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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 6

May 16, 2013

अथ धर्म - कर्म कथा ...

 

 

 

      मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राइविंग के द्रोणाचार्य बन गए। एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ। अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। मंदिर में गणेश, शिव, हनुमान, मुरुगन, भूदेवी, तिरूपति बालाजी, सब की प्रतिमा एक साथ एक हॉल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ।


मैंने अनुपम जी से, जो हिंदू स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे, से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद–क्षेत्रवाद की समस्या यहां नहीं आई। क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता एक साथ सुशोभित हैं। अनुपम भाई ने एक ही क्षण में मुझे यथार्थ के धरातल पर ला पटका। वे बोले मान्यवर ये विशुद्ध अर्थशास्त्र है राष्ट्रप्रेम जैसा कुछ नहीं है। भाई जब मंदिर बना तो हैदराबादी बिना बालाजी की मूर्ती लगे चंदा नहीं दे रहे थे, वहीं तामिलनाडु और कर्नाटक वालों को लगता है कि उन्हें सिर्फ़ मुरुगन, भूदेवी या लक्ष्मी का आशीर्वाद ही फलीभूत होगा और बचे उत्तर भारतीय तो वे अपनी टेंट तभी ढीली करेंगे जब यहां हिंदी में की गई प्रार्थना स्वीकारने वाले हनुमान जी विराजें। वह तो अटलांटा में काफ़ी देशी भारतीय हैं वरना चंदा पूरा करने के लिए गुरू ग्रंथ साहिब और भगवान बुद्ध को भी मंदिर का हॉल शेयर करना पड़ता।


बाद में पता चला कि अटलांटा में जिमखाना क्रिकेट क्लब, तमिल समाज, पंजाबी बिरादरी, जैन सम्मेलन, बंगाली असोसिएशन, सिंधी सभा आदि–आदि सारे मंच अपने–अपने एजेंडे के साथ विद्यमान है। मैं सोच रहा था कि हम भारत से अपनी संस्कृति ही साथ नहीं लाते, अपना भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद वगैरह की दीवारें भी साथ ले आते हैं। यह सब हमारी मानसिक बेड़ियां हैं जिनसे हमें छुटकारा मिल ही नहीं सकता। वैसे जहां एक ओर भाषावाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद की बेड़ियां दिखीं, वहीं एक सुखद अहसास भी हुआ। अमेरिका में भगवान भी एनआरआई नफ़ासत के साथ रहते हैं। एयरकंडीशंड मंदिर, स्वच्छ वातावरण, अनुशासित भक्त। ताज्जुब है कि दीवार पर दिशा निर्देशों का पूरी सजगता से पालन होता है। न कोई फोटोग्राफ़ी कर रहा है, न कोई शिवलिंग पर मत्था रगड़ कर उसे चमका रहा है न ही प्रसाद के लिए मारामारी। सिर्फ़ एक कमी खलती है, नये मंदिरों की बात छोड़ दें तो ज़्यादातर पुराने मंदिर डाऊनटाउन में बने हैं, अति सीमित पार्किंग के साथ। मंदिर व्यवस्थापक शुरू में जहां आकर बसे वहीं मंदिर ठोंक दिया। भविष्य में भक्त संख्यावृद्धि का ख्याल उनके जहन में कभी नहीं आया। अब चाहें शहर कितना बढ़ जाए पर कई मंदिर व्यवस्थापक सुविधाविस्तार के मामले में भारतीय रेल मंत्रालय की तरह सोचते हैं। जहां जी चाहे स्टेशन बना दो, पब्लिक को सत्तर बार गरज है तो आएगी ही।

