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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 12

May 23, 2013

कनपुरियोँ से अरोड़ा जी की भिड़न्त 

 

दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाडू लग रही थी, सारे कर्मचारी नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आइए। यहां सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बंद किवाड़ खुलने लगे थे और जेटलैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यावहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घंटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया।

थोड़ी देर में बैंक का चपरासी पहचान गया। दरअसल इसी शाखा में मेरे एक चाचाश्री मैनेजर रह चुके थे, अब उनका ट्रांसफर हो गया था। पर उनकी तैनाती के दिनों में यही चपरासी घर पर बैंक की चाभी लेने आता था। चपरासी का नाम भी याद आ गया शंभू। शंभू ज़ोर से चिल्लाया "अरे भईया आप यहां? कहां थे इतने दिन?" शंभू पंडित को यह तो पता था कि मैं कानपुर से बाहर काम करता हूं पर उसके "बाहर" की परिधि शायद हद से हद दिल्ली तक थी। मैंने भी अनावश्यक अमेरिका प्रवास का बखान उचित नहीं समझा और उसे टालने के लिए कह दिया कि बाहर काम कर रहा था, इसलिए अब कानपुर कम आता हूं। पर शंभू पंडित हत्थे से उखड़ गए। लगे नसीहत देने, "अरे भईया, कोई इतनी दूर भी नहीं गए हो कि दोस्तों के जनेऊ शादी में न आ सको। अरे, दिल्ली बंबई का किराया भी ज़्यादा नहीं है।" अब शंभू पंडित खांमखां फटे में टांग अड़ा रहे थे। उनको रंज था कि मैं अपने कुछ दोस्तों की शादी वगैरह में कानपुर नहीं पहुंचा था। शंभू पंडित के इस तरह से उलाहना से बड़ी विकट स्थिति हो रही थी।


भांडाफोड़ करना ही पड़ा, शंभू पंडित को जवाब उछाला, "अबे, अमेरिका में था, अब यहां हर महीने थोड़े ही आ सकता हूं?" इतना बोलना था कि आस–पास खड़े लोग मुड़कर देखने लगे और पहचानने की कोशिश करने लगे। यहां तक की बैंक मैनेजर के केबिन से आवाज़ आई, "अबे शंभू, कौन है? किससे बात कर रहे हो?" शंभू पंडित को यह ज़ोर का झटका धीरे से लगा था, सकपका कर बोले, "साहेब, अरोरा साहब के भतीजे हैं, अमेरिका में रहते हैं।" केबिन से फिर आवाज़ आई, "अबे तो उन्हें बाहर क्यों खड़ा कर रखा है।" एक मिनट के अंदर ही मैं मैनेजर साहब से मुखातिब था। मैनेजर साहब ने क्लर्क को केबिन में बुलाकर मेरे काम करवा दिया और अमेरिका के बारे में अपनी कुछ भांतियों का निराकरण करवाया। मेरा काम तो हो गया था पर मैं सोच रहा था वह अस्सी लोग जो लाइन में खड़े थे उन्हें क्या मैनेजर साहब बेवकूफ़ समझते थे जिनके ऊपर किसी भी नेता, अभिनेता, वीआईपी या एनआरआई को तवज्जो दी जा सकती है और वे उफ्फ तक नहीं करते।

एनआरआई तमगा

 

बार फिर फ़जीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यों कि लखनऊ फ़ोन करना था। वर्ष 2000 में मोबाईल डब्ल्यूएलएल, आरआईएल, और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुंचा और लखनऊ का नंबर मिलाने लगा। दो–तीन बार प्रयास के बाद भी नंबर नहीं लग रहा था। संचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद संचालक कहीं तशरीफ़ ले गए थे और अपनी बहन को बैठाल गए थे। ख़ैर उस कन्या ने पूछा कि आपका नंबर तो सही है। मेरे हिसाब से तो सही होना चाहिए था, अभी पिछले ही महीने तो अमेरिका से मिलाया था। जब एक बार फिर मिलाने लगा तो कन्या ने टोका,
कन्या : 'आप क्या कर रहे हैं?'
मैं : लखनऊ का नंबर मिला रहा हूं।
कन्या : वह तो ठिक है पर एसटीडी कोड क्या मिला रहे हैं?
मैं :522, क्यों यह नही है क्या?
कन्या : 522 तो ठीक है पर ज़ीरो क्यों नहीं लगा रहे?
मैं : ज़ीरो दरअसल अमेरिका में आदत पड़ गई थी 011 91 522 नंबर मिलाने की, अब यहां 011 91 टपका कर शेष नंबर मिला रहा था।
कन्या : ज़ीरो मतलब शून्य!
 :मैं   अरे मुझे पता है ज़ीरो मतलब शून्य।
कन्या : लेकिन आप 522 के पहले शून्य क्यो नही लगा रहें? क्या पहली बार एसटीडी डायल किया है?


कन्या को अब कुछ शक हो चला था कि मैं शायद घाटमपुर सरीखे किसी देहात से उठकर सीधे शहर पहुंच गया हूं और शायद ज़िंदगी में पहली बार एसटीडी मिला रहा हूं। अब तक बाकी ग्राहकों की दिलचस्पी भी मुझमें बढ़ चली थी। सबकी तिर्यक दृष्टि से स्पष्ट था कि मैं वहां एक नमूना बनने जा रहा था, जो शक्लोसूरत और हावभाव से तो पढ़ा लिखा दिखता था पर उस नमूने को एसटीडी करने जैसे सामान्य काम की भी तमीज़ नही थी। मुझे याद आ गया कि करीब डेढ़ साल पहले एसटीडी मिलाने से पहले जीरो लगाने की आदत अमेरिका में आईएसडी मिलाते मिलाते छूट गई थी और यहां मैंने सिर्फ़ आईएसडी कोड हटाकर ज़ीरो न लगाने की नादानी कर डाली थी। खांमख़ा बताना पड़ा कि मैं ज़ीरो मतलब शून्य लगाना क्यों भूल रहा था।

अब उस षोडशी की दिलचस्पी यह जानने में पैदा हो गई थी कि मैनें कित्ते पैसे देकर अमेरिका में नौकरी हासिल की थी। निम्न मध्यवर्ग जिसे अमेरिका में स्किल्ड लेबर्स कहते हैं, अपने खेत खलिहान बेचकर भी खाड़ी या लंदन में काम पाने की फिराक में रहता है। यह चलन वैसे पंजाब में कुछ ज़्यादा है। डाटकाम के बुलबुले अभी दिल्ली, बंबई से कानपुर सरीखे शहरो तक नही पहुंचे थे इसलिए किसी भी कनपुरिए को किसी ऐसे एनआरआई कनपुरिया जो अभी भी कानपुर में एलएमएल वेस्पा पर घूम रहा हो देख कर ताज्जुब करना स्वाभाविक ही है।

Contd..

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