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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 5

May 15, 2013

 कार लाइसेंस कथा 

 

दो हफ़्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गए। नवीन भाई ने सप्ताहांत पर ड्राइविंग पर हाथ साफ़ करने के लिए रेंटल कार ले ली। हांलांकि नवीन भाई को ड्राइविंग लाइसेंस हममें से सबसे पहले मिला पर धीरे से लगने वाले ज़ोर के एक झटके के बाद। हम सब ड्राइविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गए। यहां आपके साथ एक पुलिस अफ़सर कार में बैठ कर कुछ मानकों के आधार पर ड्राइविंग टेस्ट लेता है। इसमें दो करतब ख़ासतौर से उल्लेखनीय हैं। रोमांचक पैरेलेल पार्किंग और वीविंग यानि की आठ दस प्लास्टिक के खंभों के बीच से शाहरुख़ ख़ान की तरह कार निकालना।


नवीन भाई को अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर न्यू जर्सी जाना था। अतः उनके ख़यालों में न्यू जर्सी छाया हुआ था। नवीन भैया ने देसी बुद्धि दौड़ाई और बाकी लोगों को एक कोने में खड़े होकर, टेस्ट देते देखकर टेस्ट के सारे हिस्से कंठस्थ कर डाले। उनकी बारी आने पर पुलिस अफ़सर कार में नवीन भाई के साथ बैठा और उनका टेस्ट लेने लगा। सबकुछ ठीक चल रहा था। नवीन भाई के हिसाब से अगला स्टेप तेज़ चला कर ब्रेक लगाने का प्रदर्शन था, पर पुलिस अफ़सर ने खालिस अमेरिकी आवाज़ में कार को पहले वीविंग कराने के लिए कह दिया। नवीन भाई अपनी धुन में सीधे जाने लगे तो पुलिस अफ़सर ने टोंक कर पूछा, "सर वेहर आर यू गोइंग?" नवीन भाई इस अप्रत्याशित प्रश्न से मानो चिरनिद्रा से जागे पर वे अभी पूर्ण सुप्तावस्था से अर्धचेतना में ही आ पाए थे। उन्हें यह कौतूहल था कि इस पुलिस अफ़सर को मेरे अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर जाने के बारे में कैसे पता चल गया। कहीं यह प्रिमस सॉफ्टवेअर वालों को तो नहीं जानता, जहां वह काम करते हैं। एक बारग़ी उन्हें लगा कि प्रिमस सॉफ्टवेअर वालों ने इस पुलिस वाले को सेट तो नहीं कर रखा, हांलांकि ऐसा होता तो नहीं अमरीका में। वह बोल पड़े, "आइ एम गोइंग टु न्यू जर्सी।" पुलिस अफ़सर जो उन्हें चेताने की कोशिश कर रहा था उसे ऐसे बेहूदा जवाब की उम्मीद नहीं थी। उसने उन्हें टेस्ट स्थल से बाहर जाने का आदेश थमा दिया और नवीन भाई मानो आसमान से गिरे।

बाहर निकलते ही पहले तो आधे घंटे तक रेंटल कार पर मुक्के ठोंकते रहे फिर बोले, "गुरू क्या ये लोग सौ पचास की पत्ती मेज़ के नीचे से लेकर लाइसेंस नहीं दे सकते।" हांलांकि एक ही सप्ताह में वे दुबारा ड्राइविंग टेस्ट देकर लाइसेंस झटक लाए। उस सप्ताहांत पर वे हम सबको एक रेंटलकार से सैर पर भी ले गए। सैर के दौरान एक सीधी–सादी दिखती सड़क ने नवीन भाई को धोखे से फ्री वे में पहुंचा दिया। अगर सोलंकी जी न संभालते तो नौसिखिया नवीन भाई फ्री वे देख कर इतना आतंकित हो गए थे कि कार में हम सबको छोड़ कर पैदल भागने वाले थे। फ्री वे वह बला है जिससे हर नया ड्राइवर घबराता है। दो से छे लेन का हाइवे जिसमें हर कोई साठ से अस्सी मील प्रतिघंटा की स्पीड से कार भगाता है। फ्री वे के उस्ताद को प्रवेश, हाईस्पीड मर्ज, लेन चेंज करना, एग्ज़िट लेना आदि सभी कलाओं में पारंगत होना आवश्यक है। एक भी कला में कम निपुणता आपकी कार की बलि ले सकती है। अब इन कलाओं में निपुणता के लिए हर नया अर्जुन, एक अदद द्रोणाचार्य की तलाश करता है। मैं अर्जुन भी बना और समय के साथ द्रोणाचार्य भी।

