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Kanpur Enjoyed in 1930..

September 7, 2013

कानपुर से कराची का सफ़रनामा -1

इस वेबसाइट पर आप एक कनपुरिए कँप्यूटर इंजीनियर के अमेरिका जा बसने के किस्से पढ़ चुके हैं ।अब पेश है एक  खानदानी  मुस्लिम कनपुरिए के विभाजन से पहले कानपुर के किस्से और उसके बाद पाकिस्तान में कराची के किस्से । लेखक हैं  मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी .

 

 बात हमारे अलबेले दोस्त बिशारत अली फारूकी के ससुर की है, इसलिए परिचय भी उन्हीं की जबान से ठीक रहेगा। हमने तो बहुत बार सुना, आप भी सुनिए :

वो हमेशा से मेरे कुछ न कुछ लगते थे। जिस जमाने में मेरे ससुर नहीं बने थे तो फूफा हुआ करते थे और फूफा बनने से पहले मैं उन्हें चचा हुजूर कहा करता था। इससे पहले भी वो मेरे कुछ और जुरूर लगते होंगे, मगर उस वक्त मैंने बोलना शुरू नहीं किया था। हमारे यहां मुरादाबाद और कानपुर में रिश्ते-नाते उबली हुई सिवइयों की तरह उलझे और पेच-दर-पेच गुंथे हुए होते हैं।

ऐसा रौद्ररूप, इतने गुस्से वाला आदमी जिंदगी में नहीं देखा। उनकी मृत्यु हुई तो मेरी उम्र, आधी इधर-आधी उधर, चालीस के लगभग तो होगी, लेकिन साहब! जैसा आतंकित मैं उनकी आंखें देख कर छुटपन में होता था, वैसा ही न सिर्फ उनके आखिरी दम तक रहा, बल्कि अपने आखिरी दम तक भी रहूंगा। बड़ी-बड़ी आंखें अपने साकेट से निकली पड़ती थीं -लाल, सुर्ख, ऐसी-वैसी? बिल्कुल कबूतर का खून। लगता था, बड़ी-बड़ी पुतलियों के गिर्द लाल डोरों से अभी खून के फव्वारे छूटने लगेंगे और मेरा मुंह खूनम-खून हो जायेगा। हर वक्त गुस्से में भरे रहते थे। जाने क्यों गाली उनका तकिया-कलाम थी और जो रंग बोलचाल का था, वही लिखायी का भी।

जाहिर है, कुछ ऐसे लोगों से भी पाला पड़ता था जिन्हें किसी कारण से गाली नहीं दे सकते थे। ऐसे अवसरों पर जबान से तो कुछ न कहते, लेकिन चेहरे पर ऐसा एक्सप्रेशन लाते कि सर से पांव तक गाली नजर आते। किसकी शामत आई थी कि उनकी किसी भी राय से असहमति व्यक्त करता। असहमति तो दर-किनार, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ डर के मारे उनसे सहमत होता तो, अपनी राय बदल कर उल्टा उसके सर हो जाते।

अरे साहब! बातचीत तो बाद की बात है, कभी-कभी सिर्फ सलाम से भड़क उठते थे! आप कुछ भी कहें; कैसी ही सच्ची और सामने की बात कहें, वो उसका खंडन जरूर करेंगे। किसी से सहमत होने में अपनी हेठी समझते थे। उनका हर वाक्य 'नहीं' से शुरू होता था। एक दिन कानपुर में कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। मेरे मुंह से निकल गया कि आज बड़ी सर्दी है। बोले 'नहीं, कल इससे जियादा पड़ेगी।'

वो चचा से फूफा बने और फूफा से ससुर, लेकिन मेरी आखिरी वक्त तक निगाह उठा कर बात करने की हिम्मत न हुई। निकाह के वक्त वो काजी के पहलू में थे, काजी ने मुझसे पूछा 'कुबूल है?' उनके सामने मुंह से 'हां' कहने का साहस न हुआ - अपनी ठोड़ी से दो ठोंगें-सी मार दीं, जिन्हें काजी और किबला ने रिश्ते के लिए नाकाफी समझा। किबला कड़क कर बोले, 'लौंडे! बोलता क्यों नहीं?' डांट से मैं नर्वस हो गया। अभी काजी का सवाल पूरा भी नहीं हुआ था कि मैंने 'जी हां! कुबूल है' कह दिया। आवाज एकदम इतने जोर से निकली कि मैं खुद चौंक पड़ा। काजी उछल कर सेहरे में घुस गया, सब लोग खिलखिला कर हंसने लगे। अब किबला इस पर भिन्ना रहे हैं कि इतने जोर की 'हां' से बेटी वालों की हेठी होती है। बस तमाम-उम्र उनका यही हाल रहा, तमाम-उम्र मैं रिश्तेदारी के दर्द और निकटता में घिरा रहा।

