई डांग। डांग को मेरे महेश से हिंदी बोलने पर कोई एतराज़ नहीं था, होता भी तो बेचारा अकेला चना कौन सा भाड़ फोड़ लेता। महेश भाई टीसीएस के भूतपूर्व कर्मचारी थे और उन्हें अमेरिका प्रवास का एक वर्ष का अनुभव था। शुरू में बड़ी खुशी हुई कि नए देश में अपनी ज़बान बोलने वाला कोई अनुभवी मित्र मिल गया। पर यह खुशफ़हमी ज़्यादा देर नहीं रही। महेश भाई का अनुभव खाने पीने के मामले में बहुत कष्टकारी सिद्ध हुआ। बंदा ग्रोसरी स्टोर में शापिंग कार्ट लेकर एक तरफ़ से दौड़ लगाता था और पेमेंट काउंटर पर पहुंचने से पहले उसकी शापिंग कार्ट वाली ट्रेन के सिर्फ़ चार अदद स्टेशन आते थे टमाटर, दूध, दही एवं फल। इन सबके अतिरिक्त बाकी सभी चीजें किसी न किसी प्रकार उसकी नज़र में मांस युक्त थी अतः कुछ देखना उसके हिसाब से समय की बरबादी था। चार दिन से भाई ने टमाटर, चावल व दही निगलने पर मजबूर किया हुआ था। मैं हैरान था कि बाकी कनपुरिये मात्र दही–चावल–टमाटर पर यहां कैसे अब तक जीवित हैं।


एक दिन अपने पुराने मित्र शुक्ला जी के घर फ़ोन किया तो उनकी धर्मपत्नी ने इंडियन ग्रोसरी जाने की सलाह दी। पर महेश भाई को इंडियन ग्रोसरी ले जाने को तैयार करना किसी कुत्ते को बाथटब में घुसेड़ने से कम मुश्किल नहीं था। रोज़ वही दही–चावल–टमाटर का भोज फिर बर्तन धोना। एक दिन महेश भाई चावल बनाने में व्यस्त थे और मैं गप्पबाज़ी में कि अचानक किसी अलमारी जैसी चीज़ का हैंडल मुझसे खुल गया। एक अजीब सी अलमारी जिसमें बर्तन लगाने के रैक बने थे। मेरे प्रश्न का महेश भाई ने उत्तर दिया, "यह बर्तन रखने की अलमारी है। मैंने कहा पर रैक तो ऊपर काउंटर पर भी लग सकते थे, तो यह अलग से अलमारी की क्या ज़रूरत?" महेश भाई ने शांत भाव से उत्तर दिया ताकि बर्तनों का पानी इसी में गिर जाए, देखो अलमारी के नीचे पानी निकलने का छेद भी बना है।


