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Blog posts : "Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa"

Why I did not settle in USA ???

कम्प्यूटर इंजीनियर  अमेरिका प्रयाण कथा को पढ़ने के बाद कुछ मित्रों ने मुझ से पूछा कि आप तो 1992 में ही अमेरिका घूम आए थे फ़िर वहां बसे क्योँ नहीं ? पेश हैं वे कारण जिनकी वज़ह से मैं अमेरिका में नहीं बसा  ..

 

अमेरिका मुझे क्यों पसंद नहीं है ? 

 

एक कारण हो तो बताऊं कि मुझे अमेरिका क्यों पसंद नहीं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि वहां थूकने की स्वाधीनता बिलकुल नहीं है। मुझे आश्चर्य है, वह कैसा प्रजातांत्रिक देश है। हमारे यहां पान-गुटका-तंबाकू खाने वाले तो यत्र तत्र थूकते ही हैं, परस्पर मतभेद रखने वालों के लिए भी थूकना अभिव्यक्ति का कितना शक्तिशाली माध्यम है। थूक लेने के बाद मन को कितनी शांति मिलती है, व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। सभी रा…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 17

अमेरिका प्रयाण कथा अंतिम अध्याय ( 17 ) 

स सीरिअल से नौ दो ग्यारह होने का वक्त आ गया है पर उस से पहले अमेरिका में  नौ सौ ग्यारह की महिमा जानना अनिवार्य है। 

 नौ सौ ग्यारह की महिमा अमेरिका मे अनंत है। बड़े काम का नंबर है। दमकल, ऐंबुलेंस या फिर पुलिस को बुलाने के लिए नौ सौ ग्यारह नंबर घुमाया नहीं कि मिनट भर में पुलिस की गाड़ी दरवाज़े पर होती है। एक बार तो किसी नये रंगरूट को कंपनी से मिली निर्देशपुस्तिका में लिख दिया गया था कि आपातकाल में यह नंबर मिलाओ। भाई ने हवाईअड्डे पर कंपनी की भेजी टैक्सी न पाकर हड़बड़ाहट में नौ सौ ग्यारह घुमा दिया। फिर तो लालनीली बत्ती वाली टैक्सी के ड्राइवर यानि कि पुलिसवाले ने जो लेक्चर पिलाया कि पूछिए मत।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 16

भयो प्रगट कृपाला 

 

 

अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाएं लगती हैं, शिशुपालन की भी और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आना है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहां प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 15

 अमेरिका वापसी और हमारे परिवार का अंतर्राष्ट्रीयकरण  

 

 भारत से  वापसी हुई तो डलास से भी रुख़सत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फ़िलाडेल्फ़िया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका के दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ़ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था। वैसे यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। सत्यनारायण अपने बर्फ़ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फ़ीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। इस बार लेकिन कोई विकल्प नहीं था। दिसंबर का मौसम था और डलास से फ़िलाडेल्फ़िया, सौलह सौ मील लंबा ड्राइव करना संभव नहीं था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फ़िलाडेल्फ़िया का रुख़ किया। फ़िलाडेल्फ़िया में एक छोटे से उपशहर, जिसे हम यहां सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा 'किंग आफ प्रशिया'। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 14

पागल कौन?


एक रात में मेरे चाचाश्री का फ़ोन आया। वे मिर्ज़ापुर के पास किसी फैक्ट्री में सहायक जनरल मैनेजर हैं। चाचाश्री कानपुर न आ पाने का कारण बता रहे थे। कारण सुन कर सब हंस–हंस कर दोहरे हो गए।

चाचाश्री की फैक्ट्री में कोई गार्ड था संतराम। किसी मानसिक परेशानी के चलते उसका दिमाग़ फिर गया और वह फैक्ट्री में तोड़फोड़ करने लगा। चाचाश्री ने संतराम को दो चौकीदारों के साथ फैक्ट्री के डाक्टर का सिफ़ारशी पत्र देकर रांची मानसिक चिकित्सालय ले जाकर भर्ती कराने का आदेश दिया। चाचाश्री ने दोनों को निर्देश दिया था कि रांची पहुंच कर वहां के डाक्टर से बात करवा दें।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 13

