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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 11

May 21, 2013

अरोड़ा जी  NRI बनकर कानपुर छुट्टी पर लौटे..

 

 


 

डेढ़ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गईं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुंचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सवेरे के समय पहुंचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते–आते रात हो गई थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आंखों में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूंढ़ते–ढूंढ़ते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की ज़मीन छुई तो प्लेन के अंदर सारे बच्चों ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखकर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत मां की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षों बाद लौटे थे, हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गए।


हम नहीं सुधरेंगे


हालांकि थोड़ी ही देर में सारा हर्ष गर्म मक्खन की तरह पिघल कर उड़ गया जब कन्वेयर बेल्ट पर अपना सामान नदारद मिला। पता चला कि ब्रसेल्स और ज्युरिख के बीच एअरलाईन वाले सामान जल्दी में नहीं चढ़ा पाए अतः अगली उड़ान में भेजेंगे। उन लोगों ने मेरा सामान निकटतम एअरपोर्ट यानि कि लखनऊ भेजने का वायदा किया। अब मैं हाथ में इकलौता केबिन बैग लेकर ग्रीन चैनल की ओर बढ़ा जहां कस्टम आफ़िसर्स से पाला पड़ा। मेरे बैग में एक अदद सस्ता सा कॉर्डलेस और मेरे कपड़े थे। कस्टम आफ़िसर को वह दस डालर वाला फ़ोन कम से कम सौ डालर का मालूम हो रहा था। मुफ़्त में उसे 900 और 2•9 के फ़ोन का अंतर समझाना पड़ा। हालांकि आजकल कस्टम वाले ज़्यादा तंग नहीं करते, शायद उपर से सख्ती है या फिर अब विदेशी सामान का ज़्यादा क्रेज़ नहीं रहा। पर वर्ष 2000 में स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।

मेरे एक मित्र श्रीमान वेदमूर्ति जिन्हें अक्सर काम के सिलसिले में भारत जाना पड़ता था, इन कस्टम वालों की चेकिंग से अज़िज़ आकर किसी खडूस कस्टम क्लर्क को अच्छा सबक सिखा आए थे। जनाब ने किसी चाईनाटाउन से ऐसा सरदर्द वाले बाम की डिब्बियां ख़रीदी थी जिनपर अंग्रेज़ी में कुछ न लिखा था, इन डिब्बियों को जनाब वेदमूर्ती ने वियाग्रा जेली बताकर इंदिरा गांधी हवाईअड्डे पर कस्टम क्लर्क को टिका दिया था। अब आगे क्या हुआ, यह जानने से बचने के लिए जनाब वेदमूर्ति यथासंभव इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर जाने से कतराते हैं।


इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है?


दिल्ली से कानपुर का सफ़र शताब्दी पर कट गया। सुना है कि दूसरे की दाल में घी हमेशा ज़्यादा दिखता है। यही कहावत आज खुद पर चरितार्थ हो रही थी। पहले रास्ते में पड़े गांव कस्बे जिनको महज़ डेढ़ साल पहले ट्रेन से देखने लायक नहीं समझता था और सिर्फ़ सफ़र का अनचाहा हिस्सा लगते थे, आज बेहतरीन लैंडस्केप का नमूना लग रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली रेल क्रासिंग पर ट्रैक्टर, मोटरसाईकिल और साईकिल पर सवार लोग, लगता था कि बिल्कुल बेतक़ल्लुफ़ और हमारी तेज़रफ़्ता ज़िंदगी के मुकाबले कितने बेफिक्र हैं। मेरी इस राय से मेरे साथ चल रहे मेरे साले साहब यानि कि राजू भाई भी इत्तफ़ाक़ रखते हैं। मज़े की बात है कि राजू भाई को कानपुर की ज़िंदगी तेज़रफ़्ता लग रही है। अपने–अपने पैमाने हैं, पर साफ़ दिख रहा है कि सारे भौतिक सुख बटोर लेने की चाहत ने हमारे कानपुर, लखनऊ सरीखे शहरों में भी अदृश्य एचओवीलेन पैदा कर दी हैं। शेरो–शायरी का कोई ख़ास शौक तो नहीं मुझे पर एक ग़ज़ल का टुकड़ा याद आता है, "इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों है?"