पीजी भाई


जिं.दगी में कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं जो बिन मांगे हमेशा सबकी मदद को तत्पर रहते हैं। हमारे पीजी भाई ऐसे ही जिं.दादिल शख्स हैं। मैं पहली मुलाकात में उनका कायल हो गया था। न जाने कैसे उन्होंने मेरे मुंह से सिर्फ़ एक वाक्य सुन कर ताड़ लिया कि मैं कानपुर से हूं। अमेरिका में रहने लायक जुझारुपन पीजी भाई की शागिर्दी में सीखा है। 15 अगस्त को मजेदार वाक्या हुआ। सिविक सेंटर पर 15 अगस्त का मेला लगा था। खाने पीने से लेकर हर तरह की धार्मिक–सामाजिक धंधेबाजी के स्टाल लगे थे। कुछ देशप्रेमी कारगिल में पाकिस्तानी ज़्यादतियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए थे। मैं और पीजी भाई कुछ अतिउत्साहियों की ज़बानी पतंगबाजी का मज़ा ले रहे थे। पाकिस्तानी पर ज़बानी गोलीबारी में कोई सूरमाभोपाली पीछे नहीं रहना चाह रहा था। ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में पीजी भाई को मसखरी सूझी। वे बोले यदि आप सब साथ दें तो हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। सभी को लगा कि पीजी के दिमाग़ में कोफी अन्नान या बिल क्लिंटन को चिठ्ठी लिख मारने सरीखा कोई धांसू आइडिया खदबदा रहा होगा। सारे भारत मां के सपूत समवेत स्वर में बोले, पीजी भाई आप बस हुक्म करो हम सबका तो खून खौल रहा है। पीजी भाई बोले तो निकालो सब दस–बीस डालर। इस अप्रत्याशित पहल पर सबका 'क्यों' कहना प्रत्याशित था। पीजी भाई ने प्रस्ताव रखा कि जब पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित कर सकता है तो हम क्यों नहीं। रकम खर्च कर के क्या हम भी किसी बंबई दुबई के पप्पू पेजर, मुन्ना भाई या मदन ढोलकिया को कराची या लाहौर में एकाध बम फोड़ने की सुपारी नहीं दे सकते। अगर आप हज़ार डालर भी इकठ्ठा कर लो तो मैं सुपारी का इंतज़ाम करता हूं। मैंने देखा कि भारत मां के सारे सपूत जिनका कुछ देर पहले खून खौल रहा था अपने–अपने दस डालर लेकर छोले भटूरे का स्टॉल तलाशने में लग गए। पीजी भाई का फ़लसफ़ा कुछ अलग ही है। उन्होंने न्यूयार्क के भिख़ारियों की बदहाली की वीडियो फ़िल्म बना रखी है, जिसे वह हिंदुस्तान में अमेरिका–पूजकों को ख़ासकर दिखाते हैं।

 

हिंदू स्वयंसेवक संघ


यह भारत वाले आरएसएस का अंतर्राष्ट्रीय संस्करण है। शुरू के महीनों में सप्ताहांत पर करने को कुछ विशेष न होने के कारण शाखा में भी भाग लिया। इसकी गतिविधियों में भाग लेकर पता चला कि हिंदू स्वयंसेवक संघ की उपयोगिता कितनी है और साथ ही लोगों, खासकर बुद्धिजीवियों के इससे बिदकने के कारण है। स्वयंसेवक संघ का अमेरिकी संस्करण एचएसएस क्रीमी लेयर समाज से आने वाले लोगों की वजह से कुछ 'हटके' है। इसके पुराने सदस्य पहली बार अमेरिका आने वालों की यथासंभव मदद करते हैं, किसी भी सामाजिक कर्तव्य को निबाहने में, चाहे गुजरात का भूकंप राहत कोष एकत्र करना हो या कारगिल युद्ध में पाकिस्तान विरोध मार्च, आगे रहते हैं। सबसे अच्छा प्रयास तो बालगोकुलम का है। छोटे बच्चों के लिए भारतीय संस्कृति एवं महाकाव्यों पर आधारित लघुकथा, नाटक, मातृभाषा सिखाने हेतु सप्ताहांत पर कक्षाओं का आयोजन होता है। अभिभावक ही सामूहिक रूप से कक्षा संचालन की ज़िम्मेदारी लेते हैं। संघ की भूमिका पाठ्य सामग्री एवं आवश्यक प्रशिक्षण तक सीमित रहती है। भारत के बाकी हिस्सों का तो पता नहीं पर अपने उत्तर प्रदेश में लफंगातत्व धर्म का तथाकथित ठेकेदार बनकर ऐसे संघटन में स्वार्थवश घुस जाता है और बुद्धिजीवी ऐसे तत्वों की वजह से बिदकते हैं।