हालांकि इकलौती बेटी, बल्कि इकलौती औलाद थी और बीबी को शादी के बड़े अरमान थे, लेकिन किबला ने 'माइयों' के दिन ठीक उस वक्त, जब मेरा रंग निखारने के लिए उबटन मला जा रहा था, कहला भेजा कि दूल्हा मेरी मौजूदगी में अपना मुंह सेहरे से बाहर नहीं निकालेगा। दो सौ कदम पहले सवारी से उतर जायेगा और पैदल चलकर अक्दगाह (निकाह के स्थान) तक आयेगा। अक्दगाह उन्होंने इस तरह कहा जैसे अपने फ़ैज साहब (शाइर फ़ैज अहमद फ़ैज) कत्लगाह का जिक्र करते हैं और सच तो यह है कि उनका आतंक दिल में कुछ ऐसा बैठ गया था कि मुझे छपरखट भी फांसी-घाट लग रहा था। उन्होंने यह शर्त भी लगाई कि बराती पुलाव-जर्दा ठूंसने के बाद यह हरगिज नहीं कहेंगे कि गोश्त कम डाला और शकर ड्योढ़ी नहीं पड़ी। खूब समझ लो, मेरी हवेली के सामने बैंड-बाजा हरगिज नहीं बजेगा और तुम्हें रंडी नचवानी है तो अपने कोठे पर नचवाओ।

किसी जमाने में राजपूतों और अरबों में लड़की की पैदाइश अपशकुन और खुदा के क्रोध की निशानी समझी जाती थी। उनका आत्माभिमान यह कैसे गवारा कर सकता था कि उनके घर बरात चढ़े। दामाद के खौफ से वो लड़की को जिंदा गाड़ आते थे। किबला इस वहशियाना रस्म के खिलाफ थे। वो दामाद को जिंदा गाड़ देने के पक्ष में थे।

चेहरे, चाल और तेवर से शहर के कोतवाल लगते थे। कौन कह सकता था कि बांस मंडी में उनकी इमारती लकड़ी की एक मामूली-सी दुकान है। निकलता हुआ कद। चलते तो कद, सीना और आंखें, तीनों एक साथ निकाल कर चलते थे। अरे साहब क्या पूछते हैं, अव्वल तो उनके चेहरे की तरफ देखने की हिम्मत नहीं होती थी और कभी जी कड़ा करके देख भी लिया तो बस लाल-भभूका आंखें-ही-आंखें नजर आती थीं,

रंग गेहुँआ, जिसे आप उस गेहूं जैसा बताते हैं, जिसे खाते ही हजरत आदम एकदम जन्नत से निकाल दिये गये। जब देखो झल्लाते, तिनतिनाते रहते। मिजाज, जबान और हाथ, किसी पर काबू न था, हमेशा गुस्से से कांपते रहते। इसलिए ईंट, पत्थर, लाठी, गोली, गाली किसी का भी निशाना ठीक नहीं लगता था। गछी-गछी मूंछें, जिन्हें गाली देने से पहले और बाद में ताव देते। आखिरी जमाने में भौंहों को भी बल देने लगे, गठा हुआ कसरती बदन मलमल के कुर्ते से झलकता था। चुनी हुई आस्तीन और उससे भी महीन चुनी हुई दुपलिया टोपी। गर्मियों में खस का इत्र लगाते। कीकरी की सिलाई का चूड़ीदार पाजामा - चूड़ियां इतनी अधिक कि पाजामा नजर नहीं आता था। धोबी उसे अलगनी पर नहीं सुखाता था, अलग बांस पर दस्ताने की तरह चढ़ा देता था। आप रात को दो बजे भी दरवाजा खटखटा कर बुलायें तो चूड़ीदार में ही बाहर निकलेंगे।