मैं अभी तक बिजली के उल्टे स्विच की महिमा ही समझ नहीं पाया था, अब यह नया शगूफा। दरअसल जिस अपार्टमेंट में हम रुके थे वहां तकरीबन हर महीने नए लोग आते रहते थे एवं पुराने लोग जाते रहते थे। इस आवागमन की अवस्था को बेंच पर आना या बेंच से बाहर जाना कहते हें। बेंच का तत्वज्ञान बड़ा सीधा सा है। हिंदुस्थान से कंप्यूटर प्रोग्रामर्स को अमेरिकी कंपनियां बॉडी शॉपर्स य हेड हंटर्सहृ 'एच वन बी' वीसा पर बुलाती है अपना स्थायी कर्मचारी दर्शा कर, जो निश्चित अवधि के प्रोजेक्टस पर दूसरी कंपनियों में काम करते हैं। दो प्रोजेक्टस के बीच की अवस्था, या फिर नए'एच वन बी'रंगरूट को पहला प्रोजेक्ट मिलने से पहले की अवधि बेंच पीरियड कहलाती है। यह एक तरह से अघोषित बेरोज़गारी है जिसमें हर बॉडीशॉपिंग कंपनी के कायदे कानून उसकी सुविधा के अनुसार बने हैं। कोई कंपनी बिना कोई भत्ता दिए 6–7 लोगों को एक ही अपार्टमेंट में ठूंसकर रखती है। हफ्ते भर का राशन दे दिया जाता है और तब तक पूरी तनख्वाह नहीं मिलती जब तक बेंच पीरियड ख़त्म न हो जाए। इस गोरखधंधे का खुलासा आगे के अध्यायों में विस्तार से करूंगा, यहां सिर्फ़ इतना ही जोडूंगा कि मैं इस कंपनी में पहले से तसल्लीबख्श हो कर आया था। मुझे पता चल गया था कि मेरे कुछ और मित्र भी इसी कंपनी के सौजन्य से अमेरिका पधारे हैं या आने वाले हैं। बाद में कंपनी के काम के तौर–तरीके देखने और कंपनी के मालिकों से मिलने के बाद यह यकीन हो गया कि मेरा कंपनी पर भरोसा सही निकला। पर गेस्ट हाउस में एक हफ्ते में ही महेश भाई के तथाकथित अनुभव का पोस्टमार्टम हो गया। श्री सत्यनारायण उर्फ सत्या पीट्सबर्ग से बेंच पर गेस्ट हाउस में पधारे। वे अमेरिका प्रवास के मात्र चार माह के अनुभवी थे उस पर से ड्राइविंग लाइंसेंसधारी भी नहीं थे अतः महेश भाई की नज़र में तुच्छ प्राणी थे। दही–चावल–टमाटर का भोज तो वे बिना शिकवा शिकायत के उदरस्थ कर गए पर हमें बर्तन साफ़ करते देख कर खुद को रोक नहीं पाए और जिज्ञासु होकर पूछ बैठे कि हमें डिश वाशर से क्या एलर्जी है? मैंने पूछा कि यह डिश वाशर किस चिड़िया का नाम है तो उन्होंने बर्तन रखने की अलमारी के असली गुणों का परिचय करा कर हम अज्ञानियों का उद्धार कर दिया।


परंतु अब महेश भाई हम लोगों के निशाने पर आ चुके थे। जल्द पता चल गया कि महेश भाई के दही–चावल–टमाटर प्रेम का राज़ शाकाहार नहीं बल्कि निरी कंजूसियत है। महेश भाई वास्तव में टीसीएस एक नामचीन भारतीय बॉडी शॉपिंग फर्म से फरारी काट रहे थे। वे खुद अटलांटा में थे पर उनके प्राण उनकी खटारा कार जिसे वे केंटकी में छोड़ आए थे, में अटके थे। हर शनिवार की सुबह उनका एक ही शगल होता था, केंटकी फ़ोन करके अपने दोस्तों से यह पूछना कि उनके पुराने मैनेजरों में कोई उनको, उनके बिना बताए भाग आने पर ढूंढ तो नहीं रहा, और अपने दोस्तों से चिरौरी करना कि अटलांटा घूमने आ जाओ। वजह साफ़ थी, पांच सौ डालर की कार को बिना नौसौ का भाड़ा खर्च किए अटलांटा मंगाने का इससे सस्ता तरीका नहीं हो सकता था। महेश भाई ने बचत के अनोखे तरीके ईजाद कर रखे थे। दो महीने से पहले बाल कटवाने नहीं जाते थे। अपनी कृपण मित्र मंडली के सौजन्य से हर बार ऐसी हेयर कटिंग सलून का पता लगा लेते थे जहां नए कारीगरों को प्रशिक्षण के लिए माडलों की ज़रूरत होती थी। महेश भाई हमेशा ऐसी जगह सहर्ष माडल बनने को तैयार हो जाते थे, क्योंकि वहां बाल काटने के चौथाई पैसे पड़ते थे। तभी वह हर बार नई से नई हैरतअंगेज़ हेयर स्टाइल में नज़र आते थे, भले ही इसी वजह से हमारे कंपनी मालिक नीरज साहब उन्हें उस हफ़्ते कहीं व्यक्तिगत साक्षात्कार पर भेजने से पहले हज़ार बार क्यों न सोचें।


हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं


सप्ताहांत पर महेश भाई को एक मित्र मोहन ने अपार्टमेंट शेयर करने का प्रस्ताव दिया। मोहन ने मुझे भी साथ ले लिया। अपार्टमेंट खोज के दौरान महेश भाई ख़ासतौर से हर अपार्टमेंट कांप्लेक्स का स्विमिंग पूल देखने का आग्रह ज़रूर करते थे। मोहन को उनका स्विमिंग पूल से अतिशय प्रेम हजम नहीं हो रहा था। एक और बात थी कि अक्सर अपार्टमेंट पसंद आने के बाद मोहन भाई स्विमिंग पूल देख कर ही अपार्टमेंट नापसंद कर देते थे। झल्लाकर मोहन को पूछना पड़ा कि आख़िर स्विमिंग पूल से महेश को क्या शिकवा है? बात बड़ी दिलचस्प निकली। दरअसल महेश भाई ध्यान दे रहे थे कि आसपास अश्वेतों की आबादी कितनी है। चूंकि वर्णभेद दंडनीय अपराध है, अतः प्रबंधतंत्र से सीधे नहीं पूछा जा सकता था कि वहां किस तरह के लोग रहते हैं? इसलिए महेश भाई ने स्विमिंग पूल के मुआयने के बहाने अश्वेतों की आबादी का अनुपात निकालने की विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया था। यह पता चलने पर मोहन ने महेश भाई को लंबा चौड़ा भाषण पिला दिया, गांधी जी तक को बहस में घसीट लिया गया। पर महेश भाई टस से मस नहीं हो रहे थे। बहुत घिसने पर महेश भाई ने बताया कि अश्वेतों से उन्हें कोई दुराग्रह नहीं है, बल्कि पूर्व में उनके साथ हुई एक दुर्घटना इस एलर्जी का कारण है। दरअसल जैसे लंगड़े को लंगड़ा कहना ग़लत है वैसे ही काले को काला कहना। देशी बिरादरी अश्वेतों को आपसी बातचीत में कल्लू कहकर बुलाती है। पर धीरे–धीरे यहां के कल्लुओं को पता चल गया है कि कल्लू का मतलब क्या होता है। बल्कि उन लोगों ने सभी प्रसिद्ध भाषाओं में कल्लू का मतलब सीख रखा है। पर महेश भाई को कल्लुओं के ज्ञान की सीमा का पता न्यूयार्क यात्रा में चला। वे अपने बचपन के दोस्त के साथ घूम रहे थे, जिसका नाम दुर्योग से कल्लू था। महेश भाई ने टाइम्स स्क्वेयर पर दोस्त को ज़ोर से पुकारा और पास खड़े चार अश्वेतों को इतना बुरा लगा कि उन्होंने महेश भाई को खदेड़ लिया। वह दिन है और आजका दिन है महेश भाई एक ही गाना गाते हैं,


"जिस गली में तेरा घर हो कलवा, उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं।"

The Story continues in next episode.

 

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part2

कनपुरिया चला एनआरआई बनने


लुफ्थांसा की फ्लाइट से अटलांटा जाना था। दिल्ली तक परिवार छोड़ने आया था। पहली बार विदेश जाने का अनुभव भी आम की तरह खट्टा मीठा होता है। परिवार से विछोह सालता है। नए देश के अनजाने बिंब मन में घुमड़ते हैं कि जो कुछ अब तक सिर्फ़ तस्वीरों में देखा है वह साकार होने जा रहा है। एक अजीब सी अनिश्चितता परेशान करती है कि पहले खुद को बाद में परिवार को एकदम अनजानी धरती पर स्थापित करना है। यह सब रोमांचक भी है और कठिन भी। वह सब याद करने पर एक फ़िल्म का डायलॉग याद आता है, 'अ लीग ऑफ देअर ओन' में महिला बेसबालकोच बने टाम हैक्स अपनी मुश्किलों पर आंसू बहाती एक लड़की पर चिल्लाते है कि "अगर यह खेल मुश्किल न होता तो हर कोई इसका खिलाड़ी होता। फिर मुश्किलों पर आंसू क्यों बहाना?" सच भी है जब दूसरे छोर पर सुनहरे भविष्य की किरणें दिखती हैं तो न जाने कहां से हर मुश्किल हल करने की जीवटता आ जाती है। खालिस कनपुरिया को अच्छा ख़ासा एनआरआई बनते देर नहीं लगती।

 

प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?

