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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 8

May 18, 2013

 

तबादला डलास के लिए  

 

एक दिन सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी। सीधी साधी भाषा में मतलब यह था कि उन्हें अब मेरी ज़रूरत नहीं थी। और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया। जैसा कि पहले भी बता चुका हूं कि तेज़ी से बदलती तकनीक वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दो चार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है। इन सबके साथ जुड़ी है स्थानांतर की चिर समस्या। यानि कि नए प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान और कार का स्थानांतरण फिर घर का पता, टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नए स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद। ख़ैर बेंच पर आने का पहला सोमवार था। मार्च की गुनगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं नया कुछ तकनीकी मसला पढ़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी। यह मामू का फोन था। मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगरामों ने बिचौलियों के लिए ईजाद कर रखा है। पता चला कि दो घंटे में कोई जनाब इंटरव्यू के लिए फोन करेंगे। फोन आया और सिर्फ यह पूछने के बाद कि मैने कौन–कौन सी विधाओं में काम कर रखा है डलास निवासी साक्षात्कार कर्ता ने निमंत्रण भेज दिया कि भाई आ जाओ डलास में बसने।

 

 

 

दीवानी दुनिया डलास की 

 

अटलांटा से डलास कार यात्रा की ठानी थी। 800 मील यानि लगभग 1300 किलोमीटर का यह रास्ता एकदम सीधा एक हाइवे अटलांटा से शुरू होकर डलास पहुंचता है। हिन्दुस्तान में मात्र दो दिन में 105–130 किलो मीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से 1300 किलोमीटर सफर तय करने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोचा था। थोड़ी थोड़ी दूर पर रेस्टोरेन्ट, विश्रामगृह, पेट्रोल पंप वगैरह होने और उत्तम कोटि की सड़क ने सफ़र को कष्ट रहित बना दिया। जार्जिया से एलाबामा, मिसौरी एवं लुसियाना होते हुए टेक्सास में दाखिल हुए। पूरा रास्ता दो गलियों का था। सफर मस्ती से कटता रहा। टेक्सास में दाख़िल होते ही प्रांत के स्वागत– पट ने टेक्सास के अक्खड़पन से रूबरू कराया। जहां सारे प्रांत के स्वागत 'वेलकम टु स्टेट' से शुरू होते हैं वहीं टक्सास की बानगी देखिए— 'डू नॉट मेस विद टेक्सास'। जहां तक नज़र जा सकती थी, खेत दिखते थे। कहीं कहीं काउबॉय चरवाहे बाल गोपाल घोड़े पर सवार गाय भैंसों को इकठ्ठा कर रहे थे।


अमरीका के सर्वाधिक क्षेत्र में बसा टेक्सास प्रांत में जहां तक नज़र जा सकती है सपाट ज़मीन दिखती है। मैं हाईवे पर बने स्वागत कक्ष में रुका। सड़क मार्ग के आगंतुकों के लिए सभी प्रांतों में स्वागत केंद्र बने हैं— मुफ्त नक्शे, होटल व रेस्टोरेंट की तालिका, पर्यटन स्थलों की सचित्र जानकारी और सहायता के लिए कुछ कर्मचारी। स्वागत केंद्र के कर्मचारियों ने मुझे डलास तक का रास्ता समझा दिया। कुछ ही घंटों के बाद अपनी मंज़िल डलास डाउन टाउन की खूबसूरत 'स्काईलाइन' दूर से दिखने लगा। अमरीका में गगन चुंबी इमारतों का झुंड 'स्काईलाइन' के नाम से जाना जाता है। और इस शहर की समृद्धि का परिचायक है। हांलांकि हम इसे कंकरीट के जंगल नाम से भी जानते हैं। फिर छे लेन वाले हाई वे से सामना हुआ और कुछ ही देर में मैं अपने होटल में था। स्वागत कर्मचारी ने बताया कोई रवि आपके बगल वाले कमरे में इंतज़ार कर रहे हैं। मैं सोच रहा था, डलास में मैं भला किस रवि को जानता हूं। कमरा खुलवाने पर दार जी रविंदर भाई निकले। दार जी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली से आकाशवाणी को तलाक देकर आए थे।