वल्लाह! मैं तो यह कल्पना करने का भी साहस नहीं कर सकता कि दाई ने भी उन्हें चूड़ीदार के बगैर देखा होगा। भरी-भरी पिंडलियों पर खूब जंचता था, हाथ के बुने रेशमी नाड़े में चाबियों का गुच्छा छनछनाता रहता था। जो ताले बरसों पहले बेकार हो गये थे, उनकी चाबियां भी इसी गुच्छे में सुरक्षित थीं। हद यह कि उस ताले की भी चाबी थी, जो पांच साल पहले चोरी हो गया था। मुहल्ले में इस चोरी की बरसों चर्चा रही, इसलिए कि चोर सिर्फ ताला, पहरा देने वाला कुत्ता और वंशावली चुरा कर ले गया। कहते थे कि इतनी जलील चोरी सिर्फ कोई रिश्तेदार ही कर सकता है। आखिरी जमाने में यह इजारबंदी गुच्छा बहुत वज्नी हो गया था और मौका-बेमौका फिल्मी गीत के बाजूबंद की तरह खुल-खुल जाता। कभी भावातिरेक में झुककर किसी से हाथ मिलाते तो दूसरे हाथ से इजारबंद थामते। मई-जून में टेंप्रेचर बहुत हो जाता और मुंह पर लू के थप्पड़ से पड़ने लगते तो पाजामे से एयर कंडीशनिंग कर लेते। मतलब यह कि चूड़ियों को घुटनों-घुटनों पानी से भिगो कर, सर पर अंगोछा डाले तरबूज खाते। खस की टट्टी और ठंडा पानी कहां से लाते। इसके मुहताज भी न थे। कितनी ही गर्मी पड़े, दुकान बंद नहीं करते थे, कहते थे, मियां! यह तो बिजनेस है, पेट का धंधा है, जब चमड़े की झोपड़ी में आग लगी रही हो तो क्या गर्मी, क्या सर्दी लेकिन ऐसे में कोई शामत का मारा ग्राहक आ निकले तो बुरा-भला कहकर भगा देते थे। इसके बावजूद वो खिंचा-खिंचा दुबारा उन्हीं के पास आता था, इसलिए कि जैसी उम्दा लकड़ी वो बेचते थे, वैसी सारे कानपुर में कहीं नहीं मिलती थी। फर्माते थे, दागी लकड़ी बंदे ने आज तक नहीं बेची, लकड़ी और दागी! दाग तो दो-ही चीजों पर सजता है, दिल और जवानी।

शब्द के लच्छन और बाजारी पान

तंबाकू, किवाम, खरबूजे और कढ़े हुए कुर्ते लखनऊ से, हुक्का मुरादाबाद और ताले अलीगढ़ से मंगवाते थे। हलवा सोहन और डिप्टी नजीर अहमद वाले मुहावरे दिल्ली से। दांत गिरने के बाद सिर्फ मुहावरों पर गुजारा था।

गालियां अलबत्ता स्थानीय बल्कि खुद की गढ़ी हुई देते, जिनमें रवानी पायी जाती थी। सलीम शाही जूतियां और चुनरी आपके जयपुर से मंगवाते थे। साहब! आपका राजस्थान भी खूब था, क्या-क्या उपहार गिनवाये थे उस दिन आपने खांड, सांड, भांड और रांड। यह भी खूब रही कि मारवाड़ियों को जिस चीज पर भी प्यार आता है उसके नाम में ठ, ड और ड़, लगा देते हैं मगर यह बात आपने अजीब बतायी कि राजस्थान में रांड का मतलब खूबसूरत औरत होता है। मारवाड़ी भाषा में सचमुच की विधवा के लिए भी कोई शब्द है कि नहीं लेकिन यह भी ठीक है कि सौ-सवा-सौ साल पहले तक रंडी का मतलब सिर्फ औरत होता था, जबसे मर्दों की नीयतें खराब हुईं, इस शब्द के लच्छन भी बिगड़ गये।

साहब! राजस्थान के तीन तुहफों के तो हम भी कायल और घायल हैं। मीराबाई, मेंहदी हसन और रेशमा। हां! तो मैं कह यह रहा था कि बाहर निकलते तो हाथ में पान की डिबिया और बटुवा रहता। बाजार का पान हरगिज नहीं खाते थे। कहते थे बाजारी पान सिर्फ रंडवे, ताक-झांक करने वाले और बंबई वाले खाते हैं। साहब! यह रखरखाव और परहेज मैंने उन्हीं से सीखा। डिबिया चांदी की, नक्शीन (बेल-बूटे बने हुए) भारी, ठोस। इसमें जगह-जगह डेंट नजर आते थे जो इंसानी सरों से टकराने की वज्ह से पड़े थे। गुस्से में अक्सर पानों भरी डिबिया फेंक के मारते। बड़ी देर तक तो यह पता ही नहीं चलता था कि घायल होने वालों के सर और चेहरे से खून निकल रहा है या बिखरे पानों की लाली ने गलत जगह रंग जमाया है। बटुवे खास-तौर से आपके जन्म-स्थान, टोंक से मंगवाते थे। कहते थे कि वहां के पटवे ऐसे डोरे डालते हैं कि इक जरा घुंडी को झूठों हाथ लगा दो तो बटुआ आप-ही-आप जी-हुजूर लोगों की बांछों की तरह खिलता चला जाता है। गुटका भोपाल से आता था, लेकिन खुद नहीं खाते थे। कहते थे, मीठा पान, ठुमरी, गुटका और नावेल, ये सब नाबालिगों के व्यसन हैं। शायरी से कोई खास दिलचस्पी न थी। रदीफ-काफिये से आजाद शायरी से खास-तौर पर चिढ़ते थे। यूं उर्दू-फारसी के जितने भी शेर लकड़ी, आग, धुएं, हेकड़ी, लड़-मरने, नाकामी और झगड़े के बारे में हैं, सब याद कर रखे थे। स्थिति कभी काबू से बाहर हो जाती तो शायरी से उसका बचाव करते। आखिरी जमाने में एकांतप्रिय इंसानों से हो गये थे और सिर्फ दुश्मनों के जनाजे को कंधा देने के लिए बाहर निकलते थे। खुद को कासनी और बीबी को मोतिया रंग पसंद था। अचकन हमेशा मोतिया रंग के टसर की पहनी।