ओमनी वैन


कानपुर सेंट्रल पर पूरा परिवार अगवानी करने आ गया था। हमारे चाचाश्री किसी मित्र की मारूति ओमनी वैन मय ड्राइवर के ले आए थे। आख़िर भतीजा अमेरिका से आ रहा है, मजाल है कि आटो या रिक्शे पर चला जाए। पिछली दो सीटों पर जहां अमेरिका में महज़ पांच लोग बैठते हैं, यहां आठ दस लोग बैठ गए थे। मैं ड्राइवर के बगल में बैठा तो बगल के दरवाज़े से चाचाश्री प्रविष्ट हुए यह कहते हुए कि 'ज़रा खिसको गुरु।' खिसकने के लिए गियर के दोनों तरफ़ पैर डालने पड़े। अब दायीं तरफ़ से ड्राइवर साहब गुज़ारिश कर रहे थे कि भाईजान ज़रा गियर लगाना है, पैर खिसका लीजिए। उधर सामने सड़क पर गाय, भैंसे और साइकिलें, मालुम पड़ रहा था कि विंडस्क्रीन से चिपके हुए चल रहे हैं और कहीं गाड़ी से लड़ न जाए। ऐसा नहीं था कि मैं इन चीज़ों का आदी नहीं हूं, अरे भाई पूरे दस साल मैंने भी साइकिल, टीवीएस चैंप और एलएमएल वेस्पा इन्हीं सड़कों पर चलाई है और ऐसी चलाई है कि जान अब्राहम भी नहीं चला सकता। पर महज़ एक साल के अमेरिका प्रवास ने आदत बिगाड़ दी है। अपनी ही सड़क पर हल्की सी दहशत मालूम हो रही है। सिर्फ़ एक समझदारी की मैंने, कि वैन में यातायात पर कुछ नहीं बोला, नहीं तो पिछली सीट पर बैठे भाई–बहनों की टीकाटिप्पणियों की बौछार कुछ यों आती।


'एक ही साल में रंग बदल गया।'
'रंगबाजी न झाड़ो।'
'जनाब एनआरआई हो गए हैं।'
'यह अटलांटा नहीं कानपुर है प्यारे।'
कनपुरिये तो अटलांटा में कार दौड़ा सकते हैं लेकिन किसी अमेरिकी की हिम्मत है जो कनपुरिया ट्रैफिक के आगे टिक सके?
सुना है तेरी महफ़िल में
एक पुराना गाना याद आता है जो कुछ यों है–
साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी
सुना है तेरी महफ़िल में रतजगा है।


पूरे 36 घंटों का सफ़र कट गया पर रात में जेटलैग शुरू हो गया। इस बला से लंबी हवाई यात्रा कर चुके लोग वाकिफ़ हैं। दरअसल अमेरिका से भारत आते हुए आप समय की कई स्थानीय सीमाएं लांघ कर आते हैं। अमूमन अगर आप अमेरिका से शाम को चलते हैं जब भारत में स्थानीय समय के हिसाब से सुबह होती है। भारत का समय आम तौर पर अमेरिका से 11 घंटे आगे चलता है। इसीलिए शुरू में कई रिश्तेदार जो इस अलबेले समय के झमेले से नावाकिफ़ थे, फ़ोन करने पर हैरान होते थे कि उनके सोने जाने के समय मैं सवेरे की चाय कैसे पी रहा हूं? जब आप दिल्ली पहुंचते हैं तो आपका शरीर उस 11 घंटे की समय सीमा को तुरंत नहीं लांघ पाता। उसे भारत के दिन में रात महसूस होती है। इसीलिए रात के दो तीन बजे नींद खुल जाती है और दोपहर में आदमी सुस्ती महसूस करता है। हालांकि कुछ लोग इसे एनआरआई लटके झटके समझ लेते हैं।

 

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