दिल्ली के इंदिरा गांधी एअरपोर्ट पर औपचारिकताएं निपटाते हुए एक मज़ेदार वाक्या याद आ गया। लखनऊ में साथ में एक अनिल भाई साथ में काम करते थे। अनिल को हमारे सब साथी प्यार से गंजा कहते थे क्योंकि वह बहुत छोटे बाल रखता था। ख़ैर हमारा प्यारा गंजा विश्व बैंक के गोमती प्रोजेक्ट पर हमारी कंपनी की तरफ़ से कुछ काम में लगा था। प्रोजेक्ट मैनेजर को दिल्ली में प्रोजेक्ट रिपोर्ट दिखानी थी। प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो गंजू भाई ने बड़ी धांसू बना दी। पर प्रोजेक्ट मैनेजर में प्रोजेक्ट कमेटी के सवालों की बौछार और कंप्यूटर पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट को एक साथ चलाने का माद्दा नहीं था, चुनांचे उसने गंजे को दिल्ली साथ चलने का हुक्म तामील कर दिया। गंजा बाराबंकी का रहने वाला था और मेरी तरह उसने भी एरोप्लेन को या तो तस्वीरों में देखा था या टीवी पर। ख़ैर जनाब अपने प्रोजेक्ट मैनेजर के साथ दिल्ली की फ्लाइट पर सवार हो गए। गंजू भाई बाकी यूपीवालों की तरह पानमसाले के शौकिन थें और हवाई यात्रा में भी मसाला मुंह में दबाए हुए थे। उन्होंने सोचा कि मौका पाकर हवाई जहाज के शौचालय में पीक थूक देंगे। पर कुछ देर में नींद लग गई। आधे घंटे बाद नींद खुली तो आदतन पीक नीचे थूकने के लिए खिड़की खोलने की नाकामयाब कोशिश की। खिड़की नहीं खुली तो ताव में पीक पिच्च से पांव के नीचे ही थूक दी। दरअसल गहरी नींद से जागने के बाद गंजू भाई भूल गए थे कि वह दिल्ली तशरीफ़ ले जाए जा रहे हैं, उनको गफ़लत थी कि वह बाराबंकी जाने की बस पर सवार है। बगल वाले यात्रियों के चिल्लपों मचाने पर गंजू भाई उनसे बाराबंकी वाले अंदाज़ में भिड़ गए। इस धमाल के बीच परिचारिका एअरहोस्टेस आ गई और पीक देख कर गंजू भाई की ओर उसने भृकुटी तानकर पूछा कि यह क्या है? गंजू भाई अभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ थे कि यह बस में लेडी कंडक्टर कहां से आ गई? उन्होंने बड़े भोलेपन से पूछा क्या बाराबंकी आ गया? एअरहोस्टेस ने कर्कश स्वर में जवाबी सवाल किया, "प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?" अब मामला गंजू भाई की समझ में आ गया था, आगे क्या हुआ यह बताना गंजू भाई की तौहीन होगी।

 

यह लेमन वाटर क्या होता है?

