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Memoirs of A Computer Engineer on H-B1 Visa to US -Part 16

May 28, 2013

भयो प्रगट कृपाला 

 

 

अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाएं लगती हैं, शिशुपालन की भी और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आना है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहां प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी।

मेरा विचार यह बना कि यह नियम भारत में बजाए विकल्प के आवश्यक कर देना चाहिए, किसी धर्म के कठमुल्ले विचारों की परवाह किए बगैर। मुझे लगता है कि संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रसवगृह में जूझते छोड़ अस्पताल के बाहर चाय आमलेट उड़ाते हिंदुस्तानी पतियों को जब तक सृजन में होने वाली वेदना का साक्षात दर्शन नही होगा, उन्हें सृजन की पीड़ा का पता नहीं चलेगा। अगर एक बार यह हो जाए तो अंधाधुंध बढ़ती आबादी पर रोक लगाने की अक्ल भी आ जाएगी और दुर्गा, सीता का नाम ले लेकर कन्या भ्रूण के खून से हाथ रंगने से पहले हाथ भी कांपेंगे।

ख़ैर निश्चित दिन पर हम अस्पताल पहुंचे और कमरा देख कर दंग रह गए। अच्छा ख़ासा होटल का कमरा दिख रहा था। आक्सीजन सिलेंडर, ग्लूकोज़ चढ़ाने की नली और बाकी संयत्र वस्तुतः कमरे की दीवारों में लकड़ी की दीवारों के पीछे छिपे थे, ताकि किसी को उन्हें देख कर अनावश्यक मानसिक तनाव न हो। श्रीमती जी के लिए टीवी सेट भी लगा था और उसपर प्रेटीवीमेन चल रही थी। कुछ देर में डाक्टर आए तो श्रीमती जी ने निर्देश थमा दिया कि उन्हें पुत्र या पुत्री का क्या नाम रखना है। श्रीमती जी को दो–दो शंकाएं थी, पहली कि शायद हमने उन्हें पुत्र वाली सूचना मन बहलाने के लिए बता रखी है और दूसरी कि प्रसव के बाद उनकी बेहोशी का फ़ायदा उठाकर कहीं हम बर्थ सर्टिफ़िकेट पर बांकेबिहारी नाम न चढ़वा दें। डाक्टर उन्हें आश्वस्त करके शल्यकक्ष ले गए मुझे बाहर खिड़की के पास इंतज़ार करने की सलाह देकर।


करीब पंद्रह मिनट बाद ही एक नर्स हाथ में गुलाबी सा खिलौना लिए आ रही थी हमारी ओर। श्री–श्री एक हज़ार आठ बांके बिहारी जी महाराज का पदार्पण हो चुका था हमारे परिवार में। माननीय बांके जी की भरपूर फ़ोटो खींची गईं। श्रीमती जी को बहुत कोफ़्त हो रही थी अस्पताल में। शाकाहारी भोजन के नाम पर उबली गोभी, गाजर खानी पड़ रही थी और बाहर से खाना लाने पर पाबंदी थी। एक नरमदिल नर्स उन्हें जूस और फल वगैरह देकर दिलासा दे जाती थी। तीन दिन बाद हमें छुट्टी मिल जानी थी। छुट्टी वाले दिन दो अनुभव हुए। यह बताया गया कि बच्चे की कार सीट लाए बिना आपको बच्चा घर नहीं ले जाने दिया जाएगा। मेरे पास कारसीट थी पर नवजात शिशु के लिए 'हेडरेस्ट' एक विशेष किस्म का तकिया लाना रह गया था। 'टवायस आर अस' गया तो एक सेल्सगर्ल ने पूछा कि बेटे के लिए लेना है या बेटी के लिए। जवाब सुनने पर वह कुछ परेशान होकर बोली अभी मेरे पास कोई नीला 'हेडरेस्ट' नही है सिर्फ़ गुलाबी है। उसने गुलाबी 'हेडरेस्ट' देते हुए कहा कि दो दिन बाद आकर नीले रंग वाले से बदल लेना। मैं सोच रहा था कि माना गुलाबी रंग लड़कियों पर फबता है पर 'चलता है' वाली प्रवृति के चलते उसकी सलाह नज़रअंदाज़ कर दी।

गुलाबी या नीला                                   

 

अस्पताल में डाक्टरों ने भली–भांति कारसीट की जांच की, गुलाबी हेडरेस्ट देखकर नाक सिकोड़ी और पूरे दो घंटे तक निर्देश दिए कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। कुछ बातें जहां काम की थी वहीं कुछ सलाह अजीबोग़रीब लग रहीं थी। जैसे कि बच्चा अगर रात में रोए तो या तो भूखा होगा या उसका बिस्तर गीला होगा। कुछ ऐसा लग रहा था कि हम नए माडल कि कार घर ले जा रहे हो और सेल्समैन उसके फीचर्स के बारे में विस्तार से बता रहा हो। बांके बिहारी हमें टुकुर–टुकुर देख रहे थे, मानो कह रहो हों 'पिताश्री, ठीक से निर्देश समझ लो। बाद में न कहना कि हमने रात में गदर क्यों काटी है या आप सबको हर दो–दो घंटे में क्यों उठा रहा हूं। यह सब तो पैकेज्ड़ डील है।' अस्पताल से घर आने के पंद्रह दिन में ही पिंक या ब्लू का अमेरिकी कांसेप्ट अच्छी तरह से दिमाग़ में घुस गया। हर मिलने वाला छूटते ही कहता था कि बड़ी सुंदर बेटी है हमारी। हम हैरान कि अच्छा ख़ासा लड़का सबको लड़की क्यों दिख रहा है। किसी अनुभवी दोस्त ने बताया कि यह समस्या लेबलिंग की है। अगर आटे की बोरी पर चावल का भी लेबल लगा दो तो एक औसत अमेरिकी उसे आटे के दाम पर ख़रीद लेगा। यहां मैंने बांके की कारसीट में गुलाबी 'हेडरेस्ट' लगाकर लड़की होने का लेबल लगा दिया था।

 

 

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