 

मेरी पहली टोयटा करोला


प्रोजेक्ट मिलने के बाद ड्राइविंग लाइसेंस झटकना एक सूत्रीय कार्यक्रम बन गया था। पहले लिखित परीक्षा देकर लर्नर परमिट मिला कुछ ड्राइविंग लेसंस भी लिए। सत्यनारायण जी के दर्दनाक अनुभवों से विश्वास हो चुका था कि ड्राइविंग लाइसेंस पाना टेढ़ी खीर है। बेचारे चार बार बैरंग वापस लौट चुके थे। हर बार कुछ न कुछ ग़लती कर बैठते थे। मेरा और उनका ड्राइविंग गुरू एक ही गोरा था। पांचवीं बार हद हो गई सत्यनारायण जी ड्राइविंग टेस्ट के सारे स्टेप ठीक कर चुके थे पैरेलल पार्क करते हुए ब्रेक की जगह हड़बड़ी में एक्सेलेटर दबा दिया और सेंटर में लगा एक खंभा ही ज़मींदोज़ कर डाला। मुझे अगले दिन मेरी ड्राइव्ािंंग प्रैक्टिस के दौरान उस गोरे ने बताया कि सत्यनारायण जी हताशा में अपना माथा ठोंक रहे थे। उन्हें फेल करने वाला महाखड़ूस ड्राइविंग परीक्षक भी उनपर तरस खाकर दिलासा दे रहा था। फिर भी जब सत्य नारायण जी का मस्तक ठोकना बंद नहीं हुआ तो उस गोरे ने झल्लाकर अपनी कार के ट्रंक के टूलबॉक्स से एक हथौड़ा निकालकर थमा दिया सर को ठोकने को। सत्यनारायण जी भारत वापस जाने को आमादा हो गए। रात भर उनका प्रलाप चलता रहा कि वहां कभी लाइसेंस नहीं मिलने वाला। हिंदुस्तान होता तो अबतक ट्रैफ़िक एग्ज़ामिनर की हज़ार पांच सौ से हथेली गरम कर के मिल गया होता। अब कब तक पैदल चलूं कहीं किसी दिन किसी कार या ट्रक के नीचे आ जाऊंगा। उन्होंने हिंदुस्तान पलायन की ठान ली थी। मैंने अगले दिन अपने कंपनी डायरेक्टरों को उनके घायल जज़्बातों के बारे में बताया। वे बिचारे दोनों अपने सारे काम छोड़कर भागे। सत्यनारायण जी की दोनो ने करीब–करीब सायकोलाजिकल काउंसलिंग कर डाली।


अगले दिन मेरा ड्राइविंग टेस्ट था। टेस्ट एक गोरी एग्ज़ामिनर ले रही थी जब उसने मुझसे वीविंग करने के लिए बोला तो मैंने उससे पूछा, "विच स्टाइल, लेफ्ट बिफोर, सेंटर लेफ्ट, सेंटर राइट और राइट आफ्टर?" वीविंग के इतने सारे प्रकार सुनकर एग्ज़ामिनर समझ गई कि पाला गोरे ट्रेनर के चालू शागिर्द से पड़ा है। मैं ड्राइविंग लाइसेंस पाने में कामयाब हो गया। इतना सुखद अहसास कि मानो लंका जीत ली। एक महीने बाद ऑफ़िस में एक सहकर्मी से एक अदद पुरानी टोयोटा करोला आननफ़ानन में ख़रीद डाली। मैं शाम को सोच रहा था अगर यह कार कानपुर में ख़रीदी होती तो पहले जानकारी के लिए न जाने किस–किस की चिरौरी की जाती। कार सपरिवार मंदिर को जाती। मिष्ठान्न वितरण होता। यहां तो बस पैसे दिए और कार दरवाज़े पर। कोई बधाई देने वाला नहीं।