मैंने लुफ्थांसा की फ्लाइट में दो नादानियां की थीं। पहले तो जब एअरहोस्टेस ने मुस्कुराते हुए इअरफ़ोन दिया तो मैंने भी मुस्कुराते हुए यह सोचकर वापस कर दिया कि भला विदेशी संगीत सुनकर क्या करूंगा। यह देर से पता चला कि प्लेन पर फ़िल्में देखने का भी इंतज़ाम होता है। फिल्म पंद्रह मिनट की निकल गई तब जाकर पता चला कि एअरहोस्टेस को बुलाने के लिए अपने हाथ के पास लगा बटन दबाना पर्याप्त है। दूसरी नादानी खाने के बाद काफी लेकर की। अपने उत्तर भारत में काफी दूध वगैरे डालकर मीठी पीते हैं। अंगे्रजों की काफी एकदम काली और ज़हर के मानिंद कड़वी लगी। कुछ–कुछ ऐसी ही काफी दक्षिण भारत में भी प्रचलित है। ख़ैर एअरहोस्टेस से लेमन वाटर मांगा। एअरहोस्टेस ने हैरत जताई कि उसने कभी लेमन वाटर के बारे में नहीं सुना। बाद में वह सादे पानी में कटा नीबू डालकर ले आई। अब इस तरह का लेमन वाटर तो अपने यहां होटल में खाने के बाद चिकने हाथ साफ़ करने में उपयोग होता है जिसे कभी–कभी कोई देहाती नादानी में पी भी जाता है, यहां मैं देहाती बन गया था। पता ही नहीं था कि विदेशों में लेमन वाटर लेमोनेड के नाम से जाना जाता है। हो सकता है कि एअरहोस्टेस को नहीं पता होगा अतः सदाशयता में वह सादे पानी में कटा नींबू डालकर ले आई। पर शायद एअरलाइन के कर्मचारियों को यह ट्रेनिंग तो दी जाती है कि दुनिया के अलग–अलग हिस्सों में कुछ खाद्य पदार्थ अलग नाम से भी प्रचलित है। ऐसे मामलों में यह गोरे लोग विशुद्ध घोंघाबसंत बनकर क्या रेशियल प्रोफाइलिंग नहीं करते? सोचिए अगर एअरइंडिया की एअरहोस्टेस किसी अमेरिकी के एगप्लांट मांगने पर अंडों पर मूली के पत्ते सजाकर पेश कर दें तो क्या होगा?

Contd..

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US

Getting a H-B1 Visa to USA is every Indian software engineer's dream .What changes happen to the lifestyle of an ordinary computer engineer from a non-metro city , after getting a H-B1 Visa to USA is mostly heard from others. Let me present here the memoirs of one such engineer in first person . It is hillarious as well as knowledge enhancing account of the things in store , for those who dream  this Visa....

 

 अथ कंप्यूटर इंजीनियर अमेरिका  कथा - 1 (प्रयाण)

 

अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में इन्फॉरमेशन टेक्नोलाजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही और सरकार सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबुओं के पीकदान बनने के लिए, अतः भला इसी में है कि हम भी हवा के रुख़ के साथ अमेरिका के लिए बोरिया बिस्तर बांध लें।
ख़ैर कुछ महीने तक अपनी कर्मकुंडली यानि बायोडेटा को कम से कम एक हज़ार नियोक्ताओं के पास भेजने के बाद यह तक भूल गया कि किस किस के पास भेजा था। सोचा कि दिल बहलाने को ग़ालिब ख्.याल अच्छा है, हम तो ख़ाक छाने कानपुर की और हमारी कर्मकुंडली इंटरनेट की बदौलत दुनिया की मुफ़्त सैर कर रही है। ख़ैर कर्मकुंडली को कुछ लोगों ने पसंद भी किया और कुछ टेलीफोन काल्स भी आईं, ऐसे ही एक दिन फोन रिसीव करने पर उधर से शालीन आवाज़ आई,
"अतुल, मैं नीरज बोल रहा हूं.। आपका बायोडेटा देखा। उसी सिलसिले में आपके अब तक किए गए काम के बारे में बात करना चाहता हूं।"
कुल पांच मिनट की संक्षिप्त बातचीत हुई और जनाब ने यक्ष प्रश्न पूछ डाला,
"हां कहने के क्या लोगे?"
मैं पशोपेश में था कि नीरज साहब रहते किस शहर में हैं, दिल्ली या बम्बई तो फिर उसी हिसाब से मुंह खोलूं। खैर कूटनीतिक जवाब दिया " नीरज जी, यह बहुत कुछ मेरे नियुक्ति स्थल पर निर्भर करता है।"
नीरज जी ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया "नियुक्ति स्थल से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता। हां वेस्ट कोस्ट हो तो बात अलग है।"
मेरे मन की एक साथ कई घंटियां बज गईं "क्या वेस्ट कोस्ट, यानि कि अमेरिका, यानि कि जवाब डॉलर में देना चाहिए, यानि कि . . ."।
ख़ैर नीरज जी ने जो ऑफर दिया वह मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। नीरज ने अगले दिन ईमेल भेजने की बात कही और अगले दिन टेक्निकल ईंटरव्यू करने का ज़िक्र किया, पर अगले दिन मेरे ईमेल इनबाक्स पर ऑफर लेटर विराजमान था, और दो दिन में ही एक कोरियर असली पत्र कुछ हिदायतों के साथ जिनमें पासपोर्ट के कुछ पन्ने भी मांगे गए थे। इस पांच मिनट की कॉल ने, कनपुरिया भाषा में बवाल मचा दिया। अब कानपुर की आबोहवा छूटने का समय आ गया था। ज़िंदगी ने 180 डिग्री का मोड़ ले लिया था। एक अनजानी दुनिया में पैर टिकाने की तैयारियां करनी थी।