 

  

अरोड़ा जी अपने इन्जीनियरिंग कालेज़ ( HBTI ,Kanpur ) में

 

एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिए जाएं। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा .वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा . जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला 'डायरेक्टर साहब अभी ज़रूरी मीटिंग कर रहे हैं, दो घंटे के बाद आइए।' पता नही इन क्लर्कों की आदत होती है या इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डंडा इस्तेमाल किया जाए। सचिव ने पूछ लिया 'कहां से आए हैं, मैंने जब डलास कहा तो उसने मुझे अंदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएंट्री का बोर्ड सिर्फ़ स्वदेशियों के लिए ही होता है। …

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 12

कनपुरियोँ से अरोड़ा जी की भिड़न्त 

 

दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाडू लग रही थी, सारे कर्मचारी नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आइए। यहां सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बंद किवाड़ खुलने लगे थे और जेटलैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यावहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घंटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया। …

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 11

अरोड़ा जी  NRI बनकर कानपुर छुट्टी पर लौटे..

 

 


 

डेढ़ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गईं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुंचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सवेरे के समय पहुंचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते–आते रात हो गई थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आंखों में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूंढ़ते–ढूंढ़ते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की ज़मीन छुई तो प्लेन के अंदर सारे बच्चों ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखकर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत मां की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षों बाद लौटे थे, हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गए।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 10

 अमेरिकन स्वतंत्रता दिवस की मस्ती

 

 

अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस 4 जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती हैं 'सारे जहां से अच्छा' की स्वर लहरियां, रंग बिरंगी झंडियां, स्कूल में बंटने वाले बूंदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गांधी ने कितनी बार 'हम देख रहे हैं' या 'हम देखेंगे' कहा। यहां माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह–जगह स्टार और स्ट्राइप्स यानि अमेरिकी झंडा तो दिखता है, पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिख सकता है। पूरी आज़ादी है आपको अमेरिकी झंडा लगाने की और तो और लोग स्टार और स्ट्राइप्स वाली टी शर्ट और बनियान तक पहन डालते हैं। चारों ओर सेल के नज़ारे। हां, शाम को तकरीबन हर शहर में संगीत समारोह, खाना–पीना और धुआंधार आतिशबाज़ी ज़रूर होती है।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 9

पापड़ और जलेबी 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

होटल में तीन दिन रुकने के बाद हम नए अपार्टमेंट में गए।। सामान पहुंचाते–पहुंचाते रात के एक बज गए। अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी। मेरे पार्किंग लॉट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी। मैने कुछ देर के लिए एक आरक्षित किंतु खाली पार्किंग लॉट हथिया लिया। अपार्टमेंट में समान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए। सीधे सवाल दागा कि क्या यह करोला तुम्हारी है। मैने बड़ी जल्दबाज़ी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लॉट में किसी ने हथिया रखा है अतः मैने दूसरे पार्किंग लॉट का प्रयोग कर लिया। वृद्ध सज्जन का अगला बाउंसर था, आपका पार्किंग लॉट हथिया लिया गया हो तो इसका यह मतलब नहीं कि आप भी किसी का पार्किंग लॉट हथिया लें। आप गेस्ट लॉट का प्रयोग कर सकते थे। जवाब बिलकुल वाजिब था। चांदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था। मैने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लॉट प्रयोग किया था, मैं अभी ख़ाली करता हूं। लेक…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 8

 

तबादला डलास के लिए  

 

एक दिन सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी। सीधी साधी भाषा में मतलब यह था कि उन्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं थी। और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया। जैसा कि पहले भी बता चुका हूं कि तेज़ी से बदलती तकनीक वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दो चार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है। इन सबके साथ जुड़ी है स्थानांतर की चिर समस्या। यानि कि नए प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान और कार का स्थानांतरण फिर घर का पता, टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नए स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद। ख़ैर बेंच पर आने का पहला सोमवार था। मार्च की गुनगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं नया कुछ तकनीकी मसला पढ़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी। यह मामू का फोन था। मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगरामों ने बिचौलियों के लिए ईजाद कर रखा है। पता चला कि दो घंटे में कोई जनाब इंटरव्यू के लिए फोन करेंगे। फोन आया और सिर्फ यह पू…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 7

अर्थ -  अनर्थ 

 

"सोती किधर हैं ?