वाह क्या बात कोरे बर्तन की

बिशारत की जबानी परिचय खत्म हुआ। अब कुछ मेरी, कुछ उनकी जबानी सुनिए और रही-सही आम लोगों की जबान से, जिसे कोई नहीं पकड़ सकता। कानपुर में पहले बांसमंडी और फिर कोपरगंज में किबला की लकड़ी की दुकान थी। इसी को आप उनका रोटी-रोजी कमाने और लोगों को सताने का साधन कह सकते हैं। थोड़ी-बहुत जलाने की लकड़ी भी रखते थे मगर उसे लकड़ी नहीं कहते। उनकी दुकान को अगर कभी कोई टाल कह देता तो दो सेरी लेकर दौड़ते। जवानी में पंसेरी लेकर दौड़ते थे। तमाम उम्र पत्थर के बाट इस्तेमाल किये। फर्माते थे कि लोहे के फिरंगी बाट बेबरकत होते हैं। इन देसी बाटों को बाजुओं में भर-के, सीने से लगा-के उठाना पड़ता है। कभी किसी को यह साहस नहीं हुआ कि उनके पत्थर के बाटों को तुलवा कर देख ले। किसकी बुरी घड़ी आयी थी कि उनकी दी हुई रकम या लौटायी हुई रेजगारी को गिन कर देखे।

उस समय में, यानी इस सदी की तीसरी दहाई में इमारती लकड़ी की खपत बहुत कम थी। साल और चीड़ का रिवाज आम था। बहुत हुआ तो चौखट और दरवाजे शीशम के बनवा लिए। सागवान तो सिर्फ अमीरों और रईसों की डाइनिंग टेबल और गोरों के ताबूत में इस्तेमाल होती थी। फर्नीचर होता ही कहां था। भले घरों में फर्नीचर के नाम पर सिर्फ चारपाई होती थी। जहां तक हमें याद पड़ता है, उन दिनों कुर्सी सिर्फ दो अवसरों पर निकाली जाती थी। एक तो जब हकीम, वैद्य, होम्योपैथ, पीर, फकीर और सयानों से मायूस हो कर डाक्टर को घर बुलाया जाता था। उस पर बैठ कर वो जगह-जगह स्टेथेस्कोप लगा कर देखता कि मरीज और मौत के बीच जो खाई थी, उसे इन महानुभावों ने अपनी दवाओं और तावीज, गंडों से किस हद तक पाटा है। उस समय का दस्तूर था कि जिस घर में मुसम्मी या महीन लकड़ी की पिटारी में रुई में रखे हुए पांच अंगूर आयें या सोला-हैट पहने डाक्टर और उसके आगे-आगे हटो-बचो करता हुआ तीमारदार उसका चमड़े का बैग उठाये आये तो पड़ोस वाले जल्दी-जल्दी खाना खा कर खुद को शोक व्यक्त करने और कंधा देने के लिए तैयार कर लेते थे। सच तो यह है कि डाक्टर को सिर्फ उस अवस्था में बुला कर इस कुर्सी पर बिठाया जाता था, जब वह स्थिति पैदा हो जाये जिसमें दो हजार साल पहले लोग ईसा मसीह को आजमाते थे। कुर्सी के इस्तेमाल का दूसरा और आखिरी अवसर हमारे यहां खत्ने (लिंग की खाल काटना) के अवसर पर आता था, जब लड़कों को दूल्हा की तरह सजा, बना और मिट्टी का खिलौना हाथ में दे कर इस कुर्सी पर बिठा दिया जाता था। इस जल्लादी कुर्सी को देखकर अच्छे-अच्छों की घिग्घी बंध जाती थी। गरीबों में इस काम के लिए भाट या लंबे-वाले कोरे मटके को उल्टा करके लाल कपड़ा डाल देते थे।  (शेष अगले अंक में) 

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