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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 13

May 24, 2013

 

  

अरोड़ा जी अपने इन्जीनियरिंग कालेज़ ( HBTI ,Kanpur ) में

 

एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिए जाएं। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा .वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा . जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला 'डायरेक्टर साहब अभी ज़रूरी मीटिंग कर रहे हैं, दो घंटे के बाद आइए।' पता नही इन क्लर्कों की आदत होती है या इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डंडा इस्तेमाल किया जाए। सचिव ने पूछ लिया 'कहां से आए हैं, मैंने जब डलास कहा तो उसने मुझे अंदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएंट्री का बोर्ड सिर्फ़ स्वदेशियों के लिए ही होता है।

डा .जैन अंदर किसी से बात ही कर रहे थे। देखते ही पहचान गए। हज़ारों विद्यार्थियों के नाम और शक्ल याद रख सकने की उनकी क्षमता विलक्षण है। कुछ देर तक वे बड़ी आत्मीयता से हालचाल लेते रहे। तभी कुछ सचिव और एक दो प्रोफ़ेसर जिन्हे मैं नहीं जानता था फाइलें लिए अंदर आए। मैंने चलने की अनुमति चाही तो डा .जैन ने मुझसे बैठे रहने को कहा। बाकी सबको बैठने को कहकर उन्होंने मेरा परिचय सबको यह कहकर दिया कि ये डलास से आए हैं, वहीं काम करते हैं। मैं अभी यही सोच रहा था कि डा .जैन ने मेरा परिचय एचबीटीआई के पूर्व छात्र के रूप में क्यों नही दिया।


तभी डा .जैन मुझसे मुख़ातिब हुए और एक सवाल दाग दिया 'अतुल, यह बताओ कि अगर मेरे पास दस लाख रुपये हो और मुझे एचबीटीआई के कंप्यूटर सेक्शन के लिए कंप्यूटर ख़रीदने हो तो मुझे दो विकल्पों में क्या चुनना चाहिए, पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर या फिर पांच–पांच लाख के दो एडवांस वर्कस्टेशन। 'मैनें सीधे बेलौस राय जाहिर कर दी 'पचास हज़ार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर लेने चाहिए।' डा .जैन के सामने बैठी मंडली में से कुछ लोग कसमसाए और उनमें कोई कुछ बोलने को हुआ कि तभी डा .जैन ने अगला सवाल दागा 'क्यों?' मैं सोच रहा था कि डा .जैन की आख़िर मंशा क्या है और यह समिति किस बात की मीटिंग कर रही है। पर चूंकि मैं डा .जैन के भूतपूर्व छात्र की हैसियत से वहां गया था इसलिए मैंने समग्र जवाब देना उचित समझा। मैंने कहा, 'सर, अगर कोई मशीन या पुल डिजाईन का कोर्स नही चलाना है इनपर तो डेस्कटाप ही ठीक रहेंगे, जिन एप्लीकेशन पर हम काम करते हैं वही यहां सिखाई जानी चाहिए। जो अभी भी यहां नहीं हैं और उन एप्लीकेशन के लिए डेस्कटाप की क्षमता काफ़ी है। उससे कम से कम एकबार में चालीस छात्रों का भला होगा। अगर आप दो कंप्यूटर ले लेंगे तो एकबार में ज़्यादा से ज़्यादा चार लोग ही उसे उपयोग कर सकेंगे। यह वर्कस्टेशन की क्षमता के साथ नाइंसाफ़ी और पैसे की बर्बादी होगी।'

डा .जैन ने मुड़कर बाकी लोगों पर कटाक्ष रूपी प्रश्न किया, 'सुना आपने, यह राय एक अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियर की है, यही राय मैं दे रहा था तो आप सब मुझे बेवकूफ़ समझ रहे थे और कह रहे थे कि मैं बाबा आदम के ज़माने की तकनीकी पर भरोसा कर रहा हूं।' मैंने वहां वाकयुद्ध छिड़ने से पहले फूटने में भलाई समझी। बाद मे पता चला कि अंदर बैठे लोग कंप्यूटर ख़रीद समिति के सदस्य थे और उन लोगो में ख़रीदे जाने वाले कंप्यूटरों की क्षमता को लेकर मतभेद थे। डा .जैन जानते थे कि उनकी व्यवहारिक सलाह को लोग दकियानूसी समझ रहे थे पर जब उसी सलाह पर अमेरिकी स्वीकृती का मुलम्मा चढ़ गया तो वह काम की बात हो गई।

आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है


अमेरिका में ट्रैफ़िक सिग्नल स्वचालित हैं। इसलिए यहां भारत की तरह चौराहे के बीच न तो मुच्छाड़ियल ट्रैफ़िक पुलिसवाला दिखता है न उसके के खड़े होने के लिए बनी छतरी। कभी कभी किसी समारोह वगैरह में या फिर सड़क निर्माण की दशा में ट्रैफ़िक नियंत्रित करने के लिए आम पुलिसवाले या पुलिसवालियां ही ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। पुलिसवालियां तो खै.र पुलिसवालियों जैसी ही दिखती हैं, पुलिसवाले भी कम स्मार्ट नहीं दिखते। केडीगुरू का मानना है कि इन पुलिसवालों की भर्ती के पहले ब्यूटी कांटेस्ट ज़रूर होता होगा। मैंने भी आजतक एक भी तोंदियल पुलिसवाला नहीं देखा अमेरिका में। खै.र फोटोग्राफ़ी का नया शौक चर्राया था, जेब में कैमरा था और हैलट हास्पिटल के चौराहे पर सफ़ेद वर्दी में एक ट्रैफ़िक हवलदार को देखकर उसकी फ़ोटो लेने की सूझी।

पर यह उतना आसान नही निकला जितना सोचा था। ट्रैफ़िक हवलदार बड़ा नखरीला निकला। पहले पंद्रह मिनट तक उसे यही शक बना रहा कि मैं शायद किसी मैगज़ीन या अख़बार से हूं और किसी लेख वगैरह में पुलिस की बुराई करने वाला हूं और उस हवलदार की फ़ोटो अपने लेख के लिए उपयोग कर लूंगा। वैसे पुलिसवालों की छवि कैसी है यह बताने की ज़रूरत नहीं पर उस वक्त वह दरोगा वाकई काम ही कर रहा था, वसूली नहीं। पर उसे यह कतई हजम नहीं हो रहा था कि कोई भलामानुष अपने व्यक्तिगत एलबम के लिए किसी मुच्छाड़ियल पुलिसवाले की फ़ोटो भला क्यों लेना चाहेगा। फिर से अमेरिका का तमगा चमकाना पड़ा। पर जो सवाल उस दरोगा ने किया उसकी उम्मीद बिल्कुल नही थी। उसने पूछा 'आप कह रहे हैं कि आप अमेरिका में रहते हैं पर आपकी स्कूटर पर नंबर तो यूपी का है।' मैं सोच रहा था कि पुलिसवालों की भर्ती के पहले जनरल नालेज का टेस्ट नही होता क्या।

 

 

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