पंजाब दा पुत्तर


होटल में एकाध घंटे बाद याद आया कि पीजी भाई ने किसी बृज का फोन नंबर दिया था। फोन पर बात करने के आधा घंटे बाद बृजमोहन जी रात्रिभोज के निमंत्रण के साथ हाज़िर थे। ऐसी ज़िंदादिली कम ही भारतीयों में देखने को मिलती है। बृजभाई के साथ डलास में रंग जम गया या फिर उन्हीं की भाषा में नज़ारा आ गया। बृज और दार जी दोनों तंदूरी चिकन के शौकीन थे और होटल में गुलाबी चिकन के साथ दोनों की मीठी पंजाबी बातें, जो ईमानदारी से मेरे 50 प्रतिशत ही पल्ले पड़ती थीं, कानों को बड़ी भाती थीं।


बृज के पास माजदा कार थी दमदार इंजन वाली। माजदा के डैशबोर्ड पर उसने शंकर जी की मूर्ति स्थापित कर रखी थी। बृज भाई ड्राइवर तो उम्दा किस्म के थे पर जब कभी तरन्नुम में गाड़ी चलाते तो ख़ता कर बैठते। अमेरिकी सड़कों पर गल्ती अक्सर महंगी ही पड़ती है। बृज भाई जब भी किसी ऐसी स्थिति से दोचार होने से बचते तो तुरंत शंकर जी के चरण स्पर्श कर के कहते आज तो परम पिता परमात्मा ने बचा लिया। शंकर जी भी सोचते होंगे कि भक्त ने एक तो गाड़ी में उल्टा मुंह कर के बैठाला है, अक्सर तेज़ कार चलाता है और हर ऊलजलूल गल्ती से बचाने का ठेका भी मुझे ही दे रखा है।


एक बार तो शंकर जी ने बहुत बचाया वर्ना हम दोनों को बड़े बेभाव की पड़ती। मैं और बृज एक साथ उसकी कार में जा रहे थे। बृज भाई मस्त मूड में थे बोले कि महाराज मुझे यहां रहते तीन साल हो गए अब तो रास्ते इतने याद हो गए हैं कि आंख मूंद कर भी मंजिल तक पहुंच सकता हूं। यह कहते हुए बृज भाई एक लेन में मुड़े। हम दोनो यह देख कर भौचक्के रह गए कि एक कार तेज़ी से हमारी ही लेन में आ रही है। बृजभाई ने हार्न मारा तो वह चालक उल्टे चोर की तरह हम कोतवालों को डांटते यानि कि हार्न मारते हुए चला गया। पर यह क्या अब तो दोनों लेन में कारें अपनी ही दिशा में आरहीं थीं।

बृज भाई बोले महाराज आज क्या पूरे शहर ने पी रखी है? अब तक मुझे माजरा समझ में आ गया था। ग़फ़लत में हम एक एग्ज़िट रैप में उल्टी दिशा से जा घुसे थे। अब हम दोनों को काटो तो खून नहीं कि गाड़ी को यू टर्न कैसे लगाएं। जब दोनों ही लेन में गाड़िया अपनी तरफ़ मरखने बैल के मानिंद दौड़ती हुई आ रही हैं। मेने बृजभाई से हार्न बजाते रहने को कहा, ताकि दूसरी दिशा वाले सावधान रहें कि हम ग़लत दिशा में हैं। तभी एक पुलिस कार हमारी लेन में आई। हमारी कुछ जान में जान आई। पुलिस वाले ने आकर पहला सवाल् किया हम ग़लत दिशा में कैसे आ गए। बृजभाई ने मासूमियत से जवाब दिया कि हम इस इलाके में नए हैं। रास्ता भूलकर ग़लत लेन में आ गए। अब यू टर्न लगाना मुश्किल लग रहा है। पुलिस वाले ने लाइसेंस वगैरह की जांच पड़ताल के बाद एक और पुलिस वाले की मदद से दोनों लेन बंद कर हमारी कार को यू टर्न में मदद दी। और साथ ही भविष्य में सजग रहने की ताकीद भी की। पुलिस वाले ने हमारी और दूसरी कारों के हार्न की जवाबी कव्वाली सुनकर और हमारी कार दूर से ग़लत दिशा में खड़ी देख कर समझा कि कोई शराबी ग़लत लेन में जा घुसा है। इसलिए वह मसला हल करने आ गया था। पर यहां मामला अपने ही शहर में नए होने का था।

 Contd..

 

 

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