 

दिव्यराज जी और उनका गृह प्रवेश समारोह


दिव्यराज सिंह जी अटलांटा में संघ के सक्रिय कार्यकर्ता है। एक दिन मणिका जी दिव्यराज सिंह की धर्मपत्नी ने सकुचाते हुए अनुरोध किया कि मैं उनके पुराने घर से नये घर में सामान पहुंचाने में सहयोग कर दूं। दिव्यराज जी कुछ संकोची स्वभाव के हैं। उनके संकोच का एक अन्य कारण भी था। एक अति उत्साही स्वयंसेवक एक दिन पहले उनके घर से पुराना सामान फिंकवाते समय उनके खालिस नये महंगे जूते का डिब्बा कचरा समझ कर फेंकने की नादानी कर चुका था। दिव्यराज सिंह जी अब किसी नौसीखिए स्वयंसेवक से सेवा लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मैंने उनका संकोच मैं कुली नं .वन हूं कह कर दूर कर दिया।


अगले दिन पूरे विधि विधान से एक पंडित जी ने नये घर में हवन संस्कार कराया। बाद में पीजी भाई आदतन पंडित जी से शास्त्रार्थ में उलझ गए। यह संवेदनशील मुद्दा था मदिरापान के तथाकथित रूप से धर्मविरूद्ध होने का। पीजी भाई का तर्क जायज़ था, आख़िर जब देवताओं द्वारा खुद सुरापान कर सकते हैं तो भक्तों के शौक पर शास्त्रों के बहाने क्यों अड़ंगा लगा रखा है। पीजी भाई पूरी तरह से हावी थे जबकि पंडित जी पतली गली से भागने का मार्ग तलाश रहे थे ताकि अगले यजमान के यहां विलंब न हो।


पंडित जी सवेरे–सवेरे एक और हादसे से दो चार हो चुके थे। दिव्यराज जी के घर का पता था 7125 ब्रुकवुड रिवर। बुकप्लेस कम्युनिटी, ब्रुकवुड रिवर नाम की कम्युनिटी से कुछ ही पहले था। पंडित जी सवेरे पांच बजे गफ़लत में 7125 ब्रुकप्लेस में जा धमके और चार पांच बार दरवाज़े की घंटी दे मारी। मकान मालिक कोई गोरा अमेरिकन था। बेचारे ने उनींदी आंखों से दरवाज़ा खोला। पंडित जी दरवाज़ा खुलते ही बोले "व्हेअर इज़ देवराज"।

गोरे अमेरिकन जिसकी अभी ठीक से नींद भी नहीं खुली थी उसके लिए गेरुआ वस्त्रधारी एवं पूर्ण मस्तक चंदन तिलकधारी, अजीब सा नाम पूछते पंडित जी किसी मंगल ग्रह के निवासी से कम साबित नहीं हुए। गोरा अमेरिकन पंडित जी को हेलोवीन कास्टयूमधारी समझ रहा था। हेलोवीन नवंबर के महीने में मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें बच्चे भूत प्रेत या अन्य विचित्र किस्म के कपड़े पहनकर टोली बनाकर घर–घर टाफियां मांगने निकलते हैं। वह गोरा पलटा और कुड़कुड़ाते हुए पंडित जी को एक मुठ्ठी टॉफी टिकाने लगा। जबकि पंडित जी जो यह समझ रहे थे कि दिव्यराज जी ने शायद यह घर जिस किसी से ख़रीदा है वह पुराना मकान मालिक अभी भी वहां डंटा है। पांच मिनट बाद पंडित जी को पता चला कि वे ग़लत घर में आ गए हैं और 7125 ब्रुकवुड रिवर में उनका इंतज़ार करते हुए देशी जनता सूख कर कांटा हो रही है।

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