क्या छोड़े क्या ले चलें 


पहले कुछ दिन बड़ी दुविधा में बीते। अगर आप में से कोई पहली बार अमेरिका आ रहा है तो यह प्रसंग आपके काम का हो सकता है। आपको ऐसे–ऐसे विशेषज्ञ मिल जाएंगे कि जिन्होंने खुद तो अपने शहर के बाहर ताउम्र पांव भी नहीं रखा होगा पर आपको अमेरिका में किस चीज़ की ज़रूरत पड़ती है, क्या मिलता है, क्या भारत से लाना पड़ता है यह सब बताने को तत्पर रहेंगे। यह और बात है कि इन सबकी सलाह परस्पर विरोधी होंगी और अंततः आप लालू यादव की भाषा में कन्फ्युजिया जाएंगे। एक ऐसे ही अंकल मुझे एक दिन अलग कमरे में ले जाकर चिंतातुर हो रहे थे कि यार तुम शराब को हाथ भी नहीं लगाते तो अटलांटा जैसी ठंडी जगह में ज़िंदा कैसे रहोगे। अब अटलांटा तो ख़ास ठंडा नहीं था पर मैं तो उन्हें बताना चाहता हूं कि चार साल से फिलाडेल्फिया जैसी जगह जहां बर्फ़ भी पड़ती है वहां मेरे जैसे कई भलेमानुष बिना सुरासेवन के ज़िंदा हैं। कोई वहां कढ़ाई ले जाने पर ज़ोर दे रहा था तो कोई रज़ाई। भला हो अमेरिका में पहले से रह रहे मित्रों का जिन्होंने वक्त पर सही मार्गदर्शन कर दिया। यहां सब कुछ मिलता है। घर को गरम रखने का इंतज़ाम होता हैं अतः रजाई कोई नहीं ओढ़ता। मेरे एक मित्र को ऐसे ही विशेषज्ञों ने रज़ाई, कढ़ाई और न जाने क्या माल असबाब लाद कर ले जाने पर मज़बूर कर दिया था। बेचारा एअरपोर्ट पर फौजी स्टाईल के बिस्तरबंद के साथ कार्टून नज़र आ रहा था।


मेरे जीजा भी कैलीफोर्निया में रहते हैं

 