 

यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है। घटना की संवेदनशीलता को मद्देनज़र रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों (तीसरी पात्रा से अब संपर्क नहीं है) से इसे  संस्मरण  में  शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है। बात मेरे पहली कार ख़रीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका ज़िक्र इस अध्याय में ही उचित होगा। मेरे इंजिनीयरिंग कॉलेज में साथ पढ़े पांच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल पर हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आए। कंपनी के गेस्ट हाउस का फ़ोन नंबर, इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़े अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था। प्रायः सभी मित्र नए आने वाले दोस्तों को फ़ोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और ज़रूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे। मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था। एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती जी गेस्ट हाऊस में पधारे। सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं। उस सप्ताहांत पर मैं गेस्ट हाऊस गया औ…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 6

अथ धर्म - कर्म कथा ...

 

 

 

      मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राइविंग के द्रोणाचार्य बन गए। एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ। अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। मंदिर में गणेश, शिव, हनुमान, मुरुगन, भूदेवी, तिरूपति बालाजी, सब की प्रतिमा एक साथ एक हॉल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ।


मैंने अनुपम जी से, जो हिंदू स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे, से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद–क्षेत्रवाद की समस्या यहां नहीं आई। क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता ए…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 5

 कार लाइसेंस कथा 

 

दो हफ़्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गए। नवीन भाई ने सप्ताहांत पर ड्राइविंग पर हाथ साफ़ करने के लिए रेंटल कार ले ली। हांलांकि नवीन भाई को ड्राइविंग लाइसेंस हममें से सबसे पहले मिला पर धीरे से लगने वाले ज़ोर के एक झटके के बाद। हम सब ड्राइविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गए। यहां आपके साथ एक पुलिस अफ़सर कार में बैठ कर कुछ मानकों के आधार पर ड्राइविंग टेस्ट लेता है। इसमें दो करतब ख़ासतौर से उल्लेखनीय हैं। रोमांचक पैरेलेल पार्किंग और वीविंग यानि की आठ दस प्लास्टिक के खंभों के बीच से शाहरुख़ ख़ान की तरह कार निकालना।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 4

अथ भोजन व्यथा कथा  

 

अगर हमने महेश भाई को झेला तो मेरे मित्र नवीन, नीरज जी व सोलंकी सुरेश भाई से त्रस्त रहे। सप्ताहांत पर नवीन भाई मुझे गेस्ट हाउस बुला लाए। भोजन के दौरान सोलंकी जी ने 'अथ श्री सुरेशानंद व्यथा कथा' छेड़ दी। पता नहीं क्यों कंपनी वालों ने मेरे मित्र के साथ एक मियां बीवी को भी गेस्ट हाउस में टिका दिया था। वैसे सुरेश की बीबी मेरे मित्रों का भी भोजन सस्नेह बना देती थी। वह जितनी भली स्त्री थी सुरेश भइया उतने ही अझेल प्राणी थे। पहले तीन दिन तक तो सारे मित्र उनके श्रीमुख से सिंगापुर एअरपोर्ट के मुकाबले अटलांटा एअरपोर्ट के घटिया होने का प्रलाप सुन–सुन कर त्रस्त हुए। वजह सिर्फ़ एक थी कि माननीय सुरेश जी को अटलांटा एअरपोर्ट में सामान रखने की ट्राली का एक डालर किराया देना खल रहा था जो सिंगापुर एअरपोर्ट में नहीं देना पड़ताा था। उसके बाद सुरेश भाई का सिंगापुर स्तुतिगान, जहां से सुरेश भाई अवतरित हुए थे और अमेरिका का नित्य निंदापुराण मेरे तीनों मित्रों की नियति बन गया। सुरेश भाई द्वारा कंपनी आफ़िस में इकलौते इंटरनेट टर्मिनल पर सारे दिन का कब्ज़ा जमाए रखना एवं…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 3