 

कोरोला की शहादत


करीब छः सात महीने बाद जब कार, अपार्टमेंट इत्यादि का इंतज़ाम हो गया तो अपने परिवार दादा, प्रीति व चारु को कानपुर से बुला लिया। चार महीने रहने के बाद दादा वापस कानपुर चले गए। उनको अटलांटा एअरपोर्ट से विदा कर वापस आ रहा था। प्रीती मेरी धर्मपत्नी व चारु कार की पिछली सीट पर बैठे थे। पेरीमीटर फ्रीवे की सबसे दाईं लेन से चार लेन बाईं तरफ़ चेंज की। तभी देखा कुछ दूर एक कार मेरी लेन में खड़ी है। सारी लेन का ट्रैफिक भाग रहा है और यह कार बीचोबीच खड़ी थी। पूरी ताकत से ब्रेक लगाए। मेरी कार रुकते–रुकते आगे वाली कार से हौले से जा लड़ी। तभी दो ज़बरदस्त झटके लगे। पीछे की खिड़की का कांच टूटकर हम सब पर आ गिरा। परमात्मा की कृपा से किसी को चोट नहीं लगी। बाहर निकल कर देखा, मेरी कार के आगे व पीछे दो–दो कार और दुर्घटना में शामिल थीं।


तेज़ रफ़्तार टै्रफिक के साथ यही मुश्किल है। अगर एक कार किसी वजह से रुक गई तो पीछे की कईं कारें मरखनी भेड़ों की तरह बिना आगा पीछा सोचे एक दूसरे के पीछे पिल पड़ेंगी। कार का ट्रंक पिचक गया था। पुलिस व एंबुलेंस वाले दो मिनट में आ गए। कोई घायल नहीं था इसलिए सारी कार्यवाही आधे घंटे में निपट गई। यह विदेश में दुर्घटना का पहला अनुभव था। इंश्योरंस कंपनी ने कार को शहीद अमेरिकी भाषा में टोटल घोषित करार देकर कार की पूरी कीमत के बराबर क्षतिपूर्ति कर दी। यहां कल्लू मिस्त्री छाप मरम्मत बहुत महंगी पड़ती है। शायद इसीलिए यूस एंड थ्रो का चलन है। शुरू में भारत में किसी को दुर्घटना के बारे में नहीं बताया, सब नाहक परेशान होते। पर एक दिन चारू पटाखा अपने दादा जी से फ़ोन पर बोल पड़ी कि दादा मैं बच गई। अब यह रहस्योद्घाटन ज़रूरी था कि चारू किस चीज़ से बची।


दो दिन बाद नयी कोरोला ली। इस बार मोलभाव के लिए पीजी भाई साथ थे। ठोंकबजा कर कार दिला दी। ज्ञानी मित्रों ने कदम–कदम पर मार्गदर्शन किया वर्ना वही होता जो अब छः साल बाद मेरे मित्र के साथ हुआ। हम दोनों साथ कही जा रहे थे, ड्राइविंग सीट पर बैठे मेरे मित्र बता रहे थे कि उन्होंने इंश्योरंस से कोलीजन डेमेज वेव कर दिया किसी की ग़लत सलाह के चलते। तभी उनका ज़बरदस्त कोलीजन दूसरी कार से हुआ और हमारी कार के सेफ्टी बैग तक बाहर आ गए। हम दोनों तो बच गए पर कार शहीद हो गई। आज जब यह कहानी लिखने बैठा तो छः साल पहले के सत्यनारायणस्वामी याद आते हैं। सुरक्षा से कभी समझौता न करने के उनके दृष्टिकोण के चलते उन्होंने न सिर्फ़ खुद, बल्कि मुझे भी महंगा इंश्योरंस दिला दिया था। हालांकि बहुत से लोग पैसे को दांतों से पकड़ कर चलने की आदत के चलते इंश्योरंस में कटौती कर देते हैं और बाद में खामियाज़ा भुगतते हैं।

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