अमेरिका जाने पहले सभी नाते रिश्तेदारों से एक बार मिलने के सिलसिले में बड़ा मज़ेदार अनुभव हुआ। ज़्यादातर दूर के रिश्तेदारों के न जाने कहां से अमेरिका में संबंधी उग आए। अपने निकट का तो ख़ैर कोई भी भारत से तो क्या उत्तर प्रदेश से भी बाहर मुश्किल से ही गया होगा। अब इन दूर के रिश्तेदारों और जानपहचान वालों ने अपने अमेरिकी रिश्तदारों के नंबर भी देने शुरू कर दिए, इसके लिए मुझे साथ में हमेशा एक डायरी रखनी पड़ती थी। सोचता था कि कभी तथाकथित अमरीकी रिश्तेदारों को देखा तो है नहीं इन लोगों के यहां, जो रिश्तेदार अमेरिका में रह कर इन पास के रिश्तेदारों को नहीं पूछते वे भला मुझ दूर के रिश्तेदारों को क्यों लिफ्ट देंगे। फिर भी औपचारिकता निर्वाह हेतु नंबर सबके नोट कर लिए।
एक दिन तो हद हो गई। किसी ने सलाह दी कि, कस्टम के नियमानुसार सारे लगेज बैग में चाहे छोटे ही सही ताले लगे होने ज़रूरी हैं। अतः एक परचून वाले की दुकान जाकर सबसे सस्ते ताले मांगे। परचून वाले ने ताले देते हुए पूछ लिया कि "साहब थोड़े मज़बूत वाले ले लो, यह तो कोई भी तोड़ देगा।" मैंने जब हल्के ताले पर ही ज़ोर दिया तो उसने अगला सवाल उछाला, "क्या प्लेन से कहीं जा रहे हैं? मेरे हां के जवाब में अगला सवाल हाज़िर था कि कहां? मेरे अमेरिका कहते ही वह परचूनिया बोला, "अरे भाई मेरे जीजा भी कैलीफोर्निया में रहते हैं। आप उनका नंबर ज़रूर ले जाओ। शायद काम आ जाएं," और वह जनाब बाकी ग्राहकों को टापता छोड़ डायरी लेने चल दिए। मैं सोच रहा था कि मेरा खानदान अब तक अमेरिकियों से अछूता कैसे रह गया। यहां तो परचूनिए तक के संबंधी अमेरिका में बैठे हैं। चाहे वह इन हिंदुस्तानियों को पूछे न पूछे यह लोग हरेक को उनका नंबर दरियादिली से बांटते रहते हैं।

फन्ने खां मत बनो


शुभचिंतकों की राय थी कि अमेरिका जाने से पहले कार चलाना सीख लेना फ़ायदे में रहेगा। हालांकि वहां कार चलाने का ढंग बिल्कुल अलग है पर कम से कम स्टीयरिंग पकड़ने का शऊर तो होना ही चाहिए। अपने परिवार में किसी ने पिछली सात पुश्तों में भी कार नहीं ख़रीदी है, अतः एक कारड्राइविंग स्कूल में जाकर ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग सेंटर के अनुभव से कह सकता हूं कि ज़्यादातर रईस अपने किसी रिश्तेदार या ड्राइवर से कार चलाना सीखते हैं, इसका मज़ेदार नतीजा बाद में मैंने अमेरिका में देखा। इन ट्रेनिंग स्कूल में आने वाले ज़्यादातर लड़के ड्राइवर की नौकरी करने के लिए सीखने आते हैं। ट्रेनर कोई खान साहब थे। बेचारे लड़के खान साहब से इतनी चपत खाते थे कि पूछिए मत। खान साहब हर ग़लती पर उनके सर के पीछे ज़ोरदार चपत रसीद करते थे इस जुमले के साथ "ससरऊ, कायदे से सीखो वर्ना मालिक दो दिन में निकाल बाहर करेगा।" पर खान साहब ने मुझे कानपुर में ही एक्ज़िट रैंप, हाइवे मर्जिंग वगैरह के बारे में बता दिया था। यह बात दीगर है कि उन्होंने खुद कभी हिंदुस्तान से बाहर कदम नहीं रखा। एक दिन मज़ेदार वाक्या हुआ। मेरी ट्रेनिंग का आख़िरी दिन था। खान साहब ने मुझसे खाली सड़क पर कार तेज स्पीड में चलवा कर देखी और तारीफ़ की कि तेज़ स्पीड में भी कार लहराई नहीं। लौटते समय एक लड़का चला रहा था। बेचारे ने खाली सड़क देख कर जोश में कार कुछ तेज़ भगा दी और तभी उसके सर के पीछे ज़ोर की टीप पड़ी। खान साहब गुर्रा रहे थे, "ज़्यादा फन्ने खां बनने की कोशिश न करो, तुम भी क्या इनके साथ अमेरिका जा रहे हो जो हवा में कार उड़ा रहे हो?"