 प्रथम अमेरिका आगमन  

 

अटलांटा एअरपोर्ट पर इमिग्रेशन से निपटने के बाद बाहर आकर देखा कि लोगों की निगाहें अपने–अपने आगंतुकों को तलाश रही है। कुछ टैक्सी वाले आने वाले लोगों के नाम की तख्ती लिए खड़े थे। तभी मुझे अपने नए कंपनी डायरेक्टर की एक हफ्ते पहले ई–मेल पर दी गई सलाह याद आई कि अपने कैब ड्राइवर से मिलने के बाद ही बैगेज क्लेम से अपना सामान उठाना। दो दिन लग गए थे यह पता करने में कि टैक्सी को कैब भी कहते हैं। पर यहां तो अपना नाम किसी की तख्ती पर नहीं है। अब? आज तो रविवार है। आफ़िस भी बंद होगा। किसी को फ़ोन करूं या खुद टैक्सी करूं। उधेड़बुन में सोचा चलो पहले बैगेज क्लेम से अपना सामान ही उठाया जाय। वापस आकर फिर देखा तो एक नए नज़ारे के दर्शन हुए। वेटिंग लाऊंज तकरीबन खाली हो चुका था। आगंतुकों को लेने आए मुलाकाती उनकी झप्पियां ले रहे थे। एकाध देशी लोग जो महीनों से अपनी बीबियों से दूर थे, उनके आने पर झप्पियों के साथ पप्पी लेने से नहीं चूके। मैं सोच रहा था कि अगर प्लेन में अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया आए होते तो अमेरिका में हिंदुस्तानियों के इस तरह सार्वनजिक प्रे…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part2

कनपुरिया चला एनआरआई बनने


लुफ्थांसा की फ्लाइट से अटलांटा जाना था। दिल्ली तक परिवार छोड़ने आया था। पहली बार विदेश जाने का अनुभव भी आम की तरह खट्टा मीठा होता है। परिवार से विछोह सालता है। नए देश के अनजाने बिंब मन में घुमड़ते हैं कि जो कुछ अब तक सिर्फ़ तस्वीरों में देखा है वह साकार होने जा रहा है। एक अजीब सी अनिश्चितता परेशान करती है कि पहले खुद को बाद में परिवार को एकदम अनजानी धरती पर स्थापित करना है। यह सब रोमांचक भी है और कठिन भी। वह सब याद करने पर एक फ़िल्म का डायलॉग याद आता है, 'अ लीग ऑफ देअर ओन' में महिला बेसबालकोच बने टाम हैक्स अपनी मुश्किलों पर आंसू बहाती एक लड़की पर चिल्लाते है कि "अगर यह खेल मुश्किल न होता तो हर कोई इसका खिलाड़ी होता। फिर मुश्किलों पर आंसू क्यों बहाना?" सच भी है जब दूसरे छोर पर सुनहरे भविष्य की किरणें दिखती हैं तो न जाने कहां से हर मुश्किल हल करने की जीवटता आ जाती है। खालिस कनपुरिया को अच्छा ख़ासा एनआरआई बनते देर नहीं लगती।…

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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US

Getting a H-B1 Visa to USA is every Indian software engineer's dream .What changes happen to the lifestyle of an ordinary computer engineer from a non-metro city , after getting a H-B1 Visa to USA is mostly heard from others. Let me present here the memoirs of one such engineer in first person . It is hillarious as well as knowledge enhancing account of the things in store , for those who dream  this Visa....

 

 अथ कंप्यूटर इंजीनियर अमेरिका  कथा - 1 (प्रयाण)

 

अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में इन्फॉरमेशन टेक्नोलाजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही और सरकार सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबुओं के पीकदान बनने के लिए, अतः भला इसी में है कि हम भी हवा के रुख़ के साथ अमेरिका के लिए बोरिया बिस्तर बांध लें।…

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