तुम्हारा एअरकंडीशनर उखड़वा दूं क्या?


विदेश जाने से पहले इन्कमटैक्स क्लीयरेंस लेना था। मेरी पहली कंपनी इन्कमटैक्स के क़ाबिल नहीं थी पर एअरपोर्ट पर इमीग्रेशन काउंटर के यमदूतों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता। इन्कमटैक्स ऑफ़िस से कोई काग़ज़ निकलवाना हो तो कोई न कोई जुगाड़ ज़रूर होना चाहिए। मैं एक इन्कमटैक्स कमिश्नर का सिफ़ारिशी पत्र लेकर पहुंच गया। कानपुर की भाषा में इसे जैक लगाना जैक, जो पंचर कार को ज़मीन से ऊपर उठाने के काम आता हैहृ कहते हैं। कमिश्नर साहब की चिठ्ठी लेकर मैं उस अधिकारी ह्यशायद संपत्ति अधिकारी के पास पहुंचा जिसके पास पूरी इमारत की देखभाल का ज़िम्मा था। उन जनाब ने कमिश्नर साहब की चिठ्ठी एक चपरासी को सुपुर्द की और मुझे उसके साथ भेज दिया हर संबद्ध अधिकारी् लिपिक पर साईन करवाने। एक क्लीयरेंस के लिए इतने सारे अधिकारियों की चिड़िया फार्म पर बैठाने की लालफीताशाही। हर अधिकारी की डेस्क से मेरा निरंकुश फार्म निकल गया पर आख़िर में एक धुरंधर लिपिक टकरा ही गया। चपरासी को दरकिनार कर उसने मुझसे कोई ऐसा फार्म मांग लिया जो मेरे पास नहीं था। घूस खाने के लिए ही इस तरह की ग़ैरज़रूरी शासकीय बाध्यताएं खड़ी की जाती है हमारे समाजवादी दुर्गों में। चपरासी ने उस लिपिक को इशारा किया कि फार्म के साथ कमिश्नर साहब का सिफ़ारिशी जैक लगा है पर वह लिपिक फच्चर लगाने पर तुला रहा। मजबूर होकर चपरासी ने उस लिपिक से कहा, "साहब आप बड़े साहब संपत्ति अधिकारी मिल कर उन्हीं को समझाओ।" लिपिक तैश में आगे–आगे और हम दोनों पीछे से संपत्ति अधिकारी के कमरे में दाखिल हुए। संपत्ति अधिकारी ने प्रश्नवाचक नज़रों से लिपिक की ओर देखा। आगे के संवाद इस प्रसंग का मनोरंजक पटाक्षेप हैं।
संपत्ति अधिकारी : "क्या हुआ?"
लिपिक : "साहब इनके ह्यमेरी तरफ़ इशारा करके फॉर्म में फलाना दस्तावेज़ नहीं लगा है।"
संपत्ति अधिकारी : "तो?"
लिपिक : "साहब वह दस्तावेज़ ज़रूरी है।"
संपत्ति अधिकारी : "कमिश्नर साहब की सिफ़ारिशी चिठ्ठी की भी कुछ इज़्ज़त है कि नहीं?"
लिपिक : "साहब, उनकी चिठ्ठी सिर–माथे पर बरसात में खड़े होकर भी कोई बिना भीगे कैसे जा सकता है?"
इन्कमटैक्स ऑफिस से कोई बिना सुविधाशुल्क दिए कैसे जा सकता है?हृ
संपत्ति अधिकारी : "तुम्हारे कमरे से एअरकंडीशनर उखड़वा दूं क्या?"
लिपिक इस ब्रह्मास्त्र के चलने पर बिना एक शब्द बोले हस्ताक्षर कर दिए। ठंडी हवा का सुख खोने का डर लालफीताशाही अकड़ पर भारी पड़ा।

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